मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मधुकर सिंह को सलाम



ठीक-ठीक याद नहीं कि पहली बार मधुकर सिंह से कब मिला था। शायद वह 1983 या 84 का साल था और मैं अभी-अभी कॉलेज में गया था। उस समय हम नये रचनाकारों को मधुकर सिंह नायक की तरह लगते थे। उसी समय मैंने पहली बार उनका कहानी संग्रह माई पढ़ा था और एकदम अभिभूत रह गया था। इसके बाद दुश्मन, सोनभद्र की राधा और भी ढेर सारी कहानियां। तब तक मैं उनसे मिला नहीं था लेकिन मुझे लगता था कि मधुकर सिंह कमलेश्वर की तरह ही होंगे।
उस समय भोजपुर और बक्सर दोनों धधक रहे थे। किसान आन्दोलनों के ताप में हम भी जल रहे थे। पढ़ाई, नाटक और साहित्य रचना का काम एक साथ चल रहा था। तब नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा हुआ करता था और उसकी एक बैठक में मुझे आरा आना पड़ा था। उस बैठक में बिजेन्द्र अनिल, नवेन्दु, श्रीकांत और अनिल चमड़िया के साथ मुझे एक आदमी मिला था। मेरे आते ही उस आदमी ने चबूतरे पर मेरे लिए बैठने की जगह बनाई थी। नवेन्दुजी ने कुरता-पाजामा पहने उस व्यक्ति से मेरा परिचय कराया था-मधुकर सिंहजी से परिचय है ना?  जैसे ही उन्होंने यह बात कही मैं तुरत खड़ा हो गया था। हंसे थे मधुकर सिंह। निश्छल और बच्चों सी हंसी। मेरा हाथ पकड़ा और खींचकर अपने पास बैठा लिया। नवेन्दुजी ने कहा था- ये कमलेश हैं। बक्सर से हैं। लिखते-पढ़ते हैं। मधुकर सिंह ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा था- डुमरांव के छात्रों के आन्दोलन पर तुम्हारी रिपोर्ट मैंने जनमत में देखी है। अच्छा लिखा है। खूब पढ़ो और खूब लिखो।
बैठक के बाद मैं बक्सर वापस लौटने के लिए निकला ही था कि मधुकर सिंह ने आवाज दी थी- जल्दी में हो क्या? ट्रेन है सर- मैंने सकुचाते हुए कहा था। मधुकर सिंह ने मेरा हाथ पकड़कर कहा था- दूसरी ट्रेन से चले जाना, चलो चाय पीते हैं। इसके बाद एक चाय की दुकान में बिछी बेंच पर बैठकर दुनिया भर की बातें की थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई के बारे में, मेरी रचनाओं के बारे में और मेरे दोस्तों के बारे में। मेरे घर के बारे में पूछा और फिर मां-पिता के बारे में। उन्होंने मुझे कुछ किताबें भी दी। कहा था- कहानी लिखना तो जरूर बताना।
इसके लगभग चार वर्षों के बाद अचानक बक्सर में सृजन संस्कृति मंच ने मेरी और विजयानंद तिवारी की कहानी पाठ का आयोजन किया था। उसमें मधुकर सिंह मुख्य वक्ता थे। कार्यक्रम स्थल पर पहुंचते ही उन्होंने मुझे खोजा और गर्मजोशी से हाथ मिलाया। उन्होंने गौर से मेरी कहानी सुनी थी और उसपर खूब बोला भी था। बाद में मुझे कहा था- शिल्प पर और ज्यादा काम करने की जरूरत है। यह केवल पढ़ने से ही संभव हो पाएगा।
कुछ दिनों के बाद मैं पटना आ गया और पत्रकारिता के काम में लग गया। लेकिन उनकी सूचना मिलती रहती थी। उनकी पत्रिका भी मिलती थी। अचानक एकदिन आज अखबार के दफ्तर में वे मुझे खोजते हुए पहुंच गये थे। थके-थके और बीमार से। मुझसे चाय मंगाने को कहा फिर धीरे से बोले- पत्रिका के काम में बहुत मशक्कत करनी पड़ रही है। तुम अपनी कहानी मुझे दो। इस बार के अगले अंक में तुम्हारी कहानी लेनी है। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी और दो दिनों के बाद मैं उन्हें अपनी कहानी देने गया था। हालांकि न तो उनकी पत्रिका का अगला अंक प्रकाशित हो सका और न मैं उनसे कहानी वापस लेने का साहस कर सका।
कुछ दिनों के बाद वे मुझे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और कथाकार सुभाष शर्मा के यहां मिले और अखबारों में छप रही खबरों को लेकर खूब खरी-खोटी सुनाई थी। कहा था- तुमलोग अखबार में हो फिर भी जनता की लड़ाई अखबारों से बाहर हो रही है। मैं चुपचाप सुनता रहा था। हालांकि उन्होंने फिर कहा भी था- तुमलोगों की विवशता भी मैं जानता हूं। इसके बाद हमलोग पैदल कुछ दूर तक टहलते हुए गये थे। उनके साथ कोई और था जो बार-बार रिक्शा लेने की जिद कर रहा था। लेकिन वे तैयार नहीं हुए थे। परीक्षा समिति के दफ्तर से संग्रहालय तक वे मेरे साथ पैदल आये थे और घर पर मिलने आने के लिए कहा था। तब वे पटना में ही कहीं कमरा किराये पर लेकर रहते थे। लेकिन उनसे फिर कभी मिलना नहीं हो सका। हां उनके बारे में खबरें मिलती रहती थी। उनकी बीमारी के बारे में ज्यादा। अचानक उनके निधन की भी खबर मिली। उनका जाना सचमुच दुखदायी है। नये रचनाकारों को प्रेरित करने वाले रचनाकार अब कहां है? उनकी रचनाओं की तरह उनकी यादों को सुरक्षित रखना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियों को हम उनके बारे में बता सकें। मधुकर सिंह को सलाम।

गुरुवार, 19 जून 2014

विचार ही बदलते हैं दुनिया को


अभी हाल में एक वरिष्ठ पत्रकार का इंटरव्यू पढ़ रहा था। इसमें उन्होंने कहा है कि अब विचारों से दुनिया नहीं बदलती है। अब तकनीक ही है जो दुनिया को बदल रही है। अब मैं यह नहीं जानता कि इंटरव्यू में उस वरिष्ठ पत्रकार ने ठीक-ठीक क्या यही कहा था या फिर उन्होंने कहा कुछ दूसरी बात और इंटव्यू लेने वाले साथी समझ गये कुछ और। लेकिन उस पूरे इंटरव्यू को पढ़ने से जो बात छन कर आ रही है वह यही है कि दुनिया को बदलना है तो विचारों से लैस होने की जरूरत नहीं है तकनीक से लैस होना पहली शर्त है।
जब मैं इस इंटरव्यू को पढ़ रहा था तो देश के एक और चर्चित पत्रकार याद आ रहे थे जिन्होंने कुछ दिनों पहले गांधी मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में अपने एक व्याख्यान में कहा था कि अगर आपके पास तकनीक है तो आप ठगे नहीं जाएंगे। तकनीक ने आपको पूरी तरह सक्षम बना दिया है और इसके लिए अब किसी खास विचार की जरूरत नहीं है। उस व्याख्यान में उन्होंने वामपंथी पत्रिकाओं का हवाला भी दिया था जिससे यह पता चला था कि विचारों से उनका मतलब वामपंथी विचार ही है। ये दोनों चर्चित और वरिष्ठ पत्रकार ये बात कुछ अलग नहीं कह रहे हैं। दरअसल पूरी दुनिया में और खासकर अपने देश में कुछ ज्यादा यह चर्चा हो रही है। अपने देश में बुद्धिजीवियों की एक जमात है जो मानती है कि अब यदि आप दुनिया को बदलने की बात सोचते हैं तो विचारों को भूल जाइये। विचार अब अप्रासंगिक हैं और उनकी जरूरत अब पिछड़ी मानसिकता वालों को ही है।
सही है। तकनीक के महत्व को कोई भी नकार नहीं सकता है। तकनीक तब भी महत्वपूर्ण थी जब आदमी ढ़ोल और नगाड़े पीटकर अपने संदेश लोगों तक पहुंचाता था और आज भी उससे आप किनारा नहीं कर सकते जब आप सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी बात पूरी दुनिया में क्षण भर में पहुंचाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस तकनीक के बल पर आप क्या करते हैं? सोशल नेटवर्किंग साइट या तकनीक का जो भी अद्यतन माध्यम हैं उसके बल पर आप क्या करते हैं? जाहिर सी बात है कि आप अपनी बात कहते हैं या दूसरों की बातें समझने की कोशिश करते हैं। सूचनाओं से लैस होने की कोशिश करते हैं। अपनी बात कहने, दूसरों की बात समझने का मतलब क्या है? सूचनाओं से लैसे होने का उद्देश्य क्या है? या ते आप अपने विचारों को वहां रखते हैं या दूसरों के विचारों को समझने की कोशिश करते हैं। सूचनाओं के बल पर आप अपने विचारों को पुष्ट करते हैं। उन्हें एक तार्किक आधार देने की कोशिश करते हैं। तो तकनीक क्या हुई? विचारों का संवाहक ही न? अगर आपके पास विचार न हों तो आप इंटरनेट का क्या करेंगे? जाहिर सी बात है किे पोर्न साइट देखेंगे।
दोस्तों ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां विचार के बगैर तकनीक किस तरह आदमी को बरबाद करती है? याद कीजिए हाल में नमक की कमी हो जाने की अफवाह। मुठ्ठी भर लोगों ने मोबाइल जैसी अति आधुनिक तकनीक के बल पर इस अफवाह को सच्चाई बना दिया और एक दिन में सैकड़ों टन नमक बिक गया। टेलीविजन जैसी आधुनिक तकनीक विचारहीनता के कारण किस तरह समाज को पीछे धकेल रही है। सुबह में बाबाओं की जमात की किस तरह टेलीविजन के बल पर लोगों को बेवकूफ बनाने में लगी रहती है। मोबाइल यदि आपके  पास है और आपके अंदर विवेक (जाहिर है कि यह विचार से जुड़ा मसला है) नहीं है तो आप किस तरह ठगे जा रहे हैं इसके सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं।
कुछ दिनों पहले तक यह मानकर चला जाता था कॉम डॉट (कॉमरेड का संक्षिप्त रूप) दुनिया को बदलता है क्योंकि उसके पास विचार होता है। लेकिन कुछ लोगों ने इसे उलट दिया है और उनका कहना है कि डॉट कॉम (इंटरनेट या आधुनिक तकनीक) ही दुनिया को बदल सकता  है। क्या विचारों के बगैर आप खड़े हो सकते हैं? दुनिया आज भी विचारों के बल पर ही बदली जा सकती है।  

गुरुवार, 27 मार्च 2014

एक-एक कर ढ़ह गये बिहार में वामपंथियों के गढ़


कमलेश
वामपंथियों के प्रिय कवि मुक्तिबोध की कविता है- तोड़ने ही होंगे गढ़ और मठ पुराने सभी, उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे तमाम। बिहार में वामपंथियों ने अपने विरोधियों के कितने गढ़ और मठ तोड़े ये तो नहीं पता लेकिन उन्होंने अपने सभी पुराने गढ़ जरूर ध्वस्त कर दिये। उनके जनाधार पर उन्हीं लोगों का कब्जा हो गया जिन्हें वामपंथियों ने अपना साथी बनाकर गलबहियां की थी। एक जमाना था कि बिहार वामपंथियों का मजबूत गढ़ माना जाता था। कभी बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता भाकपा के कद्दावर नेता सुनील मुखर्जी हुआ करते थे। इस सूबे के कई लोकसभा क्षेत्रों को मास्को और लेनिनग्राद के नाम से याद किया जाता था लेकिन आज यहां यह हालत है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मात्र दो लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ रही है जबकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी को एक भी क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पा रहा हे। यह जरूर है कि भाकपा माले के उम्मीदवार 23 सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन इन 23 क्षेत्रों में भी अने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह कितने सीटों पर मुकाबले में रह पाती है। 
लोकसभा चुनावों के दौरान बिहार में वामपंथियों की धमक पहली बार 1962 में सुनाई पड़ी थी जब बेगूसराय से भाकपा के वाई शर्मा, पटना से रामावतार शास्त्री और जहानाबाद से चंद्रशेखर सिंह चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। 1971 के लोकसभा चुनाव में यह संख्या बढ़ी और केसरिया (बाद में मोतीहरी और अब पूर्वी चम्पारण) से कमला मिश्र मधुकर, जयनगर (मधुबनी) से भोगेन्द्र झा, जमुई से भेला मांझी, पटना से रामावतार शास्त्री अ‍ैर जहानाबाद से एक बार फिर चंद्रशेखर सिंह भाकपा के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। लेकिन 1977 में जनता पार्टी की आंधी में वामपंथियों की पताका बिखर गई और उन्हें बिहार से एक भी सीट नहीं मिल सकी। 1980 में वामपथियों ने एक बार फिर अपनी ताकत जुटाई और भाकपा ने फिर बिहार की चार सीटों पर कब्जा जमाया। इनमें मोतीहारी से कमला मिश्र मधुकर, बलिया से सूर्यनारायण सिंह, नालंदा से विजय कुमार यादव और पटना से एक बार फिर रामावतार शास्त्री ने जीत हसिल की।
1984 लोकसभा चुनाव में पटना की सीट पहली बार भाकपा के हाथ से निकली और फिर कभी इस पर भाकपा का कब्जा नहीं हो सका। अब तो इस सीट से भाकपा के उम्मीदवार भी चुनाव नहीं लड़ते। 1984 में मात्र दो सीटों पर भाकपा की विजय पताका लहराई। नालंदा से विजय कुमार यादव और जहानाबाद से रामाश्रय प्रसाद सिंह  चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 1989 के चुनाव में एक बार फिर भाकपा का तो जलवा दिखा ही पहली बार माकपा ने भी बिहार में अपनी जीत दर्ज कराई। इस चुनाव में भाकपा के उम्मीदवार के रूप में मधुबनी से भोगेन्द्र झा, बलिया से सूर्यनारायण सिंह, बक्सर से तेजनारायण सिंह और जहानाबाद से रामाश्रय प्रसाद सिंह जीते जबकि नवादा में पहली बार माकपा उम्मीदवार के प्रेम प्रदीप जीत कर संसद पहुंचे। इसी चुनाव में आईपीएफ (अब भाकपा माले) के उम्मीदवार के रूप में रामेश्वर प्रसाद पहली बार आरा से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। 1991 का चुनाव बिहार में भाकपा के लिए सबसे अच्छा चुनाव रहा। इस चुनाव में मोतीहारी से कमला मिश्र मधुकर, मधुबनी से भोगेन्द्र झा, बलिया से सूर्यनाराण सिंह, मुंगेर से ब्रह्मानंद मंडल, नालंदा से विजय कुमार यादव, बक्सर से तेजनारायण सिंह भाकपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते जबकि नवादा माकपा के उम्मीदवार के रूप में प्रेमचंद राय चुनाव जीते। 1996 में मधुबनी से चतुरानन मिश्र, बलिया से शत्रुघ्न प्रसाद सिंह और जहानाबाद से रामाश्रय प्रसाद सिंह चुनाव जीते। इसके बाद बिहार से भाकपा का कोई नेता लोकसभा का चेहरा नहीं देख सका। हां, 1999 में भागलपुर से माकपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर सुबोध राय लोकसभा पहुंचे और इसके बाद माकपा का भी खाता नहीं खुला।
इसके बाद से वामपंथियों के नसीब में कभी जीत नहीं आई। बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से भाकपा के उम्मीदवारों ने हर बार मजबूत टक्कर जरूर दी लेकिन कभी जीत नहीं सके। ए.एन. समाज अध्ययन संस्थान के निदेशक और समाजशास्त्री डॉ. डी.एम. दिवाकर का मानना है कि बिहार में वामपंथी अपने एजेंडे से भटकने की सजा पा रहे हैं। बिहार में जबतक इनके एजेंडे पर भूमि सुधार, न्यूनतम मजदूरी और गरीबी निवारण जैसे मुद्दे मुखर रहे तबतक जनता भी इनके साथ रही लेकिन जब वामपंथियों ने इन सवालों को छोड़ दिया तो जनता ने भी उनका साथ छोड़ दिया। डॉ. दिवाकर के अनुसार बिहार में वामपंथियों का आधार मुख्य रूप से अनुसूचित जाति, जनजाति और कृषि श्रमिकों के बीच था। अगर वामपंथी इनके मसलों को लेकर आन्दोलन करते तो ये वर्ग जाति के आधार पर नहीं बंटते। निचली जातियों ने जब यह देखा कि वामपंथी उनके मसलों के नहीं उठा रहे हैं तो ये जातियां  जातिवादी दलों के साथ चली गई और वामपंथियों के गढ़ एक-एक कर ध्वस्त होते चले गये।

