गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

केकर थाना, कचहरी केकर

केकर थाना, कचहरी केकर
कमलेश
बिहार में एक पुरानी कहावत है- बारह साल के बाद एक युग बदलता है. और वो सारी चीजें भी बदल जाती हैं जो पहले से चली आ रही थी. लेकिन बिहार का एक छोटा सा गांव  बथानी टोला  जैसे इस कहावत पर हंस रहा है और बदलाव की बात करने वालों को आइना दिखा रहा है.. यहाँ तो सोलह साल के बाद भी कुछ नहीं बदला. न तो मरने वालों की किस्मत और न ही मारने  वालों का राज-पाट. सब कुछ वही है-वही राजा-महाराजाओं के ज़माने वाला. मरने वाले आज भी मर रहे हैं और मारने वाले कल से ज्यादा नृशंस तरीके से  मार रहे हैं. पुलिस, कोर्ट और कचहरी सब मारने वालों के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ रहे हैं. यही नहीं दिखाने के  लिए एक दूसरे पर जिम्मेदारियों की फेंका फेंकी का खेल भी चल रहा है. बथानी टोला के मामले में लगभग सोलह साल के बाद आये हाई कोर्ट के फैसले को देखने के बाद वर्षों पहले सुना हुआ एक भोजपुरी गीत  याद आ रहा है- पुलिस केकर, मलेटरी केकर, केकर थाना, कचहरी केकर. हम भयनी कौड़ी के तीन पटवारी केकरा नामे जमीन;ये गाना  बथानी टोला  के लोग भी खूब गाते थे लेकिन इस गाना का अर्थ शायद अब उन्हें मालूम चल रहा होगा. 
देश भर में न सही लेकिन बिहार में तो इस खबर  पर बात चल ही रही है. बथानी टोला में सोलह साल पहले हुए एक नरसंहार के सारे तेईस अभियुक्तों को  हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है. उस नरसंहार में 21 लोग मारे गए थे. निचली अदालत ने इन बरी हुए तेईस लोगों में से तीन को फांसी और बीस को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.  हाई कोर्ट ने उसके फैसले को ख़ारिज कर दिया.  हाई कोर्ट ने वैसे यह जरूर कहा कि अभियुक्तों को बचाने के लिए जाँच कार्य में लापरवाही बरती गयी है.  हाई कोर्ट  ने भले अब कहा हो लेकिन इस नरसंहार कांड के बाद से ही  पुलिस के रवैये से साफ जाहिर हो रहा था कि इस पूरे मामले में उसकी सहानुभूति किसके साथ थी.राज्य के पुलिस मुखिया अब  हाई कोर्ट  के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहे हैं लेकिन यह नहीं बताते कि जिन बेहया और बदचलन पुलिस वालों के कारण बथानी टोला  के लोगों के हाथ से इंसाफ निकाल गया उन  पुलिस वालों  को क्या सजा दी जाएगी. दिलचस्प तो यह भी है कि  बथानी टोला  को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री चिदंबरम  कह रहे हैं कि इस मामले में आन्दोलन  होना चाहिए.  बथानी टोला  के लोगों को गृह मंत्री की इस बात का मतलब समझ में नहीं आ रहा है.
 भोजपुर जिले के सहार प्रखंड  का एक गांव है बथानी टोला. एक जमाने में बिहार में चल रहे भूमि संघर्षों की आंच में तपता और खौलता गांव. एक तरफ गांव के भूमिहीन खेत मजदूर और दलित थे तो दूसरी ओर भूमिपति. दलितों के पक्ष में खड़ी  थी भाकपा माले तो भूमिपतियों के लिए हरवा हथियार से लैस थी खूंखार  रणवीर सेना.  दोनों के बीच  पिछले कई वर्षों से लगातार लड़ाई जारी थी.  11 जुलाई 1996 को  बथानी टोला में उतरा था मनहूस दिन. दोपहर के करीब एक बजे पचास-साठ लोग गांव में घुस आये थे. सभी हथियारों से लैस थे. रणवीर सेना के इस जत्थे  में किसी के हाथ में बन्दुक थी तो किसी के हाथ में तलवार और किसी के हाथ में भाला. गांव में हुआ हल्ला-रणवीर सेना वाला आ गइलन स. इधर हमलावर गोलियां बरसाने लगे. लोगों को जिधर जगह मिली उधर भागे. गांव के मारवाड़ी चौधरी के घर में छुपने के लिए लोग भागे. हमलावरों ने  मारवाड़ी चौधरी के घर के साथ-साथ झोपड़ियों  में आग लगा दी. कुछ लोग जल कर मरे तो कुछ लोगों को गोली मार दी गयी. कई लोग तो तलवार से काट डाले गए. कुल 21 लोग मारे गए थे. मरने वालों में तीन साल का अमीर सुभानी था तो चालीस साल की जेबू निशा भी थी. हत्यारों ने छोटे बच्चों के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा था. गांव के ही एक नईमुद्दीन के घर के पांच सदस्य मार डाले गए थे. गांव में बना शहीद स्मारक आज भी मारे गए लोगों की याद दिलाता है. अब ऐसा लग रहा है जैसे इस सच को ही झूठ बनाने की कवायद चल रही है.
         बथानी टोला के लोग अब चुप हैं. शांति से सब कुछ देख रहे हैं. उस नरसंहार को  याद करना नहीं चाहते, ऐसा भी नहीं है. वे आज भी उस स्मारक को देखते हैं और डर जाते हैं. उनको लगता है कि कोई फिर आकर उन्हें तबाह कर देगा और अदालत से भी बेदाग छुट जायेगा. कल भी ऐसा ही होता था और आज भी ऐसा ही हो रहा है. दरअसल वे जुबान से कुछ नहीं बोलते लेकिन उनकी ऑंखें सब कुछ कह रही हैं. बथानी टोला से एक सवाल उठ रहा है- अगर निचली अदालत से सजा पाने वाले सभी लोग निर्दोष थे तो उस नरसंहार को अंजाम देने वाले कौन थे. बथानी टोला की जमीन पर गिरे उन 21 लोगो का खून किसके माथे पर है. अगर गरीब लोग मारे गए थे तो मारने वाले भी जरूर हैं. उन्हें सजा कब मिलेगी. एक बार फिर उन्हें वह गीत याद आ रहा है -पुलिस केकर, मलेटरी केकर, केकर थाना, कचहरी केकर. हम भयनी कौड़ी के तीन पटवारी केकरा नामे जमीन;

