रविवार, 17 नवंबर 2013

मीडिया की साख और थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग

कमलेश
पिछले तीन दिनों से अखबार और टीवी न्यूज चैनल लगातार केवल और केवल सचिन राग आलाप रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश में पिछले तीन दिनों से दूसरा कोई मसला ही नहीं है। आप सचिन तेंदुलकर को पढ़िये, उसे देखिये और उसी के बारे में बात कीजिए। और कुछ मत सोचिए। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का इससे बेहतर शायद ही कोई उदाहरण हो सकता है। हाल के कुछ वर्षों में भारतीय मास मीडिया ने यह दिखा दिया है कि अब उसके लिए विश्वसनीयता अथवा साख के कोई मायने नहीं है। वह उन्हीं मसलों को देश का अहम मसला बनाने का प्रयास कर रहा है जो इस देश के शासक वर्ग के हित के लिए सही हैं। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का जितना विकराल रूप आज दिखाई पड़ रहा है उतना मीडिया के किसी भी कालखंड में इस देश के लोगों ने नहीं देखा होगा। मीडिया के सिद्धांत कहते हैं कि जब मीडिया द्वारा थोपे जा रहे एजेंडे में और आम आदमी के वास्तविक एजेंडे में फर्क शुरू होता है तो मीडिया के साख का संकट भी शुरू होता है। यह फर्क जितना बड़ा होगा मीडिया की साख भी उतनी ही संकट में पड़ेगी। इतिहास के किसी भी दौर में फर्क इतना बड़ा नहीं हुआ था।
लोकतंत्र और मीडिया
हम अक्सर मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं। ठीक बात है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अब भारत का लोकतंत्र किनका लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र किनके लिए प्राणवायु का काम करता है। यह वही लोकतंत्र है जहां बाथे और बथानी टोला के दलितों के हत्यारों को कोई सजा नहीं मिलती। इस देश के महज बीस फीसदी लोगों का है लोकतंत्र। तो जब लोकतंत्र इस देश के महज बीस फीसदी लोगों का लोकतंत्र है तो इसका चौथा स्तम्भ मीडिया भी महज बीस फीसदी लोगों का ही मीडिया है। जिस तरह इस देश के 80 फीसदी लोग इस लोकतंत्र में हाशिये पर हैं उसी तरह इस देश के 80 फीसदी लोग मीडिया की चिंता से बाहर है। यही कारण है कि चाहे वह छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की लड़ाई हो या उड़ीसा के आदिवासियों का संघर्ष, इसे मुख्यधारा की मीडिया में कोई जगह नहीं मिल पाती है। लेकिन इसे स्थानीयता के वृत्त से बाहर निकाल कर जरा बड़े कैनवास पर देखने की जरूरत है। हम अक्सर इसके लिए इन मीडिया हाउसों में काम करने वाले पत्रकारों को जिम्मेवार ठहराते हैं। क्या किसी मीडिया हाउस में काम करने वाले पत्रकार उसका स्वरूप और उसका एजेंडा बदल सकते हैं? क्या पत्रकारों के बदलने से साख का संकट हल हो जाएगा?
मीडिया की आंतरिक संरचना
1988 में एडवर्ड एस हरमन और नॉम चॉम्सकी ने एक किताब लिखी थी- मैन्यूफैक्चरिंग कंसेंट। इस किताब में इन मीडिया विशेषज्ञों ने जिन बातों को सूत्र रूप में रखा वह आज भारत में अपने विराट रूप में दिखाई पड़ रहा है। इन विशेषज्ञों ने उसी समय कहा था कि दरअसल अभी के मीडिया में जो कुछ दिखाई पड़ रहा है वह किसी षड़यंत्र की वजह से नहीं है। मीडिया की अपनी आंतरिक बनावट ही ऐसी है जो उसे आम लोगों और मेहनतकश लोगों के खिलाफ खड़ा करती है। मीडिया की संरचना से ही उसका कंटेंट प्रभावित होता है। मीडिया की संरचना शासक वर्ग अथवा इलीट वर्ग के पक्ष में है इसलिए मीडिया का कंटेंट भी शासक वर्ग और इलीट वर्ग के पक्ष में होता है। मीडिया की सामाजिक भूमिका प्रभुत्वशाली समूहों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे को न केवल स्थापित करना है बल्कि उसका बचाव भी करना है।
युद्ध और मीडिया का सच
कोई भी साम्राज्यवदी देश जब किसी कमजोर मुल्क पर हमले शुरू करता है तो भारत का शासक वर्ग तुरत उस साम्राज्यवादी मुल्क के पक्ष में उसी तरह खड़ा होता है जैसे उस साम्राज्यवादी देश का शासक वर्ग खड़ा होता है। चूंकि शासक वर्ग इस युद्ध के पक्ष में खड़ा होता है इसलिए मीडिया उस युद्ध के पक्ष में आम राय बनाने में जुट जाता है। पिछली सदी में इराक पर हुआ अमेरिकी हमला इसे बड़े दिलचस्प तरीके से दिखाता है।