रविवार, 17 नवंबर 2013

मीडिया की साख और थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग

कमलेश
पिछले तीन दिनों से अखबार और टीवी न्यूज चैनल लगातार केवल और केवल सचिन राग आलाप रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश में पिछले तीन दिनों से दूसरा कोई मसला ही नहीं है। आप सचिन तेंदुलकर को पढ़िये, उसे देखिये और उसी के बारे में बात कीजिए। और कुछ मत सोचिए। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का इससे बेहतर शायद ही कोई उदाहरण हो सकता है। हाल के कुछ वर्षों में भारतीय मास मीडिया ने यह दिखा दिया है कि अब उसके लिए विश्वसनीयता अथवा साख के कोई मायने नहीं है। वह उन्हीं मसलों को देश का अहम मसला बनाने का प्रयास कर रहा है जो इस देश के शासक वर्ग के हित के लिए सही हैं। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का जितना विकराल रूप आज दिखाई पड़ रहा है उतना मीडिया के किसी भी कालखंड में इस देश के लोगों ने नहीं देखा होगा। मीडिया के सिद्धांत कहते हैं कि जब मीडिया द्वारा थोपे जा रहे एजेंडे में और आम आदमी के वास्तविक एजेंडे में फर्क शुरू होता है तो मीडिया के साख का संकट भी शुरू होता है। यह फर्क जितना बड़ा होगा मीडिया की साख भी उतनी ही संकट में पड़ेगी। इतिहास के किसी भी दौर में फर्क इतना बड़ा नहीं हुआ था।
लोकतंत्र और मीडिया
हम अक्सर मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं। ठीक बात है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अब भारत का लोकतंत्र किनका लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र किनके लिए प्राणवायु का काम करता है। यह वही लोकतंत्र है जहां बाथे और बथानी टोला के दलितों के हत्यारों को कोई सजा नहीं मिलती। इस देश के महज बीस फीसदी लोगों का है लोकतंत्र। तो जब लोकतंत्र इस देश के महज बीस फीसदी लोगों का लोकतंत्र है तो इसका चौथा स्तम्भ मीडिया भी महज बीस फीसदी लोगों का ही मीडिया है। जिस तरह इस देश के 80 फीसदी लोग इस लोकतंत्र में हाशिये पर हैं उसी तरह इस देश के 80 फीसदी लोग मीडिया की चिंता से बाहर है। यही कारण है कि चाहे वह छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की लड़ाई हो या उड़ीसा के आदिवासियों का संघर्ष, इसे मुख्यधारा की मीडिया में कोई जगह नहीं मिल पाती है। लेकिन इसे स्थानीयता के वृत्त से बाहर निकाल कर जरा बड़े कैनवास पर देखने की जरूरत है। हम अक्सर इसके लिए इन मीडिया हाउसों में काम करने वाले पत्रकारों को जिम्मेवार ठहराते हैं। क्या किसी मीडिया हाउस में काम करने वाले पत्रकार उसका स्वरूप और उसका एजेंडा बदल सकते हैं? क्या पत्रकारों के बदलने से साख का संकट हल हो जाएगा?
मीडिया की आंतरिक संरचना
1988 में एडवर्ड एस हरमन और नॉम चॉम्सकी ने एक किताब लिखी थी- मैन्यूफैक्चरिंग कंसेंट। इस किताब में इन मीडिया विशेषज्ञों ने जिन बातों को सूत्र रूप में रखा वह आज भारत में अपने विराट रूप में दिखाई पड़ रहा है। इन विशेषज्ञों ने उसी समय कहा था कि दरअसल अभी के मीडिया में जो कुछ दिखाई पड़ रहा है वह किसी षड़यंत्र की वजह से नहीं है। मीडिया की अपनी आंतरिक बनावट ही ऐसी है जो उसे आम लोगों और मेहनतकश लोगों के खिलाफ खड़ा करती है। मीडिया की संरचना से ही उसका कंटेंट प्रभावित होता है। मीडिया की संरचना शासक वर्ग अथवा इलीट वर्ग के पक्ष में है इसलिए मीडिया का कंटेंट भी शासक वर्ग और इलीट वर्ग के पक्ष में होता है। मीडिया की सामाजिक भूमिका प्रभुत्वशाली समूहों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे को न केवल स्थापित करना है बल्कि उसका बचाव भी करना है।
युद्ध और मीडिया का सच
कोई भी साम्राज्यवदी देश जब किसी कमजोर मुल्क पर हमले शुरू करता है तो भारत का शासक वर्ग तुरत उस साम्राज्यवादी मुल्क के पक्ष में उसी तरह खड़ा होता है जैसे उस साम्राज्यवादी देश का शासक वर्ग खड़ा होता है। चूंकि शासक वर्ग इस युद्ध के पक्ष में खड़ा होता है इसलिए मीडिया उस युद्ध के पक्ष में आम राय बनाने में जुट जाता है। पिछली सदी में इराक पर हुआ अमेरिकी हमला इसे बड़े दिलचस्प तरीके से दिखाता है।
पिछले दिनों वरिष्ठ लेखिका अरुंधति राय ने अपने एक साक्षात्कार में इस मसले को लेकर एक दिलचस्प घटना बताई थी। उनके अनुसार इराक युद्ध के पहले न्यूयार्क टाइम्स के रिपोर्टर ने लगातार खोजी खबर लिखी कि इराक के पास आणविक और रासायनिक हथियार हैं। इसी को आधार बनाकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया। जबकि इराक बार-बार कह रहा था कि उसके पास कोई आणविक हथियार नहीं है। फिर भी इराक को तहस-नहस कर दिया गया। हालांकि उस समय भी लोगों को इस बात की जानकारी थी कि इराक पर हमले की वजह उसके पास परमाणु हथियार का होना नहीं है। इराक को पूरी तरह बरबाद कर दिया गया। इस घटना के छह साल बाद न्यूयार्क टाइम्स ने भीतर में एक छोटी सी जगह में यह कहते हुए अपने पाठकों से माफॅी मांग ली कि हमने जो इराक के पास आणविक हथियार होने की खबर छापी थी वह दुर्भाग्य से गलत थी क्योंकि बाद में छानबीन से साबित हो गया है कि इराक के पास कोई हथियार मौजूद नहीं था। लेकिन मजेदार तो यह रहा कि अमेरिका के प्रसिद्ध डॉक्यूमेंटरी फिल्म मेकर माइकल मूर ने इस माफीनामे का उपयोग अपने किताब में करने की अनुमति न्यूयार्क टाइम्स से मांगी। लेकिन न्यूयार्क टाइम्स ने कापीराइट एक्ट के उल्लंघन का हवाला देते हुए इसकी अनुमति नहीं दी।
युद्ध और वीडियो गेम
यहां यह याद रखना जरूरी है कि भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उस युद्ध को किस तरह दिखा रहा था। यह शायद दुनिया के इतिहास में पहली बार था कि मीडिया ने एक युद्ध को वीडियो गेम की तरह दिखाया। पूरी खबरें दिखाने का अंदाज ऐसा था कि आप इस युद्ध की विभिषिका से दुखी मत होइये, इसका मजा लीजिए। मीडिया की किताबें कहती हैं कि खबर के स्रोत जितने ज्यादा होते है मीडिया की साख उतनी ही ज्यादा होती है। आप याद कीजिए कि अमेरिका-इराक युद्ध की रिपोर्टिंग कर रहे भारतीय पत्रकारों के स्रोत क्या था- केवल अमेरिकी फौज और उनके द्वारा दी गई सूचनाएं। किसी भी चैनल ने हम भारतीयों को यह दिखाने की कोशिश नहीं की इस युद्ध को लेकर इराक के लोग किस तरह की नारकीय यंत्रणा झेल रहे हैं। आप जरा हाल में अफजल गुरु के प्रकरण को याद कीजिए। असहमति का स्वर मीडिया में दिखाई नहीं पड़ रहा था। अखबारों और न्यूज चैनलों में केवल उनकी बातें आ रही थीं जो भारत सरकार के कदम को देशभक्ति का सबसे बड़ा कदम मान रहे थे।
मीडिया कवरेज और पांच फिल्टर
नॉम चॉम्सकी कहते हैं कि मीडिया के कवरेज को पांच चीजें प्रभावित करती हैं-
स्वामित्व,
विज्ञापन,
असहमति,
स्रोत और
कम्युनिज्म विरोध।
कम्युनिजम विरोध को जरा और व्यापक फलक पर कहें तो दलित विरोध, पिछड़ा विरोध, आदिवासी विरोध और कुल मिलाकर मेहनतकश आवाम का विरोध।
मीडिया टाइजेशन
एक नया सिद्धांत चर्चा में है जिसे मीडिया टाइजेशन या मीडिया चालन कहते हैं। जब मीडिया की ताकत इतनी बढ़ जाए कि वह राजनीतिक सत्ता पर हावी हो जाए। मसलन नीरा राडिया प्रकरण से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। जब कारपोरेट सेक्टर को सरकार को लेकर खेल करना था तो उसने नीरा राडिया की पीआर कंपनी के माध्यम से मीडिया की मदद ली। मीडिया इस काम को करने में सक्षम था क्योंकि वह राजनीतिक सत्ता पर अपना प्रभाव डाल रहा था। इसका मतलब यह भी मीडिया बेलगम और उद्दंड हो गया है तथा उस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया हे।
साख मतलब हिस्सेदारी
और हम जब इस मीडिया में साख की बात करनते हैं तो इसका सीधा मतलब है कि हम इस मीडिया में आम आदमी के लिए हिस्सेदारी मांग रहे हें। वह मीडिया जिसमें इस देश के कारपोरेट सेक्टर के 60 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा लगे हैं वह इस देश के आदमी को हिस्सा देगा? मीडिया कारपोरेट घराने द्वारा संचालित है जिसका मुख्य काम मुनाफा कमाना है। फिर इसमें वह उनलोगों को जगह क्यों दे जो उसके मुनाफा कमाने के सिलसिले में किसी भी काम के नहीं हैं। तो  इस हिस्से को पाने के लिए के लिए इस देश के लोगों को उसी तरह लड़ना होगा जिस तरह आप अपने बाकी के हक-हकूक के लिए लड़ते हैं। याद रखिये राजा को नंगा वह मीडिया नहीं कहेगा जो उसी राजा की मदद से अपने 60 हजार करोड़ के कारोबार को चला और बढ़ा रहा है। इस मीडिया में हिस्सेदारी के लिए या फिर इस मीडिया का चेहरा बदलने के लिए लड़ाई लड़नी होगी। इस लड़ाई को देश के सुदूर गांव-देहातों में लड़ी जा रही उस लड़ाई से जोड़ना होगा जिसका उद्देश्य इस देश की सूरत को बदलना है। यह काम इस देश का आम आदमी ही कर सकता है और वही करेगा।  

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

कौन बचायेगा- हरिजन?