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

गरीबों से छीनी जा रही बिजली

 कमलेश
साभार- गोपाल
रामध्यान महतो कपड़े की एक दुकान पर काम करते हैं. पटना के खाजपुरा मोहल्ले में वे एक किराये के घर में रहते हैं. उन्होंने पैसे बचाकर ऑफ सीजन में एक कूलर ख़रीदा था. अच्छी खासी छुट मिल गयी थी. सोचा था कि कूलर रहेगा तो इस बार की गर्मी में बच्चों को पढने-लिखने में परेशानी नहीं होगी. पिछली गर्मी में बच्चों की हालत देख कर उनका कलेजा मुंह को आ गया था और तभी से उन्होंने पैसे बचाने शुरू कर दिया था. साढ़े चार हजार रुपये का कूलर आया तो घर में जैसे उत्सव का माहौल बन गया था. लेकिन दुर्भाग्य आसानी से पीछा कहाँ छोड़ता है. अब हालत यह है कि रामध्यान जी को कूलर का स्विच छूते हुए डर लगता है. उनकी पत्नी और बच्चे जब भी कूलर को देखते हैं तो राज्य  सरकार को खूब सरापते हैं. उन्हें डर है कि वे कूलर चलाएंगे तो बिजली का बिल इतना आ जायेगा कि पूरे महीने का बजट ही गड़बड़ा जायेगा.

रामध्यानजी कहते हैं कि अगर एक हजार रुपया बिजली का बिल भरेंगे तो खायेंगे क्या.
 दरअसल बिहार में बिजली का बिल इतना आ रहा है कि धीरे-धीरे बिजली आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही  है. बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक तो बिजली रहती नहीं है और जब रहती है तो उसको जलाना काफी महंगा होता है. लिहाजा अब गरीब-गुरबे ज्यादातर बिजली चुरा कर ही जला रहे हैं.