पिछले दिनों वरिष्ठ लेखिका अरुंधति राय ने अपने एक साक्षात्कार में इस मसले को लेकर एक दिलचस्प घटना बताई थी। उनके अनुसार इराक युद्ध के पहले न्यूयार्क टाइम्स के रिपोर्टर ने लगातार खोजी खबर लिखी कि इराक के पास आणविक और रासायनिक हथियार हैं। इसी को आधार बनाकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया। जबकि इराक बार-बार कह रहा था कि उसके पास कोई आणविक हथियार नहीं है। फिर भी इराक को तहस-नहस कर दिया गया। हालांकि उस समय भी लोगों को इस बात की जानकारी थी कि इराक पर हमले की वजह उसके पास परमाणु हथियार का होना नहीं है। इराक को पूरी तरह बरबाद कर दिया गया। इस घटना के छह साल बाद न्यूयार्क टाइम्स ने भीतर में एक छोटी सी जगह में यह कहते हुए अपने पाठकों से माफॅी मांग ली कि हमने जो इराक के पास आणविक हथियार होने की खबर छापी थी वह दुर्भाग्य से गलत थी क्योंकि बाद में छानबीन से साबित हो गया है कि इराक के पास कोई हथियार मौजूद नहीं था। लेकिन मजेदार तो यह रहा कि अमेरिका के प्रसिद्ध डॉक्यूमेंटरी फिल्म मेकर माइकल मूर ने इस माफीनामे का उपयोग अपने किताब में करने की अनुमति न्यूयार्क टाइम्स से मांगी। लेकिन न्यूयार्क टाइम्स ने कापीराइट एक्ट के उल्लंघन का हवाला देते हुए इसकी अनुमति नहीं दी।
युद्ध और वीडियो गेम
यहां यह याद रखना जरूरी है कि भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उस युद्ध को किस तरह दिखा रहा था। यह शायद दुनिया के इतिहास में पहली बार था कि मीडिया ने एक युद्ध को वीडियो गेम की तरह दिखाया। पूरी खबरें दिखाने का अंदाज ऐसा था कि आप इस युद्ध की विभिषिका से दुखी मत होइये, इसका मजा लीजिए। मीडिया की किताबें कहती हैं कि खबर के स्रोत जितने ज्यादा होते है मीडिया की साख उतनी ही ज्यादा होती है। आप याद कीजिए कि अमेरिका-इराक युद्ध की रिपोर्टिंग कर रहे भारतीय पत्रकारों के स्रोत क्या था- केवल अमेरिकी फौज और उनके द्वारा दी गई सूचनाएं। किसी भी चैनल ने हम भारतीयों को यह दिखाने की कोशिश नहीं की इस युद्ध को लेकर इराक के लोग किस तरह की नारकीय यंत्रणा झेल रहे हैं। आप जरा हाल में अफजल गुरु के प्रकरण को याद कीजिए। असहमति का स्वर मीडिया में दिखाई नहीं पड़ रहा था। अखबारों और न्यूज चैनलों में केवल उनकी बातें आ रही थीं जो भारत सरकार के कदम को देशभक्ति का सबसे बड़ा कदम मान रहे थे।
मीडिया कवरेज और पांच फिल्टर
नॉम चॉम्सकी कहते हैं कि मीडिया के कवरेज को पांच चीजें प्रभावित करती हैं-
स्वामित्व,
विज्ञापन,
असहमति,
स्रोत और
कम्युनिज्म विरोध।
कम्युनिजम विरोध को जरा और व्यापक फलक पर कहें तो दलित विरोध, पिछड़ा विरोध, आदिवासी विरोध और कुल मिलाकर मेहनतकश आवाम का विरोध।
मीडिया टाइजेशन
एक नया सिद्धांत चर्चा में है जिसे मीडिया टाइजेशन या मीडिया चालन कहते हैं। जब मीडिया की ताकत इतनी बढ़ जाए कि वह राजनीतिक सत्ता पर हावी हो जाए। मसलन नीरा राडिया प्रकरण से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। जब कारपोरेट सेक्टर को सरकार को लेकर खेल करना था तो उसने नीरा राडिया की पीआर कंपनी के माध्यम से मीडिया की मदद ली। मीडिया इस काम को करने में सक्षम था क्योंकि वह राजनीतिक सत्ता पर अपना प्रभाव डाल रहा था। इसका मतलब यह भी मीडिया बेलगम और उद्दंड हो गया है तथा उस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया हे।
साख मतलब हिस्सेदारी
और हम जब इस मीडिया में साख की बात करनते हैं तो इसका सीधा मतलब है कि हम इस मीडिया में आम आदमी के लिए हिस्सेदारी मांग रहे हें। वह मीडिया जिसमें इस देश के कारपोरेट सेक्टर के 60 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा लगे हैं वह इस देश के आदमी को हिस्सा देगा? मीडिया कारपोरेट घराने द्वारा संचालित है जिसका मुख्य काम मुनाफा कमाना है। फिर इसमें वह उनलोगों को जगह क्यों दे जो उसके मुनाफा कमाने के सिलसिले में किसी भी काम के नहीं हैं। तो  इस हिस्से को पाने के लिए के लिए इस देश के लोगों को उसी तरह लड़ना होगा जिस तरह आप अपने बाकी के हक-हकूक के लिए लड़ते हैं। याद रखिये राजा को नंगा वह मीडिया नहीं कहेगा जो उसी राजा की मदद से अपने 60 हजार करोड़ के कारोबार को चला और बढ़ा रहा है। इस मीडिया में हिस्सेदारी के लिए या फिर इस मीडिया का चेहरा बदलने के लिए लड़ाई लड़नी होगी। इस लड़ाई को देश के सुदूर गांव-देहातों में लड़ी जा रही उस लड़ाई से जोड़ना होगा जिसका उद्देश्य इस देश की सूरत को बदलना है। यह काम इस देश का आम आदमी ही कर सकता है और वही करेगा।  