कमलेश
आप उन्हें संघी कह सकते हैं। उन्हें कोई एतराज भी नहीं था। कई बार वे खुद भी कहते थे। अपने कॉलम में भाजपा की चर्चा करते हुए वे जैसे अघाते थे उससे कई बार कोफ्त होती थी। लेकिन उनमें एक बात थी- वे वामपंथियों के लिखने-पढ़ने की क्षमता के जबर्दस्त कायल थे। कई बार अपने खास लोगों को से इस बात को शेयर भी किया करते थे। जब भी वे नौकरी देने की हालत में रहे उन्होंने वामपंथी विचारों के पत्रकारों को जमकर अवसर दिया। यह जानते हुए अवसर दिया कि सामने वाला उनके विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।
जी, मैं बात दीनानाथ मिश्र की कर रहा हूं। जबसे उनके निधन की खबर मिली है उनका चेहरा आंखों के सामने तैर रहा है। और साथ में याद आ रही है उनसे पहली मुलाकात। तब मैं इंटर या शायद थर्ड इयर का विद्यार्थी हुआ करता था। बक्सर के एक छोटे से कॉलेज का छात्र। वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा हुआ। कालेज की कक्षा से ज्यादा सड़कों पर आन्दोलनों में दिखाई पड़ने वाला। लेकिन लिखने-पढ़ने का शौक था। लिहाजा अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में लिखता रहता था। उस समय नवभारत टाइम्स का पटना से प्रकाशन शुरू हुआ था। दीनानाथ मिश्रजी उसके पहले संपादक थे। तब उस अखबार में स्वतंत्र पत्रकारों को लिखने का खूब स्पेस मिलता था। वहां काम करने वाले पत्रकारों की टीम भी जबर्दस्त थी। फिर कभी बिहार के किसी हिन्दी अखबार में इतने सशक्त पत्रकारों की टीम देखने को नहीं मिली। शायद यह भी दीनानाथजी का ही असर था।
इसी दौरान एक दिन वहां काम कर रहे नवेन्दु भैया (वरिष्ठ पत्रकार) का संदेश आया था- नवभारत टाइम्स को कुछ कैम्पस रिपोर्टर चाहिए। अप्लाई कर दो। मैंने बगैर कुछ सोचे केवल एक आवेदन भेज दिया था। अचानक एक दिन इंटरव्यू की चिठ्ठी भी आ गई। और मैं इंटरव्यू देने पटना नवभारत टाइम्स के दफ्तर पहुंचा था। अपने चैम्बर में दीनानाथजी बैठे थे। कभी चेहरे पर तो कभी बालों पर हाथ फेरते हुए। कुछ और लड़के आये थे। मैं यह जानकर चकित था कि उनमें से अधिकतर न केवल आन्दोलनकारी छात्र नेता थे बल्कि वामपंथियों की भी संख्या अच्छी-खासी थ्ी।
जब मैं कक्ष में पहुंचा तो दीनानाथजी ने बड़े स्नेह से पूछा था- आज ही आये हो? इसके बाद उन्होंने चाय मंगाई थी। फिर पूछा- कुछ लिखते-पढ़ते हो? मैंने अपने कुछ आलेख उन्हें देखने के लिए पकड़ा दिये थे। उनमें से अधिकतर उन लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख थे जिन्हें वामपंथी ही नहीं नक्सली मिजाज का माना जाता था। करीब 15 मिनट तक उन आलेखों को गौर से देखने के बाद उन्होंने कहा था- पत्रकारिता में क्यों आना चाहते हो? राजनीति में क्यों नहीं चले जाते? मैंने कहा क्योंकि मैं कहीं और नहीं जा सकता। दीनानाथजी ने धीरे से हंस कर कहा- जो तुम लिखते पढ़ते हे उसे लेकर डर नहीं लगता? कोई मारेगा तो? मेरे लिए यह सवाल थोड़ा अप्रत्याशित था। मैंने कहा- कोई मारेगा तो बचायेंगे वे लोग जिनके लिए मैं लिखता-पढ़ता हूं। दीनानाथजी थोड़ा मुस्कुराये थे। फिर पूछा था- कौन बचायेगा- हरिजन? मैं समझ गया कि दीनानाथजी का इशारा किस तरफ है? मैंने कहा था- जनता अपने-आप में सुरक्षा कवच होती है सर। इस पर खूब जोर से हंसे थे दीनानाथजी। फिर कहा था- अपना यह जज्बा बनाकर रखना। आने वाले दिनों में इस जज्बे को लेकर पत्रकारिता करने वाले कम लोग मिलेंगे। इसके बाद उन्होंने पास बैठे गुंजनजी से कहा था- इस लड़के की चिठ्ठी बनवा दीजिए।
इसके महीनों बाद अचानक नवभारत टाइम्स के दफ्तर में सामना हो गया था उनसे। उन्हें मुझे पहचानने में मुश्किल से पांच मिनट लगे होंगे। उन्होंने हंसकर कहा- क्या पटना आ गये? मैंने कहा- नहीं सर, बक्सर में ही हूं। उन्होंने प्यार से कहा था- कोई दिक्कत हो तो बताने में संकोच मत करना।
अभी जब उनके निधन की खबर सुनी तो लगा कि भ्राविष्य को कितनी गहरी दृष्टि से देख रहे थे दीनानाथजी।  उनके आलेखों को लेकर, उनके कॉलम को लेकर कई बार हम कहते थे- ऐसे भाजपा का प्रचार नहीं करना नहीं चाहिए उनको। आखिर एक पत्रकार की मर्यादा का तो उन्हें निर्वहन करना चाहिए। लेकिन अब लगता है कि आदमी चाहे किसी भी विचार के साथ हो, उसके पक्ष में उसे मजबूती से खड़ा होना ही चाहिए।    

शनिवार, 9 नवंबर 2013

जनता का लड़ाकू चेहरा थे चंदेश्वरी दा

 चंदेश्वरी प्रसाद सिंह, चंदेश्वरी दा, सीपी सिंह। एटक के अध्यक्ष, भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य और सीपीआई की सेना जनसेवा दल के सेनानायक। कई नाम थे उनके लेकिन चेहरा एक ही था। हमेशा जनता की लड़ाई में डटे रहने वाला। छठ का उल्लास अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ था कि उनके निधन की खबर आई। रहने वाले वे भले बेगूसराय के थे लेकिन उन्हें जानने वाले पूरे बिहार में हैं।
राजनीति विज्ञान कहता है कि जनता जब सबसे तीखे संकट का सामना करती है तभी उसके सबसे जुझारू नेता सामने आते हैं। वे आते तो बिजली की चमक की तरह हैं लेकिन जनता के बीच रहते बिल्कुल उसी तरह हैं जैसे पानी में मछली रहती है। चंदेश्वरी दा ऐसे ही नेता थे। सीपीआई में आने के पहले नक्सलवादी आन्दोलन का उभार भी वे देख चुके थे। वे तो उच्च अध्ययन के लिए मास्को जाने की तैयारी में थे। इसके लिए उनका चयन भी हो चुका था। मास्को जाने के पहले वे कुछ जरूरी कागजात लेने भागलपुर से अपने गांव बीहट आये थे। तब बेगूसराय के लोग अपराधियों के आतंक के साये में जी रहे थे। गांव आते ही उनका भी सामना अपराधियों के साथ हुआ। जमकर लड़ाई चली। इसी क्रम में एक हत्या हो गई। इस हत्याकांड के अभियुक्त बनकर उन्हें सीपीआई के नेताओं के साथ जेल जाना पड़ा। और जब वे जेल से बाहर आये तो वे जान चुके थे उनके लिए विश्वविद्यालय का रास्ता मास्को से होकर नहीं किसानों के खेत-खलिहान और मजदूरों की फैक्ट्रियों से होकर गुजरता है।
इसके बाद तो चंदेश्वरीजी बिहार में भाकपा के हर कार्यक्रम के लिए जैसे जरूरी नाम बन गये थे। 65 साल के चंदेश्वरी दा भाकपा के युवा कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत थे। नौजवान कार्यकर्ताओं का कहना था कि चंदेश्वरी दा जब उनके साथ होते हैं तो ऐसा लगता है मानो उनके इर्द-गिर्द कोई सुरक्षा घेरा बना हुआ हो।
इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। उनके भाई बिन्देश्वरी सिंह की हत्या हुई। उनके कई साथी उनसे बिछड़े और खुद उन्हें एक हत्याकांड में उम्र कैद की सजा हुई। हालांकि इस सजा के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट गये और इस सजा पर उन्हें स्टे मिला। वे एक बार जिला पार्षद का चुनाव भी जीते जिसे बाद में रद्द किया गया। चंदेश्वरी दा केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि एक अच्छे लेखक भी थे। उनकी तीन किताबें शहीदों के रास्ते, लाल सितारा और जेल का खेल लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुकी हैं। एक ऐसे समय में जब राजनीति और विश्वसनीयता के बीच की खाई बढ़ती जा रही है, चंदेश्वरी दा जैसे लोगों का जाना बड़ा सदमा देता है।

रविवार, 9 जून 2013

जीवित हैं साथी हंसराज के सपने


कमलेश
हंसराज नहीं रहे। एक साल पहले उनका निधन हो गया- और यह खबर मुझे तब मिली जब मैंने बिहार नौजवान सभा के एक पुराने कार्यकर्ता कामेश्वर भाई को फोन किया। मैं सबका हाल-चाल ले रहा था। फलां कैसे हैं और फलां क्या कर रहे हैं? जैसे ही मैंने हंसराज के बारे में पूछा वे चौंक गये- तुम्हें नहीं पता? वे तो पिछले साल ही चल बसे। अचानक। चुपचाप अपने दुखों के साथ। लड़ाई की स्मृतियों को अपने सीने में संजोए। किसी को बगैर कुछ बताये। मैं फोन पकड़े सन्नाटे में डूबा रहा। थोड़ी देर बाद मैंने शिकायत की- किसी ने मुझे बताया भी नहीं। कामेश्वर भाई ने बताया कि कुछ पुराने साथियों ने बक्सर में छोटी सी सभा करके श्रद्धांजलि दे दी। दूर बैठे साथियों को सूचना कौन देता?
साथी हंसराज। हंसराज मल्लाह। हंसराज केवट। गायक हंसराज। और प्रशासन की नजर में नक्सली हंसराज। दोस्तों की भाषा में राका तो भोजपुर-बक्सर  के महानतम किसान आन्दोलन के समर्थन में उतरे छात्र-नौजवानों के लिए काका। एक पांव जेल में तो दूसरा पांव नुक्कड़ों पर नाटकों में। उम्र साठ साल के ऊपर लेकिन जब तान खींचकर गाते- जाग बाबू जाग हमरा दूध के दुलार हो...... तो पूरा माहौल उनके ठेठ गंवई आवाज की जादू में डूब जाता। दिन भर या तो गंगा नदी में अपने नाव पर रहते या हमलोगों के साथ घुमक्कड़ी करते और शाम में देर रात तक नाटक का रिहर्सल और इसके बाद ढ़ोलक की थाप पर उनके जनगीतों का आनन्द।
 दिसम्बर महीने की एक  सर्द शाम में उनसे पहली बार मिला था मैं। तब मैं इंटर का छात्र हुआ करता था और एक संस्कृतिकर्मी। कोहरे में डूबा बक्सर का कोईरपुरवा मोहल्ला और उसके पीछे का हरिजन टोला। नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति की बैठक खत्म हुई थी और मैं ठंड से लगभग ठिठुर रहा था। जो चादर मैंने ओढ़ रखी थी वह उस कड़ाके की ठंड के आगे अपने हाथ खड़े कर चुकी थी। कुहासा पानी की बूंद बनकर टपक रहा था। अचानक एक उम्रदराज व्यक्ति ने मेरे कंधे पर हाथ रखा- अरे नन्हका, चल ना नीम के नीचे लकड़ी जरवले बानी......। नन्हक हमारे यहां प्यार से छोटे बच्चे को कहा जाता है। मैंने उनका चेहरा देखा- हल्की सफेद दाढ़ी, खिचड़ी बाल, लुंगी और बदन पर केवल एक चादर। पांव में टायर वाली चप्पल। पेड़ के नीचे जली अलाव और हंसराज ने गोरख पांडे का वह मशहूर गीत गाना शुरू किया- समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...। प्रो. विजयानंद तिवारी ने परिचय कराया- हंसराज हैं लेकिन रहबर नहीं मल्लाह।
हंसराज पढे-लिखे नहीं थे। बस अक्षर ज्ञान भर था। लेकिन जब समाज की व्याख्या करते तो सामने वाला चकित रह जाता। अदिम समाज से अब तक की व्याख्या बिलकुल एक आम आदमी के अनुभवों में शामिल घटनाओं के साथ और आम आदमी की भाषा में। पहले सीपीआई में थे और जब पार्टी टूटी तो सीपीएम के साथ आ गये। सीपीएम के टूटने के बाद सीपीआई एमएल के साथ। कभी कामरेड मोती (बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में काम करने वाले कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी नेता) को गंगा पार कराने के लिए शाम से ही नाव तैयार करते। कामरेड मोती  के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद के कई पाठ सीखे। उस दौर की बातें वे हम नौजवानों को बड़ी गर्व से सुनाते थे। वे उस दौर में गाया जाने वाला एक गीत भी सुनाते थे- गरीब लाल झंडा गौर से पहचानो...।  जेल जाना तो जैसे उनकी रूटीन में शामिल था। एक बार वे जेल गये तो मैं उनसे मिलने पहुंचा। तब उन्होंने कवि विजेन्द्र अनिल से परिचय कराया था। वे भी उनसे मिलने पहुंचे थे।
साल तो ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन ये याद है कि तब बक्सर में गंगा नदी को ठेकेदारों से मुक्त करने का आन्दोलन चल रहा था। नाविकों ने तब बड़ा बहादुराना संघर्ष छेड़ा था और पुलिस व ठेकेदार की नाक में दम कर दिया था। पुलिस और ठेकेदार के गुंडे नाविकों पर हमले कर रहे थे। हंसराजजी के कारण बक्सर से हम छात्रों का एक समूह नाविकों के बीच रहता था। उन्हीं के बीच खाना, रहना और बक्सर शहर में नाटक करके व गीत गाकर उनके लिए समर्थन जुटाना। एक बार शाम के समय गंगा नदी के किनारे हमलोग अलाव के इर्द-गिर्द बैठे हुए थे। किसी गंभीर विषय पर बहस चल रही थी। हंसराजजी की फिक्र यह थी कि आग नहीं बुझे वरना इन लड़कों को ठंड लगेगी। वे लकड़ी ला-लाकर आग में डाल रहे थे । लकड़ियां नदी के किनारे की थी इसलिए हल्की भींगी थी।  इसके कारण वे धुंआ कर रही थी। धुंआ से थोड़ी परेशानी हो रही थी। मैं उन्हें बार-बार लकड़ियां डालने से  मना कर रहा था। मेरे मना करने के बावजूद उनके द्वारा लकड़ियां डाले जाने पर पर मेरे भीतर का बौद्धिक अहंकार जागा और मैं उनपर बरस पड़ा। वे पहले तो चुपचाप सुनते रहे फिर बोले- इ लड़ाई केकर? हमार नू? फिर तू के? मुझे लगा किसी ने मुझे थप्पड़ मार दिया हो। मैंने तुरंत उनसे माफी मांगी। एक बार समकालीन जनमत में एक लेख लिखने के कारण सीआईडी के अधिकारी मेरे घर पहुंच गये। वो लगभग रेड ही थी। मेरे घर के लोग परेशान। मुझे घर पर खूब डांट पड़ी थी तब। मैं परेशान हाल जन ज्वार पत्रिका के कार्यालय में पहुंचा था और सबको यह बात बताई। हंसराजजी हंसे थे। बोले- पहिलका बेर अइसही लागेला नन्हक। फेर आदत पड़ जाला। फिर कुछ दिनों के बाद मैं पटना आ गया। यहां पढ़ाई खत्म हुई और अखबार में काम करने लगा। कुछ दिनों के बाद जब बक्सर गया तो एक धरना पर उनसे मुलाकात हुई। उसी तरह नौजवानों के साथ। उन्होंने कहा- नौकरी करताड़ हो, लइकन के कुछ खियाव। और फिर बड़े अधिकार से मेरी जेब में हाथ डालकर पैसे निकाल लिये।
इधर दो साल पहले लम्बे समय के बाद उनसे मुलाकात हुई। वे घबराये थे और उनके साथ कामेश्वर भाई भी थे। हंसराजजी ने कहा था कि कुछ लोगों ने उनके लड़के को उठा लिया है और शायद उसकी हत्या कर डाली है लेकिन बक्सर की पुलिस कुछ नहीं कर रही है। कामेश्वर भाई के साथ वे मानवाधिकार आयोग के कार्यालय भी गये थे। वे चाहते थे कि इसकी खबर छपे और पुलिस कुछ कार्रवाई करे। फिर रुंआसे स्वर में कहा था- जब संगठन कमजोर होखेला त दुश्मन बरियार हो जाला। संगठन के कमजोर ना होखे के चाही।
कम्युनिस्ट पार्टियों की आपसी फूट से वे अक्सर परेशान रहते थे। उनक मानना था कि तीनों कम्युनिस्ट पार्टियां अगर जनसंघर्षों के स्तर पर भी एकजुट हो जाएं तो हालात काफी बदल सकते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी चाहे कोई भी हो अगर उसका कोई कार्यकर्ता मुश्किल में पड़ता तो वे परेशान हो जाते थे। उनसे जुड़ी अनगिनत यादें हैं- उनकी खुशी की, उनके गुस्से की और उनके प्यार की। बराबर संगठन को मजबूत करने का सपना देखने वाले साथी हंसराज तो अब बस यादों में ही आयेंगे। लेकिन संगठन को मजबूत बनाने का उनका सपना जीवित है। न केवल बक्सर और बिहार बल्कि पूरे देश में।     