अभी बिहार में यदि आपके घर में बिजली का बिल एक महीने में तीन सौ यूनिट से ज्यादा आता है तो हो सकता है कि आपको प्रति यूनिट चार रूपये का बिल भरना पड़े. एक तो बिजली बिल की दर बढ़ा दी गयी और ऊपर से प्रति यूनिट  फ्युएल सरचार्ज वसूला जाता है. इस सरचार्ज का कोई फिक्स रेट नहीं है. लोग पिछले एक साल से  फ्युएल सरचार्ज दे रहे हैं लेकिन आजतक उन्हें इसका हिसाब-किताब समझ में नहीं आया है,. कभी 69 पैसा तो कभी 60 पैसा प्रति यूनिट फ्युएल सरचार्ज वसूला जाता है. एक बार तो एक रुपया 18 पैसा फ्युएल सरचार्ज लिया गया था. मतलब यदि आप पटना जैसे शहर में दो कमरों के घर में रहते हैं तो आपका बिजली बिल एक हजार रुपया से कभी काम नहीं आएगा. पहले यह 6 -7  सौ रुपया के आस पास रहता था.

जब बिहार राज्य बिजली बोर्ड ने फ्युएल सरचार्जके नाम पर अनाप-शनाप पैसा लेना शुरू किया तो कुछ विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया. इस पर सरकार के बिजली मंत्री का कहना था कि विपक्षी दलों के लोग पढ़ते लिखते नहीं हैं. इन्हें पता ही नहीं है कि बिजली के बिल में बढ़ोतरी का काम सरकार नहीं करती है बल्कि इसके लिए एक नियामक योग बना हुआ है. जिस मंत्री ने यह तर्क दिया वह बराबर दूसरों के पढने-लिखने की परीक्षा लिया करते हैं. लेकिन बिहार के गरीब यह तो जरूर पूछेंगे कि यदि आपका बिजली बोर्ड ही आपके कहने में नहीं है तो इतना बड़ा राज्य तो भगवान भरोसे ही रहेगा.

 दरअसल बिहार जैसे राज्य में किसी गरीब के घर में बिजली की बत्ती और पंखा चलने का सम्बन्ध सीधे उसके स्वाभिमान से जुड़ा होता है. अगर यह देखना हो तो किसी मुसहर टोले के उस घर में चले जाइये जिसने किसी तरह पंखा खरीदने का सुख पाया है. यह मसला उनके बच्चों की पढाई लिखाई से भी जुड़ा है. दिन भर मेहनत-मजदूरी करने के बाद अगर किसी को पढने की इच्छा होती है तो यही बिजली उसकी मदद करती है.

एक समय था जब गांवों के दलितों के टोले में बिजली जलती दिखाई पड़ती थी तो तार काट लिए जाते थे कि न रहेगा तार और न जलेगी बिजली. काफी मेहनत और संघर्षों के बाद उन्होंने बिजली जलाने का हक़ पाया है और अब इसे बड़े तरीके से छीना जा रहा है. दुखद तो यह है कि इस मसले को लेकर सड़क पर उतरने को कोई भी तैयार नहीं. कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी नहीं.