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

कौन बचायेगा- हरिजन?

कमलेश
आप उन्हें संघी कह सकते हैं। उन्हें कोई एतराज भी नहीं था। कई बार वे खुद भी कहते थे। अपने कॉलम में भाजपा की चर्चा करते हुए वे जैसे अघाते थे उससे कई बार कोफ्त होती थी। लेकिन उनमें एक बात थी- वे वामपंथियों के लिखने-पढ़ने की क्षमता के जबर्दस्त कायल थे। कई बार अपने खास लोगों को से इस बात को शेयर भी किया करते थे। जब भी वे नौकरी देने की हालत में रहे उन्होंने वामपंथी विचारों के पत्रकारों को जमकर अवसर दिया। यह जानते हुए अवसर दिया कि सामने वाला उनके विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।
जी, मैं बात दीनानाथ मिश्र की कर रहा हूं। जबसे उनके निधन की खबर मिली है उनका चेहरा आंखों के सामने तैर रहा है। और साथ में याद आ रही है उनसे पहली मुलाकात। तब मैं इंटर या शायद थर्ड इयर का विद्यार्थी हुआ करता था। बक्सर के एक छोटे से कॉलेज का छात्र। वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा हुआ। कालेज की कक्षा से ज्यादा सड़कों पर आन्दोलनों में दिखाई पड़ने वाला। लेकिन लिखने-पढ़ने का शौक था। लिहाजा अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में लिखता रहता था। उस समय नवभारत टाइम्स का पटना से प्रकाशन शुरू हुआ था। दीनानाथ मिश्रजी उसके पहले संपादक थे। तब उस अखबार में स्वतंत्र पत्रकारों को लिखने का खूब स्पेस मिलता था। वहां काम करने वाले पत्रकारों की टीम भी जबर्दस्त थी। फिर कभी बिहार के किसी हिन्दी अखबार में इतने सशक्त पत्रकारों की टीम देखने को नहीं मिली। शायद यह भी दीनानाथजी का ही असर था।
इसी दौरान एक दिन वहां काम कर रहे नवेन्दु भैया (वरिष्ठ पत्रकार) का संदेश आया था- नवभारत टाइम्स को कुछ कैम्पस रिपोर्टर चाहिए। अप्लाई कर दो। मैंने बगैर कुछ सोचे केवल एक आवेदन भेज दिया था। अचानक एक दिन इंटरव्यू की चिठ्ठी भी आ गई। और मैं इंटरव्यू देने पटना नवभारत टाइम्स के दफ्तर पहुंचा था। अपने चैम्बर में दीनानाथजी बैठे थे। कभी चेहरे पर तो कभी बालों पर हाथ फेरते हुए। कुछ और लड़के आये थे। मैं यह जानकर चकित था कि उनमें से अधिकतर न केवल आन्दोलनकारी छात्र नेता थे बल्कि वामपंथियों की भी संख्या अच्छी-खासी थ्ी।
जब मैं कक्ष में पहुंचा तो दीनानाथजी ने बड़े स्नेह से पूछा था- आज ही आये हो? इसके बाद उन्होंने चाय मंगाई थी। फिर पूछा- कुछ लिखते-पढ़ते हो? मैंने अपने कुछ आलेख उन्हें देखने के लिए पकड़ा दिये थे। उनमें से अधिकतर उन लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख थे जिन्हें वामपंथी ही नहीं नक्सली मिजाज का माना जाता था। करीब 15 मिनट तक उन आलेखों को गौर से देखने के बाद उन्होंने कहा था- पत्रकारिता में क्यों आना चाहते हो? राजनीति में क्यों नहीं चले जाते? मैंने कहा क्योंकि मैं कहीं और नहीं जा सकता। दीनानाथजी ने धीरे से हंस कर कहा- जो तुम लिखते पढ़ते हे उसे लेकर डर नहीं लगता? कोई मारेगा तो? मेरे लिए यह सवाल थोड़ा अप्रत्याशित था। मैंने कहा- कोई मारेगा तो बचायेंगे वे लोग जिनके लिए मैं लिखता-पढ़ता हूं। दीनानाथजी थोड़ा मुस्कुराये थे। फिर पूछा था- कौन बचायेगा- हरिजन? मैं समझ गया कि दीनानाथजी का इशारा किस तरफ है? मैंने कहा था- जनता अपने-आप में सुरक्षा कवच होती है सर। इस पर खूब जोर से हंसे थे दीनानाथजी। फिर कहा था- अपना यह जज्बा बनाकर रखना। आने वाले दिनों में इस जज्बे को लेकर पत्रकारिता करने वाले कम लोग मिलेंगे। इसके बाद उन्होंने पास बैठे गुंजनजी से कहा था- इस लड़के की चिठ्ठी बनवा दीजिए।
इसके महीनों बाद अचानक नवभारत टाइम्स के दफ्तर में सामना हो गया था उनसे। उन्हें मुझे पहचानने में मुश्किल से पांच मिनट लगे होंगे। उन्होंने हंसकर कहा- क्या पटना आ गये? मैंने कहा- नहीं सर, बक्सर में ही हूं। उन्होंने प्यार से कहा था- कोई दिक्कत हो तो बताने में संकोच मत करना।
अभी जब उनके निधन की खबर सुनी तो लगा कि भ्राविष्य को कितनी गहरी दृष्टि से देख रहे थे दीनानाथजी।  उनके आलेखों को लेकर, उनके कॉलम को लेकर कई बार हम कहते थे- ऐसे भाजपा का प्रचार नहीं करना नहीं चाहिए उनको। आखिर एक पत्रकार की मर्यादा का तो उन्हें निर्वहन करना चाहिए। लेकिन अब लगता है कि आदमी चाहे किसी भी विचार के साथ हो, उसके पक्ष में उसे मजबूती से खड़ा होना ही चाहिए।    

शनिवार, 9 नवंबर 2013

जनता का लड़ाकू चेहरा थे चंदेश्वरी दा

 चंदेश्वरी प्रसाद सिंह, चंदेश्वरी दा, सीपी सिंह। एटक के अध्यक्ष, भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य और सीपीआई की सेना जनसेवा दल के सेनानायक। कई नाम थे उनके लेकिन चेहरा एक ही था। हमेशा जनता की लड़ाई में डटे रहने वाला। छठ का उल्लास अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ था कि उनके निधन की खबर आई। रहने वाले वे भले बेगूसराय के थे लेकिन उन्हें जानने वाले पूरे बिहार में हैं।
राजनीति विज्ञान कहता है कि जनता जब सबसे तीखे संकट का सामना करती है तभी उसके सबसे जुझारू नेता सामने आते हैं। वे आते तो बिजली की चमक की तरह हैं लेकिन जनता के बीच रहते बिल्कुल उसी तरह हैं जैसे पानी में मछली रहती है। चंदेश्वरी दा ऐसे ही नेता थे। सीपीआई में आने के पहले नक्सलवादी आन्दोलन का उभार भी वे देख चुके थे। वे तो उच्च अध्ययन के लिए मास्को जाने की तैयारी में थे। इसके लिए उनका चयन भी हो चुका था। मास्को जाने के पहले वे कुछ जरूरी कागजात लेने भागलपुर से अपने गांव बीहट आये थे। तब बेगूसराय के लोग अपराधियों के आतंक के साये में जी रहे थे। गांव आते ही उनका भी सामना अपराधियों के साथ हुआ। जमकर लड़ाई चली। इसी क्रम में एक हत्या हो गई। इस हत्याकांड के अभियुक्त बनकर उन्हें सीपीआई के नेताओं के साथ जेल जाना पड़ा। और जब वे जेल से बाहर आये तो वे जान चुके थे उनके लिए विश्वविद्यालय का रास्ता मास्को से होकर नहीं किसानों के खेत-खलिहान और मजदूरों की फैक्ट्रियों से होकर गुजरता है।
इसके बाद तो चंदेश्वरीजी बिहार में भाकपा के हर कार्यक्रम के लिए जैसे जरूरी नाम बन गये थे। 65 साल के चंदेश्वरी दा भाकपा के युवा कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत थे। नौजवान कार्यकर्ताओं का कहना था कि चंदेश्वरी दा जब उनके साथ होते हैं तो ऐसा लगता है मानो उनके इर्द-गिर्द कोई सुरक्षा घेरा बना हुआ हो।
इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। उनके भाई बिन्देश्वरी सिंह की हत्या हुई। उनके कई साथी उनसे बिछड़े और खुद उन्हें एक हत्याकांड में उम्र कैद की सजा हुई। हालांकि इस सजा के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट गये और इस सजा पर उन्हें स्टे मिला। वे एक बार जिला पार्षद का चुनाव भी जीते जिसे बाद में रद्द किया गया। चंदेश्वरी दा केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि एक अच्छे लेखक भी थे। उनकी तीन किताबें शहीदों के रास्ते, लाल सितारा और जेल का खेल लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुकी हैं। एक ऐसे समय में जब राजनीति और विश्वसनीयता के बीच की खाई बढ़ती जा रही है, चंदेश्वरी दा जैसे लोगों का जाना बड़ा सदमा देता है।