गुरुवार, 16 मई 2013

लालू का जादू या नीतीश के खिलाफ गुस्सा

कमलेश
पारा 45 डिग्री के आसपास। धूप ऐसी की चमड़ी जला डाले और गर्म हवा ऐसी जो आपके बदन के पानी का एक-एक कतरा सुखा दे। ठीक ऐसे समय में यदि हजारों लोग गांधी मैदान के बीच में घंटों बैठकर किसी के भाषण का इंतजार करते हों तो मतलब साफ है कि भाषण करने वाले का जादू उनके सर पर चढ़कर भले न बोल रहा हो लेकिन जलवा जरूर बरकरार है। 15 मई को लालू प्रसाद  की परिवर्तन रैली में आए लोग बिहार की सत्ता को यह बता रहे थे कि उसके सुशासन का जादू अब ढलान पर लुढ़कने वाला है। हाल के दिनों में नीतीश कुमार के खिलाफ यह चौथी रैली थी। पहली रैली भाकपा ने अपने कांग्रेस के मौके पर की, दूसरी रैली भाकपा माले ने की और तीसरी रैली नीतीश से अलग होने वाले उपेन्द्र कुशवाहा ने की। चौथी परिवर्तन रैली थी। इनमें से उपेन्द्र कुशवाहा की रैली को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी रैलियों में जमकर भीड़ उमड़ी और सब में जदयू-भाजपा की सरकार के खिलाफ गुस्सा दिखाई पड़ा। लालू की परिवर्तन रैली में यह गुस्सा कुछ ज्यादा ही मुखर होकर उभरा। हालांकि इस रैली के साथ ही उनपर परिवारवाद चलाने और धन के बेतहाशा खर्च के आरोप भी लग रहे हैं।

लालू की रैली एक ऐसे समय में हुई है जब एक तरह से बिहार में राजनीतिक संक्रमण का दौर चल रहा है। एक तरफ जनता दल यू में भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ जाने की बेचैनी दिखाई पड़ रही है तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद किसी भी कीमत पर कांग्रेस का साथ छोड़ने को तैयार नहीं। अगले दो जून को महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव होने जा रहा है और इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए परीक्षा माना जा रहा है। उन्होंने इस चुनाव में अपने खास मंत्री पी.के. शाही को उम्मीदवार बनाया है जबकि यह सीट राष्ट्रीय जनता दल की है। अगले पांच-छह महीने के बाद लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू होने वाली हैं। मतलब यह कि लालू प्रसाद ने अगर रैली के लिए यह समय चुना तो वह अनायास नहीं था। वह स्पष्ट रूप से आने वाली राजनीतिक घटनाओं की पहलकदमी अपने हाथ में लेना चाहते थे।
अगर रैली में उमड़ी भीड़ का आकलन किया जाए तो निश्चित रूप से लालू अपनी योजना में सफल रहे हैं। जिस तरह से 14 मई की रात से ही लोगों का पटना आना शुरू हुआ वह राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डालने वाला था। 15 मई को सुबह आठ बजे से लोग सड़कों पर उतर आये थे। बारह बजते-बजते राजधानी पटना की सारी ट्रैफिक ठप हो गई थी और एक तरह से इन सड़कों पर दूर-दराज के गांवों से आये लोगों का कब्जा हो चुका था। लालू प्रसाद खुद रैली में तीन बजे पहुंचे लेकिन गांधी मैदान में लोगों का जुटान सुबह से होने लगा था। शायद यही कारण था कि धूप से परेशान लोग लालू प्रसाद के आने के साथ गांधी मैदान से निकलने भी लगे थे। लेकिन लालू प्रसाद को पता था कि उन्हें भाषण मे क्या बोलना है। उन्होंने सबसे पहले दलितों और पिछड़ों के सम्मान का मसला उठाया और लोगों से कहा कि आज जब वे बीडीओ के ऑफिस में जाते हैं तो बीडीओ उनके साथ कैसा व्यवहार करता है? थाने में दारोगा उनके साथ किस भाषा में बात करता है? उन्होंने सवाल किया कि बिहार में किनकी बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है? दरभंगा, मधुबनी और किशनगंज के मुसलमान नौजवानों को आतंकवादी बताकर क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है? इस मसले पर इस सरकार की जुबान बंद क्यों है? उन्होंने कांट्रैक्ट पर काम करने वाले शिक्षकों, डॉटरों और इंजीनियरों का मसला उठाया और लोगों को याद दिलाया कि जब वे अपनी मांग को लेकर पटना जाते हैं तो पुलिस किस तरह न केवल उनपर लाठी चलाती है बल्कि उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाती भी है। इन सवालों पर भीड़ की प्रतिक्रिया देखने लायक थी।
इस रैली के साथ लालू प्रसाद की शारीरिक भाषा भी बदली है। वे पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे दिखाई पड़ रहे हैं। रैली में जिस तरह पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी हुई है उससे उन्हें लगा है उनका टूटा हुआ जनाधार एक बार फिर उनके साथ जुड़ रहा है। इस रैली में वे सवर्ण जातियां भी लालू के साथ खड़ी नजर आई जो नीतीश सरकार से नाराज हैं। जाहिर है कि इस रैली  के साथ उन्होंने कांग्रेस को यह संदेश देने की कोशिश की है अभी भी उसके लिए बिहार में गठबंधन के लिए उनसे मजबूत दूसरा कोई नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ इस रैली के साथ लालू प्रसाद पर लगने वाला परिवारवाद का आरोप और भी मजबूत हुआ है। इस रैली में उनके दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी को जिस तरह से आगे किया गया उससे लालू पर हमले भी तेज हुए हैं। लालू के दोनों पुत्रों ने हालांकि रैली में भाषण नहीं दिया लेकिन वे मंच पर जिस तरह से आये उससे कई पुराने नेताओं का रंग फीका हुआ। रैली के प्रचार के दौरान भी दोनों पुत्रों को जिस तरह हीरो बनाया गया उससे कई नेताओं को अपनी उपेक्षा का अहसास हुआ है। बेटी मीसा भारती भी मंच पर दिखीं और पत्नी राबड़ी देवी तो पार्टी की कद्दावर नेता हैं ही। इन सबके बावजूद बिहार में नीतीश से नाराज लोगों को कोइ दूसरा विकल्प अब तक दिखाई नहीं पड़ रहा है। पिछले दिनों वामपंथी दलों ने संयुक्त मोर्चा बनाकर जनता के बीच जाने का ऐलान जरूर किया था लेकिन ऐसी कोई पहल कदमी दिखाई नहीं पड़ रही है।
इस रैली में लालू प्रसाद की अमीरी भी दिखाई पड़ी।  रैली में आदमी को लाने के लिए सात ट्रेनें बुक की गई थीं और इसके लिए रेलवे को डेढ़ करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया। इसके अलावा पूरे पटना को होर्डिंग और बैनरों से पाट दिया गया था। राजधानी में बसों की कतार लग गई थी। ऐसी कोई मंहगी गाड़ी नहीं जिसपर राजद के नेता नहीं पहुंचे हों। आयकर विभाग ने भी राष्ट्रीय जनता दल को नोटिस देकर पूछा है कि आखिर इस रैली पर उसने कितना पैसा खर्च किया। उसने पूरा हिसाब-किताब मांगा है।

शनिवार, 11 मई 2013

अलविदा साथी गंगेश, आप बहुत याद आएंगे

गंगेश आप बहुत याद आएंगे ( उनकी फोटो)
-कमलेश

इस पेशे की यही विसंगति है। आपके साथ रोज काम करने वाला साथी अचानक इस दुनिया को विदा कह देता है और आपके पास इस  दारूण दुख को बर्दाश्त करने का समय भी नहीं होता। आप एक दिन के लिए भी खबरों की रफ्तार से बाहर निकलकर अपने दोस्त को याद करने के लिए नहीं रुक सकते। आपके लिए अपने मित्र की मौत की खबर भी अखबार में छपने वाली एक खबर भर हो जाती है। आज फिर ऐसा ही हुआ। अपने दोस्त, साथी, मित्र और सुख-दुख के राजदार गंगेश श्रीवास्तव अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। हमने खबर सुनी, एक मिनट के लिए आह किया और फिर अपने काम में जुट गये। उनके डेस्क पर किसी और साथी को काम करते हुए देखकर उनका चेहरा आंखों के सामने घूमा लेकिन अखबार की तेजरफ्तार जिंदगी ने कुछ सोचने का समय ही नहीं दिया।
वे मुझे हमेशा भाई साहब कहते थे। उम्र में मुझसे काफी छोटे थे। चार साल से हमलोग एक दूसरे के साथ काम कर रहे थे। ईश्वर से डरने वाले और कभी किसी का अहित नहीं करने वाले गंगेश। सांवला-सलोना चेहरा, बोलती हुई सी बड़ी आंखें, होठों पर हमेशा मुस्कुराहट, पतला-दुबला शरीर और अक्सर माथे पर झूलते केश। देखकर शायद ही कोई कह सकता था कि ये शादी-शुदा आदमी हैं। हमेशा इस बात को लेकर सावधान रहते कि उनके कारण किसी को परेशानी नहीं हो। तकरीबन दो साल पहले मैं और गंगेश दफ्तर की एक जरूरी मीटिंग के सिलसिले में दिल्ली गये थे। हमें एक प्रजेन्टेशन देना था। सारा प्रेजेन्टेशन गंगेश ने रात भर जगकर तैयार किया था। मुझे केवल इसे लोगों के सामने रखना था। मैंने कहा था उनसे- गंगेशजी, सारी मेहनत आपने की है तो प्रेजेन्टेशन भी आपको करनी चाहिए। गंगेश मुस्कुराकर बोले थे- अरे भाई साहब, आदमी को वही काम करना चाहिए जो वह अच्छी तरह कर सकता हो। मैंने इसे अच्छी तरह तैयार कर दिया है अ‍ैर अब आप इसे अच्छी तरह प्रस्तुत कर दीजिए। दिल्ली में इस बात को लेकर हमेशा सावधान रहे कि मुझे तो कोई परेशानी नहीं हो रही है। पटना कार्यालय में कभी-कभी मेरी टेबुल के सामने आते थे और कहते थे- भाई साहब, मुझे फलां खबर में इस तरह का इनपुट चाहिए। प्लीज दिलवा दीजिए। मैं परेशान। संबंधित रिपोर्टर चला गया। मुझे मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं। मैं कहता- गंगेशजी, रिपोर्टर तो चला गया है। अब मैं ही कुछ कोशिश करके देखता हूं। मेरी परेशानी देखते ही मुस्कुरा देते गंगेशजी। कहते- रहने दीजिए भाई साहब, मैं कर लूंगा। टेंशन मत लीजिए।
जब गंगेशजी ने हिन्दुस्तान पटना ज्वाइन किया था तो तत्कालीन संपादक अकु श्रीवास्तव ने उनसे मेरा परिचय कराते हुए कहा था- अब तुम इस आदमी का कमाल देखना। इसकी भोली सूरत पर मत जाना। कमाल तो इसकी अंगुलियों में है। सचमुच अगले ही दिन से गंगेश का जादू पेज पर दिखने लगा था। ले आउट और डिजाइन के तो मास्टर थे वो आदमी। एक बार काम में लगे तो काम पूरा कर ही डालना है। पूरी रात जगकर काम करने के बाद भी अगले दिन फिर समय पर मुस्कुराते हुए ऑफिस पहुंचना। किसी से कोई शिकायत नहीं। तत्काल निर्णय लेने की जबर्दस्त क्षमता थी। मात्र यही नहीं जो निर्णय लेते उसे तत्काल लागू भी करते थे। 
मुझसे कई बार थोड़ी-बहुत बहस भी होती थी। उनके आने के कुछ दिनों के बाद। लेकिन जल्दी ही हमलोग अच्छे दोस्त बन गये थे। वे निरंकारी संत समाज से जुड़े थे। कई बार उसकी खबर लेकर आते तो मुझे यह याद दिलाना नहीं भूलते कि मैं वामपंथी आदमी हूं। लेकिन अगले दिन अच्छी खबर देखकर मिलते ही मुस्कुरा देते थे। जिस दिन वे अखबार की समीक्षा करने बैठते, मैं तो डर जाता था। हर चीज पर बारीक नजर। खबरों को लेकर एकदम अलर्ट। किसी खबर से जुड़ी कौन सी खबर कब छपी है यह उन्हें हमेशा याद रहती थी।
काम के दौरान साथियों के साथ खूब हंसी-ठिठोली करते। पटना सिटी से आने वाले नवलजी से खुरचन खिलाने की जिद करना तो महेन्द्र झा से ठिठोली करना। कभी सत्येन्द्र पाण्डेयजी से कहना- महाराज, आप तो युवा के इंचार्ज हैं। खिलाना तो आपका हक बनता है। और जब तक सत्येन्द्रजी मिठाइयां न मंगा दें, उनका पीछा नहीं छोड़ते थे। सचिन तेंदुलकर ने शतक ठोंकी नहीं कि पहुंच जाते थे सुनील झा के डेस्क के आगे। उसके बाद शुरू हो जाती जिद- भाई साहब, जब तक आप चंद्रकला और समोसा नहीं मंगायेंगे तब तक पता कैसे चलेगा कि सचिन ने शतक बनाई है। वे तब तक सुनील झा का पीछा नहीं छोड़ते जबतक कि वे उनकी फरमाइश पूरी नहीं कर देते। दशहरे में खुद जलेबियां मंगाते और सबको बुलाकर खिलाते। फिर कहते- जलेबियां नहीं तो दशहरे का मजा कहां साहब।
माता-पिता के इकलौते पुत्र थे गंगेश। पिता बहुत बीमार रहते थे। इसके चलते कभी गांव, कभी पटना तो कभी अस्पताल का चक्कर। लेकिन क्या मजाल कि कभी कोइ शिकन भी उनके चेहरे पर आ जाए। पिछले साल ही उनके पिता का निधन हुआ था। तब बहुत दुखी हुए थे। पिता के वे कितने करीब थे यह उस समय दिखाई पड़ा था। अभी उस सदमे से उबरे ही थे कि मौत ने पंजा मारकर उन्हें हमसे छीन लिया। अब उनकी यादें भर हमारे साथ रहेंगी लेकिन ये यादें तब तक हमारे पास रहेंगी जबतक अखबार के कागजों की खुशबू बरकरार रहेगी। अलविदा साथी गंगेश, आप बहुत याद आएंगे। 

रविवार, 17 मार्च 2013

मौत के 38 साल बाद जी उठे डॉ. निर्मल

 -कमलेश
बिहार के किसानों के युद्ध के नायक रह चुके  डॉ. निर्मल की प्रतिमा उनके अपने कॉलेज दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर में क्या लगी, राजनीतिक हलकों से लेकर चिकित्सकों तक के बीच जैसे तूफान खड़ा हो गया है। भाजपाइयों ने दरभंगा से लेकर पटना तक में सरकार पर दबाव डाला और   स्वास्थ्य मंत्री बने अश्विनी कुमार चौबे ने यह घोषणा की कि सरकार दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर से डॉ. निर्मल की प्रतिमा को हटा लेगी। सरकार की इस घोषणा का विरोध शुरू हो गया है, कई सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार और डॉ. निर्मल के बैच के छात्र रहे कई डॉक्टर सरकार के इस फैसले का विरोध करने दरभंगा पहुंच गये हैं...