रविवार, 1 अप्रैल 2012

वाम राजनीति को झकझोर गयी सीपीआई की कांग्रेस

कमलेश
सीपीआई का इक्कीसवां महाधिवेशन ख़त्म हुआ. लगभग पांच दिनों तक चले इस कांग्रेस ने बिहार में उम्मीद की एक नई किरण जगाई है. कांग्रेस की शुरुआत एक रैली से हुई और इस रैली से  सूबे में वैसे लोगों को काफी सुकून मिला है जो बिहार में राजनीतिक बदलाव देखना चाहते हैं और जिन्हें राजद, कांग्रेस, जेडी य़ू या फिर बीजेपी जैसे दलों से कोई उम्मीद नहीं है. लम्बे समय के बाद पटना की सड़कों पर किसी वामपंथी दल ने अपनी ताकत दिखाई थी. पिछले दिनों माले की भी रैली हुई थी लेकिन उसके लोग सड़क पर उस दिन इस तरह नहीं उतरे थे. एक बड़ी रैली लेकिन अनुशासित और दूसरों की परेशानियों का ख्याल रखने वाली. हालाँकि रैली के बाद हुई सभा में इतनी भीड़ नहीं रही जितनी रैली में दिखाई पड़ी थी. शायद उस दिन चल रही लू और धूप का असर था. लेकिन उस दिन सीपीआई के महासचिव ए. बी. वर्धन के तेवर बता रहे थे कि सीपीआई अब बिहार में आर या पार की लड़ाई के मूड में है. उन्होंने न केवल वामपंथी एकता की बात की बल्कि क्षेत्रीय दलों से भी कहा कि वे फैसला करें कि उन्हें किसके साथ रहना है. कार्पोरेट और घोटालेबाजों की संरक्षक बीजेपी और कांग्रेस के साथ या फिर वाम जनवादी ताकतों के साथ.
महाधिवेशन के पहले दिन माकपा के महासचिव प्रकाश करात, माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, आर एस पी के अवनी राय और एस य़ू सी आई के देवव्रत विश्वास सभी ने वामपंथी एकता की वकालत की. इससे लोगों में एक नया सन्देश गया है. एक बात साफ हो गयी है कि अगर वामपंथी ताकत बिहार में मिल कर नहीं लड़ेंगी  तो उन्हें ख़त्म हो जाना होगा. वैसे भी आम लोग आज भी इस बात को नहीं समझ पाते हैं कि भाकपा, माकपा और माले में अंतर क्या है और ये लोग अलग-अलग चुनाव क्यों लड़ते हैं. महाधिवेशन में भी जब ये नेता वाम एकता की वकालत कर रहे थे तो निचले स्तर के कार्यकर्त्ता अपनी तालियों से अपनी इच्छा बता रहे थे.
हिंदी पट्टी के बिहार जैसे राज्य में  सीपीआई का महाधिवेशन होने का मतलब ही है कि सीपीआई इन राज्यों में अपने घटते जनाधार से परेशान है. कभी बिहार विधान सभा में मुख्या विपक्षी दल रहने वाली सीपीआई के पास आज मात्र एक विधायक है. पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अनजान ने एक बातचीत के दौरान स्वीकार किया कि हिंदी पट्टी में चली जातिवादी और सांप्रदायिक हवा के कारण उनकी पार्टी की जमीन कमजोर हुई है और बिहार में भी ऐसा ही हुआ है. लेकिन उन्होंने साथ यह भी कहा कि इस महाधिवेशन में हमलोग किट्टी पार्टी या हाउजी खेलने नहीं आये हैं. इस महाधिवेशनके माध्यम से  हमलोग बिहार में अपनी जमीन मजबूत करेंगे और वाम जनवादी आन्दोलन की शुरुआत करेंगे.

महाधिवेशन के अंतिम दिन जब ए.के. वर्धन अपना विदाई भाषण दे रहे थे तो भी उन्होंने साफ किया कि आने वाले दिनों में पार्टी हिंदी पट्टी खासकर बिहार में अपनी ताकत झोंकेगी. उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे गांवों में जाकर जमीन के मसले पर लड़ाई तेज करें. उन्होंने याद  दिलाया कि बिहार जैसे राज्यों में पार्टी तभी मजबूत रही थी जब उसने जमीन को लेकर लड़ाई लड़ी. नए महासचिव सुधाकर रेड्डी ने भी पार्टी के विस्तार के लिए हिंदी पट्टी में मेहनत का वादा किया.
तो उम्मीद रखी जाये कि आने वाले दिनों में बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों को देखने का मौका मिलेगा. अभी बिहार विधान सभा में एकमात्र कम्युनिस्ट विधायक है और वह सीपीआई का ही है. इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि इस प्रदेश में आज भी सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई ही है. कई जिलों में आज भी उसका जनाधार तारीफ के काबिल है. महाधिवेशन में आये प्रतिनिधियों से बात करने से लगा कि इस बार वे बिहार में काम  कर रहे माओवादियों के प्रति भी नरम रुख अख्तियार करेंगे. मतलब यह कि इस बार अपनी जमीन को वापस पाने के लिए पार्टी कुछ भी करेगी. अभी पार्टी का राज्य सम्मलेन नहीं हुआ है. एक महीने के भीतर उसके होने की संभावना है. तय मानिये कि उस सम्मलेन के बाद बिहार में लड़ाई देखने को मिलेगी. इस सम्मलेन में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी जिस तरह मेहनत की उससे अच्छा सन्देश गया है. पार्टी की बिहार इकाई ने इस सम्मलेन के लिए एक करोड़ रूपये से भी अधिक का चंदा जुटाया और इसका अधिकतर हिस्सा पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दिया. किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह साधारण बात नहीं है. इसके अलावा दो हजार लोगों के पांच दिनों तक खाने के लिए अनाज कार्यकर्ताओं ने गांवों से जुटाया. जाहिर है कि इस पुरे अभियान में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की पूरी ओवर वोयलिंग हो गयी होगी, 
लेकिन इस सारी कवायद का कोई मतलब नहीं होगा यदि इस कांग्रेस के बाद पार्टी के नेता  और कार्यकर्ता शांत होकर पड़ जाय. ऐसा न हो कि कहीं गोली चले और कामरेड पार्टी के सर्कुलर का इंतजार करते रहे. बिहार में गरीबों से बिजली की रोशनी में रहने का अधिकार छीना जा रहा है. राज्य में बिजली इतनी मंहगी हो गयी है कि एक बार फिर गरीब ढिबरी की रौशनी में रहने को विवश हो रहे हैं. इस सवाल को कम्युनिस्ट नहीं उठाएंगे तो फिर कौन उठाएगा. इस कांग्रेस के बाद बिहार की वामपंथी राजनीति में आलोडन आया है और आम लोग उनकी तरफ देख रहे हैं.