रविवार, 9 जून 2013

जीवित हैं साथी हंसराज के सपने


कमलेश
हंसराज नहीं रहे। एक साल पहले उनका निधन हो गया- और यह खबर मुझे तब मिली जब मैंने बिहार नौजवान सभा के एक पुराने कार्यकर्ता कामेश्वर भाई को फोन किया। मैं सबका हाल-चाल ले रहा था। फलां कैसे हैं और फलां क्या कर रहे हैं? जैसे ही मैंने हंसराज के बारे में पूछा वे चौंक गये- तुम्हें नहीं पता? वे तो पिछले साल ही चल बसे। अचानक। चुपचाप अपने दुखों के साथ। लड़ाई की स्मृतियों को अपने सीने में संजोए। किसी को बगैर कुछ बताये। मैं फोन पकड़े सन्नाटे में डूबा रहा। थोड़ी देर बाद मैंने शिकायत की- किसी ने मुझे बताया भी नहीं। कामेश्वर भाई ने बताया कि कुछ पुराने साथियों ने बक्सर में छोटी सी सभा करके श्रद्धांजलि दे दी। दूर बैठे साथियों को सूचना कौन देता?
साथी हंसराज। हंसराज मल्लाह। हंसराज केवट। गायक हंसराज। और प्रशासन की नजर में नक्सली हंसराज। दोस्तों की भाषा में राका तो भोजपुर-बक्सर  के महानतम किसान आन्दोलन के समर्थन में उतरे छात्र-नौजवानों के लिए काका। एक पांव जेल में तो दूसरा पांव नुक्कड़ों पर नाटकों में। उम्र साठ साल के ऊपर लेकिन जब तान खींचकर गाते- जाग बाबू जाग हमरा दूध के दुलार हो...... तो पूरा माहौल उनके ठेठ गंवई आवाज की जादू में डूब जाता। दिन भर या तो गंगा नदी में अपने नाव पर रहते या हमलोगों के साथ घुमक्कड़ी करते और शाम में देर रात तक नाटक का रिहर्सल और इसके बाद ढ़ोलक की थाप पर उनके जनगीतों का आनन्द।
 दिसम्बर महीने की एक  सर्द शाम में उनसे पहली बार मिला था मैं। तब मैं इंटर का छात्र हुआ करता था और एक संस्कृतिकर्मी। कोहरे में डूबा बक्सर का कोईरपुरवा मोहल्ला और उसके पीछे का हरिजन टोला। नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति की बैठक खत्म हुई थी और मैं ठंड से लगभग ठिठुर रहा था। जो चादर मैंने ओढ़ रखी थी वह उस कड़ाके की ठंड के आगे अपने हाथ खड़े कर चुकी थी। कुहासा पानी की बूंद बनकर टपक रहा था। अचानक एक उम्रदराज व्यक्ति ने मेरे कंधे पर हाथ रखा- अरे नन्हका, चल ना नीम के नीचे लकड़ी जरवले बानी......। नन्हक हमारे यहां प्यार से छोटे बच्चे को कहा जाता है। मैंने उनका चेहरा देखा- हल्की सफेद दाढ़ी, खिचड़ी बाल, लुंगी और बदन पर केवल एक चादर। पांव में टायर वाली चप्पल। पेड़ के नीचे जली अलाव और हंसराज ने गोरख पांडे का वह मशहूर गीत गाना शुरू किया- समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...। प्रो. विजयानंद तिवारी ने परिचय कराया- हंसराज हैं लेकिन रहबर नहीं मल्लाह।
हंसराज पढे-लिखे नहीं थे। बस अक्षर ज्ञान भर था। लेकिन जब समाज की व्याख्या करते तो सामने वाला चकित रह जाता। अदिम समाज से अब तक की व्याख्या बिलकुल एक आम आदमी के अनुभवों में शामिल घटनाओं के साथ और आम आदमी की भाषा में। पहले सीपीआई में थे और जब पार्टी टूटी तो सीपीएम के साथ आ गये। सीपीएम के टूटने के बाद सीपीआई एमएल के साथ। कभी कामरेड मोती (बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में काम करने वाले कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी नेता) को गंगा पार कराने के लिए शाम से ही नाव तैयार करते। कामरेड मोती  के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद के कई पाठ सीखे। उस दौर की बातें वे हम नौजवानों को बड़ी गर्व से सुनाते थे। वे उस दौर में गाया जाने वाला एक गीत भी सुनाते थे- गरीब लाल झंडा गौर से पहचानो...।  जेल जाना तो जैसे उनकी रूटीन में शामिल था। एक बार वे जेल गये तो मैं उनसे मिलने पहुंचा। तब उन्होंने कवि विजेन्द्र अनिल से परिचय कराया था। वे भी उनसे मिलने पहुंचे थे।
साल तो ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन ये याद है कि तब बक्सर में गंगा नदी को ठेकेदारों से मुक्त करने का आन्दोलन चल रहा था। नाविकों ने तब बड़ा बहादुराना संघर्ष छेड़ा था और पुलिस व ठेकेदार की नाक में दम कर दिया था। पुलिस और ठेकेदार के गुंडे नाविकों पर हमले कर रहे थे। हंसराजजी के कारण बक्सर से हम छात्रों का एक समूह नाविकों के बीच रहता था। उन्हीं के बीच खाना, रहना और बक्सर शहर में नाटक करके व गीत गाकर उनके लिए समर्थन जुटाना। एक बार शाम के समय गंगा नदी के किनारे हमलोग अलाव के इर्द-गिर्द बैठे हुए थे। किसी गंभीर विषय पर बहस चल रही थी। हंसराजजी की फिक्र यह थी कि आग नहीं बुझे वरना इन लड़कों को ठंड लगेगी। वे लकड़ी ला-लाकर आग में डाल रहे थे । लकड़ियां नदी के किनारे की थी इसलिए हल्की भींगी थी।  इसके कारण वे धुंआ कर रही थी। धुंआ से थोड़ी परेशानी हो रही थी। मैं उन्हें बार-बार लकड़ियां डालने से  मना कर रहा था। मेरे मना करने के बावजूद उनके द्वारा लकड़ियां डाले जाने पर पर मेरे भीतर का बौद्धिक अहंकार जागा और मैं उनपर बरस पड़ा। वे पहले तो चुपचाप सुनते रहे फिर बोले- इ लड़ाई केकर? हमार नू? फिर तू के? मुझे लगा किसी ने मुझे थप्पड़ मार दिया हो। मैंने तुरंत उनसे माफी मांगी। एक बार समकालीन जनमत में एक लेख लिखने के कारण सीआईडी के अधिकारी मेरे घर पहुंच गये। वो लगभग रेड ही थी। मेरे घर के लोग परेशान। मुझे घर पर खूब डांट पड़ी थी तब। मैं परेशान हाल जन ज्वार पत्रिका के कार्यालय में पहुंचा था और सबको यह बात बताई। हंसराजजी हंसे थे। बोले- पहिलका बेर अइसही लागेला नन्हक। फेर आदत पड़ जाला। फिर कुछ दिनों के बाद मैं पटना आ गया। यहां पढ़ाई खत्म हुई और अखबार में काम करने लगा। कुछ दिनों के बाद जब बक्सर गया तो एक धरना पर उनसे मुलाकात हुई। उसी तरह नौजवानों के साथ। उन्होंने कहा- नौकरी करताड़ हो, लइकन के कुछ खियाव। और फिर बड़े अधिकार से मेरी जेब में हाथ डालकर पैसे निकाल लिये।
इधर दो साल पहले लम्बे समय के बाद उनसे मुलाकात हुई। वे घबराये थे और उनके साथ कामेश्वर भाई भी थे। हंसराजजी ने कहा था कि कुछ लोगों ने उनके लड़के को उठा लिया है और शायद उसकी हत्या कर डाली है लेकिन बक्सर की पुलिस कुछ नहीं कर रही है। कामेश्वर भाई के साथ वे मानवाधिकार आयोग के कार्यालय भी गये थे। वे चाहते थे कि इसकी खबर छपे और पुलिस कुछ कार्रवाई करे। फिर रुंआसे स्वर में कहा था- जब संगठन कमजोर होखेला त दुश्मन बरियार हो जाला। संगठन के कमजोर ना होखे के चाही।
कम्युनिस्ट पार्टियों की आपसी फूट से वे अक्सर परेशान रहते थे। उनक मानना था कि तीनों कम्युनिस्ट पार्टियां अगर जनसंघर्षों के स्तर पर भी एकजुट हो जाएं तो हालात काफी बदल सकते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी चाहे कोई भी हो अगर उसका कोई कार्यकर्ता मुश्किल में पड़ता तो वे परेशान हो जाते थे। उनसे जुड़ी अनगिनत यादें हैं- उनकी खुशी की, उनके गुस्से की और उनके प्यार की। बराबर संगठन को मजबूत करने का सपना देखने वाले साथी हंसराज तो अब बस यादों में ही आयेंगे। लेकिन संगठन को मजबूत बनाने का उनका सपना जीवित है। न केवल बक्सर और बिहार बल्कि पूरे देश में।     