कहते हैं फिनिक्स पक्षी अपनी राख से जी उठता है। पता नहीं मिस्र की यह कहावत सच है या नहीं लेकिन बिहार के किसानों के युद्ध के नायक रह चुके डॉ. निर्मल अपनी मौत के 38 वर्ष के बाद मानो अचानक जी उठे हैं। डॉ. निर्मल सिंह, कामरेड निर्मल और नक्सलवादियों की भाषा में शहीद डॉ. निर्मल। उनके नाम को लेकर जितनी बहस अभी चल रही है उतनी तो तब भी नहीं हुई थी जब उन्होंने मेडिकल शिक्षा का शानदार कॅरियर छोड़कर भोजपुर के धधकते खेत-खलिहानों में नक्सलवादी आन्दोलन की राह पकड़ी थी। पुलिस से घंटों लड़ाई लड़ने के बाद जब उनकी लाश पाई गई थी तब लोगों को पता चला था कि किसानों द्वारा चलाये जा रहे उस मुक्ति युद्ध में कितने मेधावी लोग अपनी जिन्दगी होम कर रहे हैं। उसी डॉ. निर्मल की प्रतिमा उनके अपने कॉलेज दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर में क्या लगी, राजनीतिक हलकों से लेकर चिकित्सकों तक के बीच जैसे तूफान खड़ा हो गया है। भाजपा के नगर विधायक संजय सरावगी के नेतृत्व में भाजपाई लोगों ने डॉ. निर्मल की प्रतिमा लगाये जाने का इस आधार पर विरोध किया कि एक नक्सली नेता की प्रतिमा कॉलेज परिसर में कैसे लग सकती है। भाजपाइयों ने दरभंगा से लेकर पटना तक में सरकार पर दबाव डाला और  विधान परिषद में भाजपा के कोटे से स्वास्थ्य मंत्री बने अश्विनी कुमार चौबे ने यह घोषणा की कि सरकार दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर से डॉ. निर्मल की प्रतिमा को हटा लेगी। अब सरकार की इस घोषणा को लेकर मानो पूरे बिहार में तूफान खड़ा हो गया है। सरकार की इस घोषणा का विरोध शुरू हो गया है और भाकपा, माकपा और भाकपा माले ने इसके खिलाफ आन्दोलन शुरू कर दिया है। मात्र यही नहीं कई सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार और डॉ. निर्मल के बैच के छात्र रहे कई डॉक्टर सरकार के इस फैसले का विरोध करने दरभंगा पहुंच गये हैं। 
निर्मल सिंह भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के बरौरा के रहने वाले थे। वे एक मेधावी छात्र थे और 1968 में उन्होंने दरभंगा मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था। भले वे मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे थे लेकिन समाज में व्याप्त गैरबराबरी उन्हें बराबर परेशान करती थी। उसी समय भोजपुर जिले में जगदीश मास्टर के नेतृत्व में नक्सलवादी आन्दोलन तेज हुआ। 1971 में वे बिहार में चल रहे नक्सलवादी आन्दोलन में शामिल हो गये और उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी। लोगों को इसका पता तब चला जब दरभंगा मेडिकल कॉलेज में एक बम विस्फोट के बाद नक्सलवादी आन्दोलन के समर्थन में पर्चे बांटे गये। नक्सलवादी संगठन के लिए भी वे एक अच्छे संगठनकर्ता साबित हुए। बाद में वे सीपीआई एमएल के तत्कालीन महासचिव जौहर के साथ एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। यह मुठभेड़ भोजपुर जिले के बाबूबांध गांव में 1975 में हुई थी। कहते हैं, पूरी रात मुठभेड़ चली थी। नक्सली दस्ते की सारी गोलियां खत्म हो गईं लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया और आखिरकार लड़ते-लड़ते मारे गये। नक्सलवादी संगठन आज भी निर्मल को अपने नेता के रूप में श्रद्धा के साथ याद करते हैं। भोजपुर जिले में आज भी एक गीत गाया जाता है- जब-जब याद आवे बाबूबांध के कहनिया, अंखिया भरि आवे ए साथी.....।
दरभंगा जिले में काम कर रहे भाकपा माले की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य धीरेन्द्र कुमार झा बताते हैं कि पिछले साल दरभंगा मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्रों की एक बैठक हुई। इस बैठक में दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर के सौंदर्यीकरण का फैसला लिया गया। इसके तहत कई काम हुए मसलन तालाब बना, पार्क बना और कई पूर्व छात्रों के नाम पर नये काम शुरू हुए। इसी क्रम में पिछले 27 जनवरी को दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर में डॉ. निर्मल की भी मूर्ति लगाई गई। चूंकि वे भी इसी कॉलेज के छात्र थे इसलिए पूर्व छात्रों ने उन्हें भी याद किया। मूर्ति के निर्माण के लिए कॉलेज के पूर्व छात्रों ने जमकर मदद भी की। देश ही नहीं विदेशों में भी कार्यरत चिकित्सकों ने इसके लिए पैसे भेजें। उस समय कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य डॉ. अजीत चौधरी थे। वे अभी कॉलेज में पैथोलॉजी विभाग के अध्यक्ष हैं। उनके अलावा कॉलेज के ही एक अन्य शिक्षक डॉ. बीएमपी यादव ने भी इसमें मदद की। वे डॉ. निर्मल के बैच के छात्र थे।
 लेकिन इस प्रतिमा को लगाने के बाद भाजपा से जुड़े लोगों ने इसको लेकर जमकर हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने कॉलेज परिसर से प्रतिमा को हटाने की मांग की। मामला विधान परिषद में भी उठाया गया और वहां सरकार ने कहा कि उस प्रतिमा को तीन दिनों के भीतर हटा दिया जाएगा। अब सरकार के इस फैसले के खिलाफ दरभंगा में आन्दोलन शुरू हो गया है। राजधानी से साहित्यकार प्रेमकुमार मणि और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राजेश्वर आदि ने दरभंगा पहुंचकर सरकार के फैसले का विरोध किया। मात्र यही नहीं तीनों वाम दलों के साथ-साथ राजद और जनता दल यू के भी जमीनी हिस्से ने प्रतिमा को हटाने का विरोध किया है। दूसरी तरफ प्रतिमा लगाने की अनुमति देने वाले तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य के खिलाफ कॉलेज प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है और उनके खिलाफ मुकदमा भी कर दिया है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अरुण कुमार ठाकुर का कहना है कि वे चाहते हैं कि कॉलेज में शांति बहाल हो और चिकित्सक के खिलाफ की गई कार्रवाई वापस हो। उनका यह भी कहना है कि परिसर में लगी प्रतिमा के बारे में जनहित के अनुसार और नियमानुकूल फैसला लेना चाहिए।     

शनिवार, 10 नवंबर 2012

कई संभावनाओं के द्वार खोल गई माले की रैली

कमलेश
भाकपा माले की रैली 9 नवम्बर को संपन्न हुई। न कोई ताम-झाम और न पटना जैसे शहर में कोई गेट न होर्डिंग्स। न शहर में पोस्टर सटे न परचे बंटे। यह पहला मौका था जब माले की कोई रैली हुई हो और शहर की दीवारें वाल राइटिंग से खाली  रह गई। न तो शहर में कहीं माले का लाल झंडों से सजा-धजा प्रचार वाहन दिखा और ना ही राजधानी में कहीं नुक्कड़ सभा देखने को मिली। न मशाल जुलूस निकला और ना प्रचार जुलूस के जत्थे दिखे। लेकिन फिर भी रैली में लोग उमड़े और जमकर उमड़े। पूरा गांधी मैदान लाल हो गया। लोग और लोगों के हाथ में लाल झंडा। ठीक चार दिन पहले धन की रैली करने वाले जन की इस रैली को देखकर मुंह छिपाने लगे। देखने वाले शहर के लोगों ने कहा- काफी दिनों के बाद विपक्ष में रहने वाले किसी दल ने इतनी बड़ी और शानदार रैली की।
भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने खुद कहा- भाकपा माले ने खुद अपना ही रिकार्ड तोड़ा है। उनके अनुसार यह भाकपा माले की अब तक की सबसे बड़ी रैली थी। श्री भट्टाचार्य सही थे। पिछले दिनों सीपीआई के कांग्रेस के समय भी रैली हुई थी। वह भी रैली बड़ी थी लेकिन माले की इस रैली ने लोगों को जुटाने के मामले सीपीआई की उस रैली को पीछे छोड़ दिया। कहने की जरूरत नहीं कि इस रैली में पहुंचे लोग अपने संसाधनों से आये थे। पूरी रात उन्होंने गांधी मैदान में खाली आसमान के नीचे ठंड में गुजारी और अहले सुबह से रैली में जुट गये। खाने का सामान भी लोग खुद अपना लेकर आये थे। रात भर गांधी मैदान के कई कोनों में गीत गूंजा- जनता के आवे पलटनिया, हिलेले झकझोर दुनिया।

बिहार के राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि भाकपा माले की यह रैली राजनीतिक रूप से थोड़ी अलग रही। अलग इस मामले में कि इसने राज्य में नई राजनीतिक संभावनाओं के द्वार खोले हैं। रैली के मंच पर एक नये गठबंधन का भ्रूण रूप दिखाई पड़ा। अपने भाषण के दौरान माले महासचिव ने राज्य में तीसरे मोर्चे के गठन की ओर बढ़ने का संकेत देकर इस संभावना को और मजबूत करने की कोशिश की। मंच पर न केवल विभिन्न वामपंथी दलों के नेता मौजूद थे बल्कि समाजवादी धड़े के लोग भी शामिल थे। मंच पर समाजवादियों को देखकर कई लोग चौंके। चौंकना भी स्वाभाविक था। पिछले कुछ समय से इन दोनों धाराओं के बीच की खाई थोड़ी गहरी दिख रही थी। भाकपा, माकपा और माले के नेता तो सीपीआई की कांग्रेस में भी एक मंच पर आए और उन्होंने वामपंथी दलों की एकता को समय की जरूरत बताया था। इस रैली में भी यही हुआ। माकपा के राज्य सचिव विजयकांत ठाकुर ने तो यहां तक कहा कि अनुभवों से यह साबित हुआ है कि बुर्जुआ दलों के साथ गठबंधन से वे दल तो मजबूत हो जाते हैं लेकिन वामपंथी दलों के लिए इसका अनुभव अच्छा नहीं होता है। सीपीआई के राज्य सचिव राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने भी कहा कि नीचे के स्तर पर वामपंथी दलों की एकता पर बात होने लगी है। लिहाजा इन बातों का शायद उतना महत्व न भी हो क्योंकि अमूमन चुनाव के पहले वामपंथी दलों के नेता ऐसी बातें करते रहते हैं लेकिन चुनाव के दौरान उनके लिए दूसरे एजेंडे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस रैली में खास बात उन समाजवादियों का जुटना रहा जो अभी न तो लालू प्रसाद के खेमे में हैं और ना ही नीतीश कुमार या शरद यादव के खेमे में। लेकिन वे किसी न किसी स्तर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। मसलन मंच से भाषण करने वालों में पूर्व मंत्री और समाजवादी नेता हिंदकेशरी यादव भी मौजूद थे। अभी श्री यादव मुजफ्फरपुर और इसके आसपास के इलाकों में शराब विरोधी आन्दोलन चला रहे हैं और इनके आन्दोलन से घबराये शराब माफियाओं ने इन्हें पिछले दिनों बुरी तरह से पीटा था।
इस मंच पर बिहार के प्रमुख समाजवादी नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री देवेन्द्र प्रसाद यादव भी मौजूद थे। श्री यादव अभी नीतीश और लालू दोनों से दूर हैं। हालांकि देवेन्द्र प्रसाद यादव ने कई बार अपने ही दल के भीतर जनतांत्रिक स्वरूप बहाल करने की लड़ाई लड़ी है और इसके लिए वे चर्चित भी रहे हैं। भाकपा माले की रैली में देवेन्द्र प्रसाद यादव ने एक मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि भाकपा माले जिस तीसरे मोर्चे की बात कर रहा है अगर वह बनता है तो बड़े भाई (लालू प्रसाद) और छोटे भाई (नीतीश कुमार) फिर एक हो जाएंगे। माले के मंच पर समाजवादी नेता रामदेव सिंह यादव को भी देखना लोगों के लिए सुखद रहा।
मतलब यह कि आने वाले दिनों में हाशिये पर पड़े समाजवादियों और वामपंथियों के बीच अगर एकता होती है तो यह बिहार की राजनीति में एक नई बात होगी। लम्बे समय के बाद बिहार की राजनीति में ऐसी कोई संभावना आई है। एक बार समता पार्टी और भाकपा माले मिलकर चुनाव लड़े थे लेकिन वह संभावना जितनी जल्दी सामने आई उससे भी ज्यादा तेजी से लुप्त हो गई थी। चुनाव के नतीजे भी इतने खराब थे कि दुबारा उसके बारे में सोचा नहीं जा सकता था। सीपीआई और सीपीएम लम्बे समय तक राजद के साथ मोर्चे में रहे। माकपा तो हाल-हाल तक रही। लेकिन इन तमाम गठबंधनों में समाजवादी ताकतें निर्णायक भूमिका में रहती थीं और वामपंथियों को उनका अनुसरण करना पड़ता था। इस बार अगर कोई मोर्चा दोनों ताकतों के बीच बनता है तो जाहिर है कि वामपंथी निर्णायक भूमिका में रहेंगे और ये एक नई बात होगी। हाशिये पर पड़े ये समाजवादी अपने स्तर से लड़-भिड़ तो रहे हैं लेकिन किसी मजबूत केन्द्र से जुड़ाव नहीं होने के कारण उनकी लड़ाई स्थानीय स्तर पर ही सीमित रह जाती है। अगर वामपंथियों के साथ उनकी लड़ाई जुड़ती है तो इसके सार्थक नतीजे आ सकते है।  