गुरुवार, 16 मई 2013

लालू का जादू या नीतीश के खिलाफ गुस्सा

कमलेश
पारा 45 डिग्री के आसपास। धूप ऐसी की चमड़ी जला डाले और गर्म हवा ऐसी जो आपके बदन के पानी का एक-एक कतरा सुखा दे। ठीक ऐसे समय में यदि हजारों लोग गांधी मैदान के बीच में घंटों बैठकर किसी के भाषण का इंतजार करते हों तो मतलब साफ है कि भाषण करने वाले का जादू उनके सर पर चढ़कर भले न बोल रहा हो लेकिन जलवा जरूर बरकरार है। 15 मई को लालू प्रसाद  की परिवर्तन रैली में आए लोग बिहार की सत्ता को यह बता रहे थे कि उसके सुशासन का जादू अब ढलान पर लुढ़कने वाला है। हाल के दिनों में नीतीश कुमार के खिलाफ यह चौथी रैली थी। पहली रैली भाकपा ने अपने कांग्रेस के मौके पर की, दूसरी रैली भाकपा माले ने की और तीसरी रैली नीतीश से अलग होने वाले उपेन्द्र कुशवाहा ने की। चौथी परिवर्तन रैली थी। इनमें से उपेन्द्र कुशवाहा की रैली को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी रैलियों में जमकर भीड़ उमड़ी और सब में जदयू-भाजपा की सरकार के खिलाफ गुस्सा दिखाई पड़ा। लालू की परिवर्तन रैली में यह गुस्सा कुछ ज्यादा ही मुखर होकर उभरा। हालांकि इस रैली के साथ ही उनपर परिवारवाद चलाने और धन के बेतहाशा खर्च के आरोप भी लग रहे हैं।