रविवार, 23 सितंबर 2012






बचेंगे तो सहर देखेंगे
कमलेश
भारत बंद के ठीक अगले दिन हमलोग कुछ खुदरा व्यवसायियों और कुछ लघु उद्यमियों से मिलने पहुंचे थे। हम जानना चाहते थे कि खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर वे क्या सोचते हैं जो इससे सीधे प्रभावित होने वाले हैं। दलदली रोड, बीएमपी रोड और बोरिंग रोड के कुछ इलाके खुदरा व्यापार के बड़े इलाके हैं। खासकर दलदली में खुदरा दुकानों से खरीदारी करने के लिए पूरे पटना से लोग आते हैं।
खुदरा व्यवसायी इस मामले में बहुत आंकड़ेबाजी के बारे में नहीं जानते। कुछ लोगों ने तो वालमार्ट का नाम भी पहली बार सुना है। हालांकि अधिकतर दुकानदारों ने कहा कि इसके खिलाफ हुए बंद में वे पूरी तरह शामिल थे और उन्होंने खुद अपनी दुकानों को बंद रखा था।
 खुदरा व्यवसायियों के नेता हैं रमेश चंद्र तलरेजा। बिल्कुल पारंपरिक अंदाज में धोती-कुरता पहनने वाले तलरेजा देखने से ही खुदरा व्यापारी के प्रतिरूप लगते हैं। एफडीआई को लेकर उनकी जानकारी अद्भुत थी और उन्होंने बिल्कुल जमीनी अंदाज में समझाया कि एफडीआई का असर उनके व्यवसाय पर किस तरह पड़ेगा। उनसे बात शुरू हुई तो वे पहले हंसे और फिर धीरे से कहा- वाल मार्ट तो अभी दूर है। संकट तो अभी से शुरू हो गया है। खुदरा दुकानदारों की रोजी-रोटी पर तो अभी से ही बिजली गिरने लगी है। आज की तारीख में हमारे 15 फीसदी ग्राहक हमसे अलग हो गए हैं। हमारे ये ग्राहक ऐसे थे जो नकद ग्राहक थे और जिनके यहां से उधार की कोई गुंजाइश नहीं थी।
हमारे नहीं समझने पर तलरेजाजी ने समझाने वाले अंदाज में कहा- हाल के दिनों में पटना में खरीदारी की सूरत पूरी तरह बदल गई है। पटना में इधर के दिनों में तेजी से खुल रहे मेगा मार्ट और मॉल ने हमारे धंधे को चौपट करने की शुरूआत कर दी है। उनके अनुसार पटना में खुदरा दुकानदारों की ये स्थिति तब हुई है जब शहर में केवल एक मॉल है। अभी दो-तीन मॉल खुलने वाले हैं। इनके खुलने के बाद तो और हालत खराब हो जाएगी। इसके बाद हम वॉलमार्ट से लड़ने लायक बचेंगे तब तो लड़ेंगे।
उनके अलावा पटना के दूसरे इलाकों के भी कई अन्य खुदरा व्यापारियों से बात करने के बाद जो तस्वीर उभरती है वह सचमुच भयावह है। यह इस बात को भी बताता है कि हम किस तरह छोटे और मंझोले दुकानदारों को उनके भाग्य पर छोड़ते जा रहे हैं। छोटे और मंझोले खुदरा व्यपारी अमूमन अपने ग्राहकों को तीन श्रेणी में बांटते हैं। पहली श्रेणी में वैसे ग्राहक होते हैं जो पूरी खरीदारी हर महीने में एक साथ और नकद करते हैं। ये ग्राहक महीने में एक दिन आते हैं और एक साथ पूरे महीने की खरीदारी कर लेते हैं। ऐसे ग्राहक इन छोटे दुकानों की जान होते हैं क्योंकि इनसे उन्हें एकमुश्त पैसा मिल जाता है। दुकानदारों की भाषा में ये बड़े लोग होते हैं। दूसरी श्रेणी में वैसे ग्राहक होते हैं जिनके साथ उधार खाते का हिसाब चलता है। ये ग्राहक भी खरीदारी तो खुद महीने में एक बार करते हैं लेकिन इनके यहां से पैसा रुक-रुक कर आता है। तीसरी श्रेणी में पूरे महीने छोटी-मोटी खरीदारी करने वाले लोग होते हैं। इनके साथ भी उधार-खाते का संबंध निरंतर चलता है। दुकानदारों के अनुसार तीसरी श्रेणी के लोगों के भरोसे धंधा नहीं चल सकता है।
राजधानी में पहले विशाल मेगामार्ट खुला और उसके बाद पीएनएम मॉल। खासकर मॉल खुलने के बाद खुदरा व्यापारियों ने पाया कि उनके यहां पहली श्रेणी के खरीदारों का आना कम हो रहा है। अब तो धीरे-धीरे पूरी तरह बंद हो गया है। दरअसल अब इन खरीदारों को मॉल और मेगा मार्ट में खरीदारी के साथ-साथ घूमने-फिरने की भी जगह मिल गई है। ये अपने परिवार के साथ मॉल जाते हैं, मौज-मस्ती करते हैं और सामान खरीदकर वापस आ जाते हैं। अब दलदली रोड जैसे जगहों की दुकानें उनके लिए दूसरी प्राथमिकता की दुकान रह गई हैं। मतलब इन दुकानों में वे बीच-बीच में उस समय चले जाते हैं जब उन्हें अचानक किसी खास चीज की जरूरत पड़ जाती है और वे उस एकमात्र चीज के लिए मॉल नहीं जा सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी के घर में बीच महीने में अचानक घी खत्म हो जाती है तो वह जरूर इन छोटी दुकानों में जाता है। अलबत्ता दूसरी और तीसरी श्रेणी के दुकानदार अभी भी पूरी तरह ऐसी ही दुकानों के साथ हैं।
अभी केवल पाटलिपुत्र कॉलोनी में ही मॉल होने का लाभ भी इन छोटी दुकानों को मिल जा रहा है। दूरी वाले इलाकों के लोग सप्ताह में एक दिन या कम से कम महीने में एक दिन मॉल जा रहे हैं लेकिन जब राजापुर पुल और स्टेशन के आसपास के इलाकों में बन रहे मॉल खुल जाएंगे जिनके खुलने की बात चल रही है तो फिर इन छोटी दुकानों का क्या होगा? ये सोचकर ही ये दुकानदार डर जा रहे हैं। खुद तलरेजाजी ने सलाह दी कि हमें पीएनएम मॉल के आसपास के इलाकों में पहले से चलने वाली छोटी दुकानों का सर्वे करना चाहिए और देखना चाहिए कि मॉल खुलने के बाद उनकी बिक्री पर कितना असर पड़ा है। मॉल और मेगा मार्ट के अलावा नाइन टू नाइन और दूसरे बड़े शॅपिंग स्टोरों ने उनकी हालत खराब कर दी है। दुकानदारों को तो अब यह डर भी सता रहा है कि जब मॉल की संख्या ज्यादा हो जाएगी तो दूसरी श्रेणी के भी ग्राहक उनके पास से हटने लगेंगे। और तब उनके पास केवल ऐसे ग्राहक ही बचेंगे जो छोटी-छोटी खरीदारी करेंगे और इसका भी अधिकतर हिस्सा उधार खरीदारी का रहेंगा।
ये पटना के विकास का नया चेहरा है। यहां डॉमिनोज खुला, नेरुलाज खुलने जा रहा है और अब केएफसी की बात हो रही है। इनकी खूब चर्चा हो रही है। लेकिन जिन इलाकों में ये खुल रहे हैं उन इलाकों में छोटी-मोटी चाय-नाश्ते की दुकानें बंद होती जा रही हैं। ये बेरोजगार हो रहे लोग अभी क्या कर रहे हैं- ये जानना भी दिलचस्प होगा। 

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

सामने आया पुलिस का महिला विरोधी चेहरा

पीयूसीएल ने जारी की दो घटनाओं की जांच रिपोर्ट
कमलेश
पीयूसीएल ने एक बार फिर बिहार के दो बलात्कार कांडों की जांच रिपोर्ट जारी की है। दोनों ही मामलों में बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या कर दी गई। एक मामले में तो पीड़िता आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची थी जबकि दूसरे मामले में पांच बच्चों की मां। दोनों ही मामलों में पुलिस ने निहायत ही लापरवाही और गैर जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाया। दोनों ही मामलों में पुलिस पर अपराधियों के साथ सांठ-गांठ का आरोप लगा। बलात्कार के एक मामले में जहां पीड़िता अति पिछड़ी जाति की थी, पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज नहीं की। बाद में जब सामाजिक कार्यकर्ता-पत्रकार अनिल प्रकाश और पूर्व आईजी रामचंद्र खान आदि ने पुलिस पर दबाव बनाया तब जाकर एफआईआर तो दर्ज की गई लेकिन यहां मामला बलात्कार के बजाय दुर्घटना का बताया गया। जिस टीम ने इन दोनों घटनाओं की जांच रिपोर्ट जारी की है उसमें पीयूसीएल की प्रदेश उपाध्यक्ष प्रो. डेजी नारायण, शाहिद कमाल, पूर्व सचिव और पत्रकार निवेदिता झा, राज्य महासचिव जितेन्द्र और सदस्य राजेश्वर पासवान शामिल थे। 

बलात्कार के बाद बच्ची को मार डाला
पहला मामला मुजफ्फरपुर जिले के कटरा थाने के सीयातपुर पंचायत स्थित कोप्पी गांव का है। 12 जुलाई को गांव के रवीन्द्र सिंह की 14 साल की बेटी खुशबू कुमारी शाम में छह बजे बगीचे में नित्य क्रिया से निवृत्त होने गई थी। यह बगीचा गांव के दक्षिण में है। जब वह एक घंटे तक वापस नहीं लौटी तो घरवालों ने उसकी तलाश शुरू की। काफी तलाश के बाद घरवालों ने गांव के लोगों की मदद से खुशबू की लाश झाड़ियों से बरामद की। उसके ही दुपट्टे से गला दबाकर उसे मार डाला गया था। उसके शरीर के नीचे के कपड़े खून से तर-बतर थे। खुशबू की लाश रात दस बजे घर लाई गई। घर वालों ने गांव के चौकीदार के माध्यम से कटरा थाने की पुलिस को खबर दी लेकिन पुलिस कई घंटे गुजर जाने के बावजूद नहीं पहुंची।
घर के लोगों ने पीयूसीएल की टीम से कहा कि खुशबू के हत्यारों ने पुलिस को रिश्वत दिये थे इसीलिए पुलिस समय पर नहीं आई। घर के लोगों ने खुशबू के साथ बलात्कार और हत्या का आरोप गांव के ही अवधेश सिंह, त्रिलोक सिंह, सुभाष, पंकज सिंह पर लगाया। ये लोग पीड़िता के परिवार के रिश्तेदार थे। लेकिन पीड़िता के चाचा देवेन्द्र सिंह ने पुलिस को जो शिकायत दर्ज कराई उसमें अवधेश सिंह, त्रिलोक सिंह और पंकज सिंह को आरोपित किया गया था। शिकायत में यह भी कहा गया था कि आरोपित पीड़िता के परिवार को बराबर धमकाते रहते हैं। घरवालों का कहना है कि आरोपित और उनके परिजन बराबर उनपर केस उठा लेने की धमकी देते रहते हैं। इस घटना के बाद रवीन्द्र सिंह के घर की खास कर कॉलेज जाने वाली लड़कियां भयभीत रहती हैं और घर की महिलाओं को भी सहमकर ही बाहर निकलना पड़ता है।
चश्मदीद गवाह को भी मिल रही धमकी
इस घटना के एक गवाह सुरेश सहनी बूढ़े आदमी हैं और बगीचे में ही पहले हिस्से में झोपड़ी बनाकर रहते हैं। उन्होंने पीयूसीएल की टीम को बताया कि उन्होंने शाम में सात बजे के आसपास खुशबू कुमारी को बगीचे की तरफ जाते हुए देखा था। उस समय अंधेरा फैल गया था। अवधेश सिंह, त्रिलोक सिंह, पंकज सिंह और सुभाष सिंह उसकी झोपड़ी में नशे की हालत में बैठे थे। उनलोगों ने भी खुशबू को बगीचे की तरफ जाते हुए देखा। कुछ ही मिनटों के बाद पहले अवधेश सिंह और उसके बाद त्रिलोक सिंह उसी तरफ गए जिस तरफ लड़की गई थी। इस दौरान सुभाष सिंह सड़क पर इधर से उधर टहलता रहा मानो वह गार्ड का काम कर रहा था। पंकज सुरेश सहनी के ही साथ बैठा रहा। सुरेश सहनी ने बताया कि अभियुक्तों के परिजन उसे कोर्ट में बयान नहीं देने के लिए धमकी दे रहे हैं।  पीयूसीएल की टीम अभियुक्तों के भी घर पहुंची लेकिन वहां कोई नहीं था और घर में ताला बंद था।
पुलिस ने क्या कहा
कटरा थाना के थानाध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि उन्हें सुबह में इस घटना के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने पुलिसकर्मियों को आदेश दिया कि वे लाश को बरामद करे और एफअईआर दर्ज करें। उनका कहना था कि यह मामला बलात्कार का नहीं हत्या का था। 13 जुलाई को एफआईआर दर्ज हुई और केवल दो व्यक्तियों अवधेश सिंह और त्रिलोक सिंह को अभियुक्त बनाया गया। इस घटना के मुख्य अभियुक्त अवधेश सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस की जांच रिपोर्ट के अनुसार अभियुक्त ने स्वीकार किया कि उसने खुशबू कुमारी के साथ बलात्कार करने की कोशिश की लेकिन बच्ची ने प्रतिरोध किया और उसके प्रतिरोध के कारण अपराधी अपने मंसूबे में सफल नहीं हो सका। गुस्से में आकर उसने खुशबू का गला उसके ही दुपट्टे से कसकर उसे मार डाला। दूसरा अभियुक्त त्रिलोक सिंह फरार है।
पीयूसीएल की टीम ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि पहली नजर में बलात्कार का मामला परिवारों की लड़ाई का परिणाम लगता है जिसका नतीजा बच्ची की मौत के रूप में निकला। खुशबू के परिजनों ने 14 जुलाई को शिकायत दर्ज कराई लेकिन पुलिस ने एफआईआर 13 जुलाई की तारीख में ही दर्ज कर लिया। ऐसा क्यों? खुशबू के परिजन भयभीत हैं। उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। फरार अभियुक्त और उनके परिजन खुशबू के परिजनों को लगतार धमकी दे रहे हैं।