लालू की रैली एक ऐसे समय में हुई है जब एक तरह से बिहार में राजनीतिक संक्रमण का दौर चल रहा है। एक तरफ जनता दल यू में भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ जाने की बेचैनी दिखाई पड़ रही है तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद किसी भी कीमत पर कांग्रेस का साथ छोड़ने को तैयार नहीं। अगले दो जून को महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव होने जा रहा है और इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए परीक्षा माना जा रहा है। उन्होंने इस चुनाव में अपने खास मंत्री पी.के. शाही को उम्मीदवार बनाया है जबकि यह सीट राष्ट्रीय जनता दल की है। अगले पांच-छह महीने के बाद लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू होने वाली हैं। मतलब यह कि लालू प्रसाद ने अगर रैली के लिए यह समय चुना तो वह अनायास नहीं था। वह स्पष्ट रूप से आने वाली राजनीतिक घटनाओं की पहलकदमी अपने हाथ में लेना चाहते थे।
अगर रैली में उमड़ी भीड़ का आकलन किया जाए तो निश्चित रूप से लालू अपनी योजना में सफल रहे हैं। जिस तरह से 14 मई की रात से ही लोगों का पटना आना शुरू हुआ वह राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डालने वाला था। 15 मई को सुबह आठ बजे से लोग सड़कों पर उतर आये थे। बारह बजते-बजते राजधानी पटना की सारी ट्रैफिक ठप हो गई थी और एक तरह से इन सड़कों पर दूर-दराज के गांवों से आये लोगों का कब्जा हो चुका था। लालू प्रसाद खुद रैली में तीन बजे पहुंचे लेकिन गांधी मैदान में लोगों का जुटान सुबह से होने लगा था। शायद यही कारण था कि धूप से परेशान लोग लालू प्रसाद के आने के साथ गांधी मैदान से निकलने भी लगे थे। लेकिन लालू प्रसाद को पता था कि उन्हें भाषण मे क्या बोलना है। उन्होंने सबसे पहले दलितों और पिछड़ों के सम्मान का मसला उठाया और लोगों से कहा कि आज जब वे बीडीओ के ऑफिस में जाते हैं तो बीडीओ उनके साथ कैसा व्यवहार करता है? थाने में दारोगा उनके साथ किस भाषा में बात करता है? उन्होंने सवाल किया कि बिहार में किनकी बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है? दरभंगा, मधुबनी और किशनगंज के मुसलमान नौजवानों को आतंकवादी बताकर क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है? इस मसले पर इस सरकार की जुबान बंद क्यों है? उन्होंने कांट्रैक्ट पर काम करने वाले शिक्षकों, डॉटरों और इंजीनियरों का मसला उठाया और लोगों को याद दिलाया कि जब वे अपनी मांग को लेकर पटना जाते हैं तो पुलिस किस तरह न केवल उनपर लाठी चलाती है बल्कि उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाती भी है। इन सवालों पर भीड़ की प्रतिक्रिया देखने लायक थी।
इस रैली के साथ लालू प्रसाद की शारीरिक भाषा भी बदली है। वे पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे दिखाई पड़ रहे हैं। रैली में जिस तरह पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी हुई है उससे उन्हें लगा है उनका टूटा हुआ जनाधार एक बार फिर उनके साथ जुड़ रहा है। इस रैली में वे सवर्ण जातियां भी लालू के साथ खड़ी नजर आई जो नीतीश सरकार से नाराज हैं। जाहिर है कि इस रैली  के साथ उन्होंने कांग्रेस को यह संदेश देने की कोशिश की है अभी भी उसके लिए बिहार में गठबंधन के लिए उनसे मजबूत दूसरा कोई नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ इस रैली के साथ लालू प्रसाद पर लगने वाला परिवारवाद का आरोप और भी मजबूत हुआ है। इस रैली में उनके दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी को जिस तरह से आगे किया गया उससे लालू पर हमले भी तेज हुए हैं। लालू के दोनों पुत्रों ने हालांकि रैली में भाषण नहीं दिया लेकिन वे मंच पर जिस तरह से आये उससे कई पुराने नेताओं का रंग फीका हुआ। रैली के प्रचार के दौरान भी दोनों पुत्रों को जिस तरह हीरो बनाया गया उससे कई नेताओं को अपनी उपेक्षा का अहसास हुआ है। बेटी मीसा भारती भी मंच पर दिखीं और पत्नी राबड़ी देवी तो पार्टी की कद्दावर नेता हैं ही। इन सबके बावजूद बिहार में नीतीश से नाराज लोगों को कोइ दूसरा विकल्प अब तक दिखाई नहीं पड़ रहा है। पिछले दिनों वामपंथी दलों ने संयुक्त मोर्चा बनाकर जनता के बीच जाने का ऐलान जरूर किया था लेकिन ऐसी कोई पहल कदमी दिखाई नहीं पड़ रही है।
इस रैली में लालू प्रसाद की अमीरी भी दिखाई पड़ी।  रैली में आदमी को लाने के लिए सात ट्रेनें बुक की गई थीं और इसके लिए रेलवे को डेढ़ करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया। इसके अलावा पूरे पटना को होर्डिंग और बैनरों से पाट दिया गया था। राजधानी में बसों की कतार लग गई थी। ऐसी कोई मंहगी गाड़ी नहीं जिसपर राजद के नेता नहीं पहुंचे हों। आयकर विभाग ने भी राष्ट्रीय जनता दल को नोटिस देकर पूछा है कि आखिर इस रैली पर उसने कितना पैसा खर्च किया। उसने पूरा हिसाब-किताब मांगा है।

शनिवार, 11 मई 2013

अलविदा साथी गंगेश, आप बहुत याद आएंगे

गंगेश आप बहुत याद आएंगे ( उनकी फोटो)
-कमलेश

इस पेशे की यही विसंगति है। आपके साथ रोज काम करने वाला साथी अचानक इस दुनिया को विदा कह देता है और आपके पास इस  दारूण दुख को बर्दाश्त करने का समय भी नहीं होता। आप एक दिन के लिए भी खबरों की रफ्तार से बाहर निकलकर अपने दोस्त को याद करने के लिए नहीं रुक सकते। आपके लिए अपने मित्र की मौत की खबर भी अखबार में छपने वाली एक खबर भर हो जाती है। आज फिर ऐसा ही हुआ। अपने दोस्त, साथी, मित्र और सुख-दुख के राजदार गंगेश श्रीवास्तव अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। हमने खबर सुनी, एक मिनट के लिए आह किया और फिर अपने काम में जुट गये। उनके डेस्क पर किसी और साथी को काम करते हुए देखकर उनका चेहरा आंखों के सामने घूमा लेकिन अखबार की तेजरफ्तार जिंदगी ने कुछ सोचने का समय ही नहीं दिया।
वे मुझे हमेशा भाई साहब कहते थे। उम्र में मुझसे काफी छोटे थे। चार साल से हमलोग एक दूसरे के साथ काम कर रहे थे। ईश्वर से डरने वाले और कभी किसी का अहित नहीं करने वाले गंगेश। सांवला-सलोना चेहरा, बोलती हुई सी बड़ी आंखें, होठों पर हमेशा मुस्कुराहट, पतला-दुबला शरीर और अक्सर माथे पर झूलते केश। देखकर शायद ही कोई कह सकता था कि ये शादी-शुदा आदमी हैं। हमेशा इस बात को लेकर सावधान रहते कि उनके कारण किसी को परेशानी नहीं हो। तकरीबन दो साल पहले मैं और गंगेश दफ्तर की एक जरूरी मीटिंग के सिलसिले में दिल्ली गये थे। हमें एक प्रजेन्टेशन देना था। सारा प्रेजेन्टेशन गंगेश ने रात भर जगकर तैयार किया था। मुझे केवल इसे लोगों के सामने रखना था। मैंने कहा था उनसे- गंगेशजी, सारी मेहनत आपने की है तो प्रेजेन्टेशन भी आपको करनी चाहिए। गंगेश मुस्कुराकर बोले थे- अरे भाई साहब, आदमी को वही काम करना चाहिए जो वह अच्छी तरह कर सकता हो। मैंने इसे अच्छी तरह तैयार कर दिया है अ‍ैर अब आप इसे अच्छी तरह प्रस्तुत कर दीजिए। दिल्ली में इस बात को लेकर हमेशा सावधान रहे कि मुझे तो कोई परेशानी नहीं हो रही है। पटना कार्यालय में कभी-कभी मेरी टेबुल के सामने आते थे और कहते थे- भाई साहब, मुझे फलां खबर में इस तरह का इनपुट चाहिए। प्लीज दिलवा दीजिए। मैं परेशान। संबंधित रिपोर्टर चला गया। मुझे मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं। मैं कहता- गंगेशजी, रिपोर्टर तो चला गया है। अब मैं ही कुछ कोशिश करके देखता हूं। मेरी परेशानी देखते ही मुस्कुरा देते गंगेशजी। कहते- रहने दीजिए भाई साहब, मैं कर लूंगा। टेंशन मत लीजिए।
जब गंगेशजी ने हिन्दुस्तान पटना ज्वाइन किया था तो तत्कालीन संपादक अकु श्रीवास्तव ने उनसे मेरा परिचय कराते हुए कहा था- अब तुम इस आदमी का कमाल देखना। इसकी भोली सूरत पर मत जाना। कमाल तो इसकी अंगुलियों में है। सचमुच अगले ही दिन से गंगेश का जादू पेज पर दिखने लगा था। ले आउट और डिजाइन के तो मास्टर थे वो आदमी। एक बार काम में लगे तो काम पूरा कर ही डालना है। पूरी रात जगकर काम करने के बाद भी अगले दिन फिर समय पर मुस्कुराते हुए ऑफिस पहुंचना। किसी से कोई शिकायत नहीं। तत्काल निर्णय लेने की जबर्दस्त क्षमता थी। मात्र यही नहीं जो निर्णय लेते उसे तत्काल लागू भी करते थे। 
मुझसे कई बार थोड़ी-बहुत बहस भी होती थी। उनके आने के कुछ दिनों के बाद। लेकिन जल्दी ही हमलोग अच्छे दोस्त बन गये थे। वे निरंकारी संत समाज से जुड़े थे। कई बार उसकी खबर लेकर आते तो मुझे यह याद दिलाना नहीं भूलते कि मैं वामपंथी आदमी हूं। लेकिन अगले दिन अच्छी खबर देखकर मिलते ही मुस्कुरा देते थे। जिस दिन वे अखबार की समीक्षा करने बैठते, मैं तो डर जाता था। हर चीज पर बारीक नजर। खबरों को लेकर एकदम अलर्ट। किसी खबर से जुड़ी कौन सी खबर कब छपी है यह उन्हें हमेशा याद रहती थी।
काम के दौरान साथियों के साथ खूब हंसी-ठिठोली करते। पटना सिटी से आने वाले नवलजी से खुरचन खिलाने की जिद करना तो महेन्द्र झा से ठिठोली करना। कभी सत्येन्द्र पाण्डेयजी से कहना- महाराज, आप तो युवा के इंचार्ज हैं। खिलाना तो आपका हक बनता है। और जब तक सत्येन्द्रजी मिठाइयां न मंगा दें, उनका पीछा नहीं छोड़ते थे। सचिन तेंदुलकर ने शतक ठोंकी नहीं कि पहुंच जाते थे सुनील झा के डेस्क के आगे। उसके बाद शुरू हो जाती जिद- भाई साहब, जब तक आप चंद्रकला और समोसा नहीं मंगायेंगे तब तक पता कैसे चलेगा कि सचिन ने शतक बनाई है। वे तब तक सुनील झा का पीछा नहीं छोड़ते जबतक कि वे उनकी फरमाइश पूरी नहीं कर देते। दशहरे में खुद जलेबियां मंगाते और सबको बुलाकर खिलाते। फिर कहते- जलेबियां नहीं तो दशहरे का मजा कहां साहब।
माता-पिता के इकलौते पुत्र थे गंगेश। पिता बहुत बीमार रहते थे। इसके चलते कभी गांव, कभी पटना तो कभी अस्पताल का चक्कर। लेकिन क्या मजाल कि कभी कोइ शिकन भी उनके चेहरे पर आ जाए। पिछले साल ही उनके पिता का निधन हुआ था। तब बहुत दुखी हुए थे। पिता के वे कितने करीब थे यह उस समय दिखाई पड़ा था। अभी उस सदमे से उबरे ही थे कि मौत ने पंजा मारकर उन्हें हमसे छीन लिया। अब उनकी यादें भर हमारे साथ रहेंगी लेकिन ये यादें तब तक हमारे पास रहेंगी जबतक अखबार के कागजों की खुशबू बरकरार रहेगी। अलविदा साथी गंगेश, आप बहुत याद आएंगे। 

रविवार, 17 मार्च 2013

मौत के 38 साल बाद जी उठे डॉ. निर्मल

 -कमलेश
बिहार के किसानों के युद्ध के नायक रह चुके  डॉ. निर्मल की प्रतिमा उनके अपने कॉलेज दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर में क्या लगी, राजनीतिक हलकों से लेकर चिकित्सकों तक के बीच जैसे तूफान खड़ा हो गया है। भाजपाइयों ने दरभंगा से लेकर पटना तक में सरकार पर दबाव डाला और   स्वास्थ्य मंत्री बने अश्विनी कुमार चौबे ने यह घोषणा की कि सरकार दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर से डॉ. निर्मल की प्रतिमा को हटा लेगी। सरकार की इस घोषणा का विरोध शुरू हो गया है, कई सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार और डॉ. निर्मल के बैच के छात्र रहे कई डॉक्टर सरकार के इस फैसले का विरोध करने दरभंगा पहुंच गये हैं...