मार डाली गई महिला, पुलिस ने कहा-दुर्घटना
पीयूसीएल की टीम कटरा थाने के ही घनौरा गांव पहुंची जहां डीह टोला के छोटे सहनी की पत्नी मीरा सहनी के साथ गैंग रेप किया गया था। इस गांव में भूमिहार जाति का दबदबा है जबकि बाकी मल्लाह और कुछ दलितों के घर हैं। यह घटना 19 मई की थी। मीरा सहनी पांच बच्चों की मां थी और उनके पति छोटे सहनी कोलकाता में काम करते हैं। वे भूमिहीन थीं और एक कमरे में अपने पांच बच्चों के साथ रहती थीं। पीयूसीएल की टीम को गांव के लोगों ने बताया कि मीरा सहनी को रात में एक अनजान फोन आया। फोन करने वाले ने उनसे कहा कि उनके बड़े बेटे राजेश कुमार को गांव के स्कूल के पास कुछ लोगों ने मार डाला है। स्कूल में एक धार्मिक आयोजन चल रहा था। यह खबर सुनते ही बदहवास मीरा सहनी घर से बाहर निकल गईं। कुछ लोग घर के बाहर खड़े थे। मीरा सहनी को उन्होंने अपनी बाइक पर बैठाया और लेकर चले गए। परिजनों का आरोप है कि उनलोगों ने मीरा के साथ बलात्कार किया। फिर वे लोग उनकी हत्या करने की नीयत से अचेतावस्था में उन्हें लेकर कहीं और जा रहे थे। इस दौरान वे मोटरसाइकिल गिर गई और उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। उन्हें अर्ध नग्न अवस्था में वहीं छोड़कर अपराधी भाग गए। गांव के ही एक आदमी मदन राय ने मीरा सहनी के बच्चों से कहा कि उनकी मां सड़क के किनारे एक गड्ढ़े में गिरी हुई हैं। उन्होंने बच्चों को सलाह दी कि वे उन्हें लाने जाएं तो साड़ी लेकर जाएं। गांव वाले घायल मीरा सहनी को पहले कटरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर ले गए। वहां से उन्हें श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और फिर वहां से उन्हें पीएमसीएच भेजा गया। यहां इलाज के दौरान 24 मई को उनकी मौत हो गई।
मामला दर्ज करने को तैयार नहीं थी पुलिस
मीरा सहनी के पति छोटू सहनी 20 मई को पटना पहुंचे और 22 मई को उन्होंने कटरा थाने में पहुंचकर एफआईआर दर्ज करानी चाही लेकिन पुलिस ने इसे स्वीकार नहीं किया। 25 मई को जब इस मामले में पूर्व आईजी रामचंद्र खान और अनिल प्रकाश जैसे लोगों ने हस्तक्षेप किया तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज किया। इस शिकायत में छोटू सहनी ने रीतुराज सिंह उर्फ पच्छु सिंह, अवधेश राय उर्फ मदन राय, विनोद सिंह उर्फ नागेन्द्र सिंह, चंद्रशेखर सिंह, राजकुमार और पप्पू सिंह को अभियुक्त बनाया। पुलिस ने इनमें से एक को भी गिरफ्तार नहीं किया है।
कटरा के थानाध्यक्ष मनोज कुमार ने पीयूसीएल की टीम को बताया कि मीरा सहनी के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ था। वह मोटरसाइकिल से हुई दुर्घटना के कारण घायल हो गई थीं। थानाध्यक्ष ने टीम को बताया कि छोटू सहनी ने 25 मई को एफआईआर दर्ज कराई है जिसमें छह लोगों को अभियुक्त बनाया गया है।
पीयूसीएल की टीम को पता चला कि घटना के पांच दिनों के बाद पोस्टमार्टम और फारेंसिक रिपोर्ट तैयार हुई। इससे साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका बढ़ गई। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि मीरा सहनी की मौत सिर में चोट लगने से हुई है वहीं फॉरेंसिक रिपोर्ट ने बलात्कार की थ्योरी को भी खारिज कर दिया।

बलात्कार के साक्ष्य मौजूद- पीयूसीएल
पीयूसीएल की टीम का मानना है कि इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं कि मीरा सहनी के साथ बलात्कार किया गया। पुलिस के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि मीरा सहनी अर्ध नग्न अवस्था में कैसे पाई गईं। पुलिस तो एफआईआर भी दबाव के बाद ही दर्ज कर सकी। पुलिस ने इस मामले में आए तथ्यों की छानबीन नहीं की। यहां तक कि उसने उस मोबाइल कॉल की भी छानबीन नहीं की जो मीरा सहनी ने रात में रीसीव किया था। अगड़ी जाति के कई लोगों ने मीरा सहनी के चरित्र पर सवाल उठाये और कहा कि वह अक्सर रात में बाहर जाती थी। पीयूसीएल की टीम ने सवाल उठाया है कि अगर उनलोगों की बात मान भी ली जाए तो क्या ऐसी महिला को जीने और सुरक्षा पाने का अधिकार नहीं है। महिला की सामाजिक निंदा इसलिए भी की जाती है ताकि जांच और न्याय पर असर पड़े। आम तौर पर दलित महिलाओं के साथ ऐसा ही होता है। पुलिस का कहना है कि वह महिला रात में धार्मिक समारोह में शामिल होने गई थी लेकिन उसने इस बात की तस्दीक नहीं की कि वह उस धार्मिक समारोह में देखी गई थी या नहीं। वैसे कई महिला संगठनों के दबाव डालने के बाद इस मामले की दुबारा जांच की जा रही है।

पीयूसीएल के निष्कर्ष

पीयूसीएल की टीम का यह भी मानना है कि ऐसे मामलों में एफआईआर तत्काल दर्ज करने की व्यवस्था होनी चाहिए। एक ऐसा तंत्र विकसित होना चाहिए जिससे इस बात पर निगरानी रखी जा सके कि थानों में लोगों की शिकायत दर्ज हो रही है या नहीं। हर जिले में कम से कम तीन महिला थाना होने चाहिए। महिलाओं और कमजोरों के साथ होने वाले अपराधों को लेकर पुलिस को ज्यादा संवेदनशील बनाने की जरूरत है। महिला पंचायत जनप्रतिनिधियों को ज्यादा से ज्यादा ट्रेनिंग देने की जरूरत है ताकि वे महिला अधिकारों  के लिए प्रभावशाली तरीके से लड़ सकें। अधिकतर गांवों में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तभी होता है जब वे नित्य क्रिया से निवृत्त होने के लिए घर से बाहर जाती हैं। घरों में शौचालय नहीं होने का मसला उनके जीवन और पहचान से जुड़ा मसला हो गया है। इसे किसी भी हाल में हर घर में होने की गारंटी होनी चाहिए। 

रविवार, 16 सितंबर 2012

विमल पासवान अपनी बेटियों को नहीं पढ़ायेंगे

कमलेश
सात बेटियों के पिता विमल पासवान अब अपनी बेटियों को नहीं पढ़ायेंगे। उनकी बेटियां अब स्कूल नहीं जाएंगी भले उन्हें साइकिल मिले या नहीं। अब साइकिल के लिए इज्जत के साथ-साथ जान का सौदा कौन करे। उन्होंने अपनी दूसरी बेटी कविता को स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा था। लेकिन उनकी बेटी गांव के ही बड़े और दबंग लोगों की नजर पर चढ़ गई। पहले तो उसका स्कूल आना-जाना मुश्किल किया गया और जब इसके बावजूद उसने अपना सिर नहीं झुकाया तो गांव के शरीफजादों ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या करके उसकी लाश कुंए में फेंक दी। लाख शिकायतों के बावजूद जब पुलिस ने कुछ नहीं किया तो लोगों का गुस्सा फूटा और लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया। पुलिस ने लोगों पर बल प्रयोग किया और इसके जवाब में उग्र लोगों ने थाने पर रोड़ेबाजी की और आग लगाई। बदले में पुलिस ने गोली चलाकर एक प्रदर्शनकारी रणधीर पासवान को मार डाला।
यह कहानी है बिहार के राजधानी के बिल्कुल बगल में स्थित वैशाली जिले के सराय थाना के प्रबोधी सिसौना गांव की। घटना एक महीने पुरानी है। लेकिन इसने बिहार के राजनीतिक माहौल को गरमा दिया था।  हालाँकि पुलिस ने यह कहकर अपनी लाज बचाई कि थाना पर हमला करने वाले लोग बाहर के गांव से आये थे। लेकिन अब पता चला है कि मामला ही कुछ अलग था.। इसका खुलासा हुआ है पीयूसीएल की जाँच रिपोर्ट में।  वैसे इस रिपोर्ट को बिहार की मिडिया में जगह नही मिल पाई। 
  विमल पासवान ने अपनी यह पीड़ा इस घटना की जांच के लिए प्रबोधी गांव पहुंचे पीयूसीएल की टीम को सुनाई। इस टीम में किशोरी दास, मिथिलेश कुमार, मनीष कुमार और नागेश्वर प्रसाद शामिल थे। इस टीम ने अपनी जांच रिपोर्ट 14 सितम्बर को ही जारी की है। इस रिपोर्ट को पढ़ने से साइकिल चलाकर स्कूल जाने वाली लड़कियों की तस्वीर के स्याह पक्ष का पता चलता है। 
पीयूसीएल की जांच रिपोर्ट में जो कहानी उभर कर सामने आ रही है वह बिहार में चल रहे महिला सशक्तिकरण के शोर का भी खुलासा करती है। कविता मूलत: दलित समुदाय की लड़की थी और उसके पिता विमल पासवान अनपढ़ हैं। कविता सराय के आदर्श उच्च विद्यालय में दसवीं कक्षा की छात्रा थी। विमल पासवान अपनी बेटी कविता की शादी के बारे में सोच ही रहे थे कि उसके साथ ऐसी घटना हो गई। सात जुलाई की शाम कविता अपनी दो छोटी बहनों के साथ जलावन चुनने बागीचा गई थी। इस दौरान जामुन चुनने के क्रम में वह पिछड़ गई और दोनों बहनें घर चली आईं। जब वह देर रात तक घर नहीं लौटी तो घर के लोग उसे खोजने निकले। पूरी रात तलाश चली लेकिन कविता नहीं मिली। तलाश करने का क्रम 8 जुलाई को भी जारी रहा। लेकिन कविता का कोई पता नहीं चला। 9 जुलाई को गांव के एक कुंए में कविता की लाश मिली। लाश की बांहें पीछे दुपट्टे से बांधी हुई थी। बाद में पुलिस भी वहां पहुंची। लेकिन लोगों ने लाश को पुलिस के हवाले करने से इनकार कर दिया और एसपी तथा डीएम को घटनास्थल पर बुलाने की मांग करने लगे। लाश तब तक कुंए के पास ही पड़ी रही। बाद में डीएसपी ने लोगों को समझा-बुझा कर लाश को वहां से उठवाया और सड़क पर रखवा दिया। लाश के सड़क पर रखते ही पुलिस ने जबरन लाश के अपने कब्जे में ले लिया और चली गई। 
बलात्कार और हत्या का आरोप सिसौनी प्रबोधी गांव के सुधीर कुमार और चंचल कुमार पर लगाया गया है। ये दोनों दबंग परिवार के हैं और अक्सर कविता के स्कूल जाने और स्कूल से लौटकर आने के समय उसपर भद्दी टिप्पणी किया करते थे। भय और लज्जा के कारण कविता इस बात को कहीं बता नहीं पाती थी। गांव के लोगों ने बताया कि ये दोनों युवक अक्सर गांव में रोब दिखाते रहते थे और उनलोगों ने विमल पासवान के साथ भी ऐसा ही किया था। सुधीर का बड़ा भाई अपराधी है और हाजीपुर जेल में बंद था। पीयूसीएल की टीम को पता चला कि वह भी जेल से फरार हो गया है। गांव के ही एक दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या करने का आरोप इनके परिवार पर लगा था।
कविता के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में पुलिस के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किये जाने के खिलाफ नौजवान भारत सभा और महिला चेतना संघ ने 16 अगस्त को सराय बाजार के सूरज चौक पर धरना-प्रदर्शन का कार्यक्रम आयोजित किया था। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारी जबरन दुकानें बंद करवा रहे थे और सड़क जाम कर यातायात बाधित कर रहे थे। पुलिस ने ये भी दावा किया है कि प्रदर्शनकारी घातक हथियारों से लैस थे। पुलिस के अनुसार जब वह प्रदर्शनकारियों की तरफ बढ़ी तो प्रदर्शनकारी उसके साथ मारपीट करने लगे। इसमें पुलिस का एक जवान घायल हो गया। इसके बाद एक हजार लोग थाने पर पहुँच कर रोड़ेबाजी करने लगे। पुलिसकर्मियों ने इस मामले में सराय थाना में प्राथमिकी भी दर्ज कराई है। इसमें कहा गया है कि प्रदर्शनकारी थाने पर पहुंचकर मारपीट और लूटपाट करने लगे। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने थाना और वहां रखी गाड़ियों में आग लगा दी। अपनी प्राथमिकी में पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की ओर से फायरिंग होने लगी और एक प्रदर्शनकारी एक सिपाही की रायफल लेकर भागने लगा। इसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षार्थ गोली चलाई। इस गोलीकांड में रणधीर पासवान नामक युवक मारा गया। रणधीर पासवान के भाई ने भी इस मामले में एक प्राथमिकी दर्ज कराई है और उसने कहा है कि रणधीर पासवान बाजार से सामान खरीदकर आ रहा था और हंगामा होते देखकर रुक गया। इतनी देर में पुलिस की एक गोली उसके सिर में लगी। इलाज के क्रम में उसकी मौत हो गई।
पीयूसीएल ने माना है कि सराय थाने पर हुई गोलीबारी बलात्कार और हत्या के मामले में पुलिस की निष्क्रियता का नतीजा है। पुलिस की शिथिलता से आम लोगों को लगा पुलिस और दबंग अपराधियों में सांठ-गांठ है। लिहाजा लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया और मामला रोड़ेबाजी तक पहुंचा। पीयूसीएल ने मृतका कविता के पिता विमल पासवान को चौकीदार की नौकरी देने, अभियुक्तों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने, पुलिस फायरिंग में मरे रणधीर पासवान के परिजनों को सरकारी नौकरी और मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।  