कहते हैं फिनिक्स पक्षी अपनी राख से जी उठता है। पता नहीं मिस्र की यह कहावत सच है या नहीं लेकिन बिहार के किसानों के युद्ध के नायक रह चुके डॉ. निर्मल अपनी मौत के 38 वर्ष के बाद मानो अचानक जी उठे हैं। डॉ. निर्मल सिंह, कामरेड निर्मल और नक्सलवादियों की भाषा में शहीद डॉ. निर्मल। उनके नाम को लेकर जितनी बहस अभी चल रही है उतनी तो तब भी नहीं हुई थी जब उन्होंने मेडिकल शिक्षा का शानदार कॅरियर छोड़कर भोजपुर के धधकते खेत-खलिहानों में नक्सलवादी आन्दोलन की राह पकड़ी थी। पुलिस से घंटों लड़ाई लड़ने के बाद जब उनकी लाश पाई गई थी तब लोगों को पता चला था कि किसानों द्वारा चलाये जा रहे उस मुक्ति युद्ध में कितने मेधावी लोग अपनी जिन्दगी होम कर रहे हैं। उसी डॉ. निर्मल की प्रतिमा उनके अपने कॉलेज दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर में क्या लगी, राजनीतिक हलकों से लेकर चिकित्सकों तक के बीच जैसे तूफान खड़ा हो गया है। भाजपा के नगर विधायक संजय सरावगी के नेतृत्व में भाजपाई लोगों ने डॉ. निर्मल की प्रतिमा लगाये जाने का इस आधार पर विरोध किया कि एक नक्सली नेता की प्रतिमा कॉलेज परिसर में कैसे लग सकती है। भाजपाइयों ने दरभंगा से लेकर पटना तक में सरकार पर दबाव डाला और  विधान परिषद में भाजपा के कोटे से स्वास्थ्य मंत्री बने अश्विनी कुमार चौबे ने यह घोषणा की कि सरकार दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर से डॉ. निर्मल की प्रतिमा को हटा लेगी। अब सरकार की इस घोषणा को लेकर मानो पूरे बिहार में तूफान खड़ा हो गया है। सरकार की इस घोषणा का विरोध शुरू हो गया है और भाकपा, माकपा और भाकपा माले ने इसके खिलाफ आन्दोलन शुरू कर दिया है। मात्र यही नहीं कई सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार और डॉ. निर्मल के बैच के छात्र रहे कई डॉक्टर सरकार के इस फैसले का विरोध करने दरभंगा पहुंच गये हैं। 
निर्मल सिंह भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के बरौरा के रहने वाले थे। वे एक मेधावी छात्र थे और 1968 में उन्होंने दरभंगा मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था। भले वे मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे थे लेकिन समाज में व्याप्त गैरबराबरी उन्हें बराबर परेशान करती थी। उसी समय भोजपुर जिले में जगदीश मास्टर के नेतृत्व में नक्सलवादी आन्दोलन तेज हुआ। 1971 में वे बिहार में चल रहे नक्सलवादी आन्दोलन में शामिल हो गये और उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी। लोगों को इसका पता तब चला जब दरभंगा मेडिकल कॉलेज में एक बम विस्फोट के बाद नक्सलवादी आन्दोलन के समर्थन में पर्चे बांटे गये। नक्सलवादी संगठन के लिए भी वे एक अच्छे संगठनकर्ता साबित हुए। बाद में वे सीपीआई एमएल के तत्कालीन महासचिव जौहर के साथ एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। यह मुठभेड़ भोजपुर जिले के बाबूबांध गांव में 1975 में हुई थी। कहते हैं, पूरी रात मुठभेड़ चली थी। नक्सली दस्ते की सारी गोलियां खत्म हो गईं लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया और आखिरकार लड़ते-लड़ते मारे गये। नक्सलवादी संगठन आज भी निर्मल को अपने नेता के रूप में श्रद्धा के साथ याद करते हैं। भोजपुर जिले में आज भी एक गीत गाया जाता है- जब-जब याद आवे बाबूबांध के कहनिया, अंखिया भरि आवे ए साथी.....।
दरभंगा जिले में काम कर रहे भाकपा माले की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य धीरेन्द्र कुमार झा बताते हैं कि पिछले साल दरभंगा मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्रों की एक बैठक हुई। इस बैठक में दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर के सौंदर्यीकरण का फैसला लिया गया। इसके तहत कई काम हुए मसलन तालाब बना, पार्क बना और कई पूर्व छात्रों के नाम पर नये काम शुरू हुए। इसी क्रम में पिछले 27 जनवरी को दरभंगा मेडिकल कॉलेज के परिसर में डॉ. निर्मल की भी मूर्ति लगाई गई। चूंकि वे भी इसी कॉलेज के छात्र थे इसलिए पूर्व छात्रों ने उन्हें भी याद किया। मूर्ति के निर्माण के लिए कॉलेज के पूर्व छात्रों ने जमकर मदद भी की। देश ही नहीं विदेशों में भी कार्यरत चिकित्सकों ने इसके लिए पैसे भेजें। उस समय कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य डॉ. अजीत चौधरी थे। वे अभी कॉलेज में पैथोलॉजी विभाग के अध्यक्ष हैं। उनके अलावा कॉलेज के ही एक अन्य शिक्षक डॉ. बीएमपी यादव ने भी इसमें मदद की। वे डॉ. निर्मल के बैच के छात्र थे।
 लेकिन इस प्रतिमा को लगाने के बाद भाजपा से जुड़े लोगों ने इसको लेकर जमकर हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने कॉलेज परिसर से प्रतिमा को हटाने की मांग की। मामला विधान परिषद में भी उठाया गया और वहां सरकार ने कहा कि उस प्रतिमा को तीन दिनों के भीतर हटा दिया जाएगा। अब सरकार के इस फैसले के खिलाफ दरभंगा में आन्दोलन शुरू हो गया है। राजधानी से साहित्यकार प्रेमकुमार मणि और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राजेश्वर आदि ने दरभंगा पहुंचकर सरकार के फैसले का विरोध किया। मात्र यही नहीं तीनों वाम दलों के साथ-साथ राजद और जनता दल यू के भी जमीनी हिस्से ने प्रतिमा को हटाने का विरोध किया है। दूसरी तरफ प्रतिमा लगाने की अनुमति देने वाले तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य के खिलाफ कॉलेज प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है और उनके खिलाफ मुकदमा भी कर दिया है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अरुण कुमार ठाकुर का कहना है कि वे चाहते हैं कि कॉलेज में शांति बहाल हो और चिकित्सक के खिलाफ की गई कार्रवाई वापस हो। उनका यह भी कहना है कि परिसर में लगी प्रतिमा के बारे में जनहित के अनुसार और नियमानुकूल फैसला लेना चाहिए।