रविवार, 19 अगस्त 2012

कोसी: जारी है लड़ाई

कमलेश

अगस्त आधा बीत चुका है और सितम्बर इतना करीब कि उसके कदमों की आहट सुनाई दे रही है। बादल के छंटने के बाद होने वाली धूप जानलेवा हो गई है। उमस इतनी कि पसीने से कपड़े भींग रहे हैं। ठीक ऐसे ही मौसम में कारगिल चौक पर जन सुनवाई शुरू हुई थी। इसमें कोसी के बाढपीड़ितों के लिए लड़ने वाले पीड़ितों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्यक्रमों की जमीनी हकीकत बता रहे थे। अगले दिन ईद का त्योहार होने के कारण जनसुनवाई में जुटे लोगों की तादाद तो कम थी लेकिन मुद्दे बहुत बड़े थे। कोसी विकास संघर्ष समिति और कोसी नवनिर्माण मंच की ओर से आयोजित इस जनसुनवाई में महेन्द्र यादव जब गांवों के रेगिस्तान में बदल जाने की कथा सुना रहे थे तो आसपास बड़ी संख्या में राजधानी के लोगों की भीड़ जमा हो गई। लोग यह जानकर चकित थे कि बिहार में एक ऐसा भी गांव है जहां हवा चलती है तो आप बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि यदि आपने ऐसा दुस्साहस किया तो आपकी आंखों में रेत भर जाएगी। क्या इसका मतलब यह है कि बिहार में मरुस्थल भी है। वे बता रहे थे कि इन इलाकों में आप रात में बाइक से नहीं चल सकते क्योंकि बालू में फंसकर बाइक कहां आपको पटक देगी इसका पता भी आपको नहीं चल पाएगा। उन्होंने जनकारी दी कि कोसी क्षेत्र के गांवों के खेतों में बालू भर चुका है और  वहां अब खेती पूरी तरह मुश्किल हो चुकी है। विपन्नता का आलम यह है कि पेट भरने के लिए लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को काम करने के लिए बाहर भेज रहे हैं और इसके कारण इस इलाके की लड़कियां बड़ी संख्या में ट्रैफिकिंग की शिकार हो रही हैं। इस जनसुनवाई के आयोजक दोनों संगठन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से संबद्ध हैं।
18 अगस्त को कोसी त्रासदी के चार वर्ष पूरे हो गए। इसी मौके को लेकर इस जनसुनवाई का आयोजन किया गया था। 2008 में इसी दिन कोसी की बाढ़ तबाही लेकर आई थी। देश में पहली बार मानवकृत बाढ़ की इस त्रासदी में कोसी अंचल के 30 लाख लोग पीड़ित हुए थे। राज्य सरकार ने कोसी क्षेत्र में राहत व पुनर्वास कार्यक्रम शुरू करते हुए कहा था कि कोसी अंचल को पहले से बेहतर स्थिति में बसाया जाएगा। पर चार वर्ष बीतने के बावजूद कोसी क्षेत्र के हजारों एकड़ उपजाऊ खेतों में बालू भरा पड़ा है। लाखों ध्वस्त और क्षतिग्रस्त मकान पुनर्निर्माण के इंतजार में हैं। पुनर्वास की लचर नीति के कारण नगरवासी और व्यापारी किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति व पुनर्वास के कार्यक्रमों से पूरी तरह वंचित हैं। पुनर्वास की तमाम योजनाओं में जटिल प्रक्रियाओं, सरकारी उदासीनता और सुस्ती से भ्रष्टाचार का रास्ता खुल गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता रणजीव कुमार ने बताया कि खुद सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार कोसी क्षेत्र में आई बाढ़ से कुल 2 लाख 36 हजार 632 घर ध्वस्त हुए थे। राज्य सरकार ने विश्व बैंक से कर्ज लेकर 31 दिसम्बर 2011 तक एक लाख आपदा सहाय्य आवास गृह के निर्माण की घोषणा की थी। पर इस योजना का क्या हुआ, यह किसी को पता नहीं है। महेन्द्र यादव ने जानकारी दी कि गरीब लोग आज भी अपने सिर पर पॉलीथिन की छत बनाकर रह रहे हैं। हर बार तेज हवा और बरसात में यह छत ध्वस्त हो जाती है। उन्होंने बतया कि खेतों की हालत के बरे में जानकारी लेने के लिए सुपौल जिले के बसंतपुर अंचल के अंचलाधिकारी से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी। इसपर उन्होंने जवाब दिया कि इस अंचल में 1429.70 एकड़ खेतों में बालू भरा है। इस एक अंचल के बालू भराव से अनुमान लगया जा सकता है कि सुपौल, मधेपुरा और सहरसा जिलों के कितने खेतों में बालू भरा है। मतलब साफ है। बाढ़ भले चार वर्ष पहले आई हो लेकिन उसका कहर आज भी लोगों के लिए जानलेवा ही है। यहां यह बता देना जरूरी है कि कोसी की बाढ़ को केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा घोषित किया था।
                कोसी क्षेत्र के लोगों की मांगों को लेकर  चल  रहे आन्दोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मणिलालजी का कहना था कि इस पूरे इलाके के लोगों की कठिनाइयां लगातार बढ़ी हैं। आज भी अनेक गांवों के संपर्क रोड और पुल-पुलिया टूटे हुए हैं। हल्की बारिश से ही लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। बाढ़ में जिनके लोग मर गये थे उनके लिए मुआवजे की तो घोषणा की गई लेकिन उसे ले लेना आज भी कठिन काम है। जिनके पशु मरे, वे तो मुआवजे की बात भूल ही गए। स्कूल और अस्पतालों की हालत तो राम भरोसे ही है। मनरेगा और स्वावलम्बन की अन्य योजनाओं पर मठाधीश काबिज हैं और आम लोगों के हाथ कुछ भी नहीं आ रहा है। कोसी त्रासदी के बाद राज्य सरकार ने 9 दिसम्बर 2008 को कोसी बांध कटान न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। इस आयोग को एक साल के अंदर अपनी रिपोर्ट दे देनी थी। लेकिन इस आयोग का गठन किये हुए चार वर्ष पूरे हो गए और इसपर एक करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च हो गए लेकिन आज तक आयोग ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करके जनसुनवाई भी पूरी नहीं की है। रिपोर्ट की बात तो अभी कोसों दूर है। आयोग की शर्तें और एवं जांच के बिन्दुओं को इस तरह निर्धारित किया गया है कि उसमें से राज्य सरकार साफ बचकर निकल जाए। कोसी विकास संघर्ष समिति और कोसी नवनिर्मण मंच के नेताओं का आरोप था कि कुसहा में तटबंध टूटने के बाद आज तक एक भी पदाधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार पर कार्रवाई नहीं हुई। तब के सिंचाई मंत्री आज भी इस सरकार में खासमखास बने हुए हैं। कोसी के लोग बस इतना मांग रहे हैं कि उनका जीवन एक बार फिर पटरी पर लौट आए। इस जनसुनवाई में जो 23 सूत्री मांगें रखी गई उनमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो उन्हें नहीं दिया जा सकता है. इन मांगों को लेकर राज्य सरकार न तो पहले गंभीर रही है और ना ही अब ऐसे लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं जिससे लगे कि सरकार के एजेंडे में कोसी के बाढ़पीड़ित भी हैं।
समय बीतने के साथ कोसी क्षेत्र से बाहर के लोग कोसी की भयानक बाढ़ को भूलने लगे हैं। जनदबाव नहीं होने से यह मुद्दा गौण पड़ गया है और सरकार भी इससे जल्दी ही हाथ झाड़ लेना चाहती है। इस स्थिति में ऐसी जनसुनवाइयों का खास महत्व है। इसके कारण कोसी की बाढ़ का मसला एक बार फिर राजधानी में उठा और इससे राजधानी के बुद्धिजीवियों को याद आया कि इस बाढ़ ने कैसी तबाही मचाई थी। इस जनसुनवाई ने लोगों को बताने की कोशिश की है बाढ़ ने तो लोगों को सबकुछ छीना ही अब सरकार भी उन्हें मारने पर तुली हुई है। वैसे कोसी के क्षेत्र के लोगों ने अपनी लड़ाई नहीं छोड़ी है और वहां यह मुद्दा लगातार चल रहा है। इस साल 14 और 15 अप्रैल को सुपौल के जदिया में कोसी पुनर्वास की जमीनी हकीकत और जन हस्तक्षेप विषय पर दो दिनों की कार्यशाला आयोजित की गई थी जिसमें इस मसले को लेकर लड़ने वाले लोग और ग्रामीण जमा हुए थे। पिछले साल 7 से 10 दिसम्बर तक सुपौल के वीरपुर से मधेपुरा के बिहारीगंज तक कोसी जनसंवाद यात्रा का आयोजन किया गया। इसमें राजेन्द्र सिंह ने भी हिस्सा लिया था। इसके बाद वीरपुर में कोसी जनपंचायत लगाई गई जिसमें मेधा पाटेकर ने भी भाग लिया था। इस बार भी राजधानी के रंगर्किमयों और सामाजिक सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवियों ने जनसुनवाई में भाग लिया। इससे उम्मीद की एक रोशनी दिखाई पड़ी है।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

विकास के दौर में महिलाओं की जगह

विकास के दौर में महिलाओं की जगह

कमलेश


सीएसडीएस की ओर से प्रकाशित पुस्तक भारत का भूमंडलीकरण में अभय कुमार दुबे का एक लेख है- पितृसत्ता के रूप। इस लेख में एक जगह कहा गया है कि जब पूरी दुनिया में भूमंडलीकरण का दौर शुरू हुआ था तो नारीवादी चिंतक सिंथिया एनलो ने पूछा था- क्या तुम्हारी इस व्यवस्था में महिलाओं के लिए कोई जगह है? इस एक सवाल ने भूमंडलीकरण के बाद बदली हुई दुनिया में औरतों की जगह बता दी थी।  मुझे लगता है कि वक्त आ गया है कि बिहार की महिलाओं को भी अब  यहां की सरकार से यही सवाल पूछना चाहिए- क्या तुम्हारे इस विकास में महिलाओं के लिए कोई जगह है? क्या इस सूबे में कोई ऐसी जगह है जहां वे अपनी अस्मिता के साथ सुरक्षित रह सकें? इस राज्य में जो कुछ भी हो रहा है अगर उसे विकास कहते हैं तो उसकी सबसे बड़ी कीमत इस प्रदेश की महिलाएं चुका रही हैं।

अभय कुमार दुबे अपने उसी लेख में कहते हैं कि आज के दौर में यह बात लगभग सच साबित हो चुकी है कि इतिहास के किसी भी कालखंड में महिलाओं का उतना शोषण और दोहन नहीं हुआ है जितना इस दुनिया में अकेले भूमंडलीकरण के बाद हुआ है। मुझे लगता है कि यही बात बिहार के मामले में भी सच है। पिछले सात वर्षों में विकास के शोर के बीच महिलाओं की चीख जिस तरह दबती रही है उतना शायद किसी और कालखंड में नहीं हुआ।


महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी हैं, उनके साथ मारपीट और यहां तक कि उनकी हत्या करने की घटनाओं पर कहीं कोई नियंत्रण नहीं है। पॉश इलाकों में चकलाघर खुले हैं। बड़े-बड़े अपार्टमेंटों में ऐसे फ्लैट पकड़े गए हैं जहां धंधेबाज दूर-दराज की महिलाओं को लाकर वेश्यावृति कराते हैं। 
पटना में एक छात्रा के साथ हुआ गैंग रेप तो एक कड़ी की तरह है। इसके ठीक बाद नालंदा  की दो छात्राओं ने कहा कि उनके साथ कुछ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया है। पुलिस ने तफ्तीश के बाद बड़े ही शर्मनाक लहजे में कहा कि दोनों लड़कियां सेक्सुअली हैबिचुएटेड हैं। इसके साथ यह भाव भी छिपा हुआ था कि अगर लड़कियां ऐसी हैं तो उनके साथ कुछ भी जायज है। इस घटना के 48 घंटे भी नहीं बीते कि सीवान में एक डॉक्टर के पास एक नवविवाहिता अल्ट्रासाउंड कराने गई और डॉक्टर ने उसके साथ बलात्कार किया। पिछले साल अगस्त महीने में सारण जिले के मांझी थाने में एक छात्रा के साथ पुलिसकर्मियों ने सामूहिक बलात्कार किया। पिछले साल ही बगहा के एक थाने में एक महिला के साथ पुलिसकर्मियों ने सामूहिक बलात्कार किया। पिछले साल की शुरुआत में ही एक महिला ने एक भाजपा विधायक राजकिशोर की चाकू मारकर हत्या कर दी। उसका आरोप था कि विधायक ने उसकी इज्जत लूटी थी और और अब वह बराबर उसके साथ हमबिस्तर होने की मांग कर रहा था। महिला हत्या के बाद से ही जेल में है।

ये सारी घटनाएं ऐसे दौर में हो रही है जब बिहार में यह दावा किया जा रहा है कि यहां महिलाएं सशक्त हो रही है। बार-बार ऐसे चित्र दिखाये जा रहे हैं कि गांवों में लड़कियां साइकिल से स्कूल जा रही हैं, लड़कियां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बड़े-बड़े काम कर रही हैं, लड़कियां पुलिस में जा रही है और लड़कियां खेतों का काम संभाल रही हैं। इसके साथ ही और भी न जाने क्या-क्या?  राजधानी में बताया जाता है कि महिलाएं रात के 12 बजे परिवार के साथ बोरिंग रोड चौराहे पर आइसक्रीम खाने आती है। और ठीक ऐसे ही समय में यह बात भुला दी जाती है कि दिन के उजाले में राजवंशीनगर जैसे पॉश इलाके में दिन-दहाड़े कुछ लोग मिलकर एक लड़की की इज्जत लूट लेते हैं और नेहरूनगर में दिन के 11 बजे कुछ लोग घर में घुसकर महिला प्राचार्य की हत्या कर देते हैं। मतलब यह कि इस विकास के दौर का सच यह भी है कि बिहार की राजधानी पटना में महिलाओं पर हमले के लिए रात का इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं। उनपर दिन में हमले कर सकते हो और वे अपने घर में भी हों तो भी उनपर हमले कर सकते हो। विकास के बड़े-बड़े चित्र और और बड़ी तेज आवाजें। इन आवाजों में अक्सर महिलाओं की चीख दब जाती है।

इसमें दो राय नहीं कि हाल के दिनों में लड़कियों में कुछ बनकर दिखाने का जो उछाह पैदा हुआ है वह इतिहास के किसी दूसरे कालखंड में दिखाई नहीं पड़ता है। आप उन्हें साइकिल न भी दें तो भी स्कूल जाने का जो आवेग उनके भीतर पैदा हुआ है वह मरेगा नहीं। हाल में हुई शिक्षक और बैंक में नियुक्ति की परीक्षाओं में महिलाओं की भागीदारी देखकर कई लोगों ने दांतों तले अंगुली दबाई थी। लेकिन साथ में ही यह भी सच है कि जितनी तेजी से महिलाएं आगे बढ़ने का प्रयास कर रही हैं उतनी ही तेजी से उनके खिलाफ हमले भी बढ़ रहे हैं। हमले भी हर तरह के लोग कर रहे हैं। इसके लिए हमलावर का अनपढ़ या अपराधी होना जरूरी नहीं। हमला हर वर्ग की तरफ से होता है। कभी हमलावर प्रलिस होती है तो कभी दबंग तो कभी पुरुष साथी। डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे लोग भी इस मामले में पीछे नहीं होते। अगर सामने लड़की हुई तो फिर सारी पढ़ाई-लिखाई गई गतालखाते मे। अगर अपनी साइकिल बनवाने आई एक छोटी बच्ची के साथ मिस्त्री दुष्कर्म करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ एक डॉक्टर अपनी ही मरीज महिला की इज्जत से खेलता है। जहां महिलाओं की अस्मिता पर हमले का मामला आता है वहां सभी एक स्तर पर आ जाते हैं- डॉक्टर से लेकर साइकिल मिस्त्री तक।


मीडिया भी इस मामले में कहां पीछे रहती है? उसने बलात्कार पीड़िता को ही आरोपों के घेरे में ला दिया। राजधानी में हुए गैंग रेप के बाद मीडिया के एक हिस्से ने यह खबर उड़ाई कि बलात्कार की शिकार लड़की जब भी दुकान पर जाती थी तो चॉकलेट के बड़े-बड़े डब्बे खरीदती थी और वह हमेशा दुकानों में हजार या पांच सौ रुपये के ही नोट देती थी। जिस हिस्से ने यह खबर उड़ाई थी उसके इरादे साफ थे क्योंकि इतना बताने के साथ वह यह भी बता रहा था कि उस लड़की के घरवाले काफी गरीब हैं। मीडिया का यह हिस्सा यह खबर उड़ाकर कहना क्या चाहता था, यह साफ है।



 एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल ने तो एक बलात्कारी को ही अपने यहां बुला लिया। वहां भी इरादा खुला हुआ था- बलात्कार को लाइव दिखा नहीं सकते तो बलात्कार की कहानी ही लाइव सुना दीजिए। जितनी देर उस बलात्कारी का इंटरव्यू चला उतनी देर तक एंकर का अंदाज उस बलात्कारी को महिमामंडित करने वाला था। दावा किया गया कि वह बलात्कारी चैनल में आत्मसमर्पण करने पहुंचा है। हद तो तब हो गई जब उसकी गिरफ्तारी के बाद एक पत्रकार ने पुलिस अधिकारी से सवाल किया कि चूंकि आरोपित ने आत्मसमर्पण किया है इसलिए उसके प्रति क्या नरमी का व्यवहार किया जाएगा?


लेकिन हालात बिगड़ रहे हैं तो सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सवाल लोगों को झिंझोड़ भी रहे हैं। बिहार के महिला संगठन इस मसले को मजबूती से उठा रहे हैं और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। उम्मीद है कि विकास के परदे के पीछे  का सच भी जल्दी ही लोग समझने लगेंगे।