शनिवार, 3 मार्च 2012

शहादत दिवस (23 मार्च) की याद में ख़ास

 
भगत सिंह फांसी की काल कोठरी से

-कमलेश
( ये एकल अभिनय मैंने उस समय किया था जब मैं इंटर का छात्र था. एक बंगाली नाटक देखने के बाद मैंने इसे खुद लिखा था. मैंने इसकी लगभग 50 प्रस्तुतियां की. 23 मार्च शहादत दिवस के मौके पर मैं इस नाटक को आपसे साझा कर रहा हूँ.) 

(एक खाट मंच के बीचों-बीच पड़ी है। एक किनारे एक छोटा सा स्टूल जिस पर पानी का गिलास और एक मोड़ा हुआ कागज पड़ा है। खाट पर एक नौजवान बैठा है। दोनों हाथों की हथेलियों से चेहरा छिपाए हुए है। नौजवान भगत सिंह है जिसे फांसी की सजा दी जा चुकी है। दूर कहीं से दीवार घड़ी के एक बजाने वाले घंटे की आवाज आती है और नौजवान उठकर टहलने लगता है. बेचैन करने वाले भाव। कभी-कभी मानो भावशून्य होकर आकाश में देखने लगता है।)
भगत सिंह: उफ....रात के एक बज गये हैं और मुझे नींद क्यों नहीं आ रही है? सोने की कोशिश करता हूं तो मन तुरत कहीं और भागने लगता है। कभी गांव के खेतों में दौड़ने लगता है तो कभी लाहौर की गलियों में। कभी मन झूम-झूम कर वैशाखी गाने लगता है तो कभी इतना उदास हो जाता है जैसे कोई अजीज बिछड़ने वाला हो। कभी-कभी मन एकदम डर जाता है। क्या मौत के पहले की रातों में ऐसा ही होता है?
(फिर अचानक खाट पर बैठते हुए)
 मैं नहीं जानता कि अंग्रेज कब मुझे मौत की सजा दे देंगे? मौत तो कभी भी आ सकती है। तो फिर गालिब ने ऐसा क्यों कहा है कि मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती। और फिर मौत मेरे लिए कोई अनोखी या भयावह चीज तो नहीं। (फिर खाट से खड़े होते हुए) यह ठीक है कि मेरे लिए मौत का फैसला अंग्रेजों ने किया है लेकिन अपने लिए यह रास्ता तो मैंने ही चुना था। और इस रास्ते पर चलने की शुरूआत तो उसी दिन हो गई थी जा मैंने बंदूकों की खेती करने का फैसला किया था।
(खाट से उठकर स्टूल की ओर जाता है और उस पर पड़े कागज को उठाता है)
अरे, ये चिठ्ठी यहां किसने रख दी है। ये तो मां की चिठ्ठी है। ये चिठ्ठी उसने कब लिखी होगी? शायद अंग्रेजों ने रोक कर रखी होगी। वे डर रहे होंगे कि कहीं मां ने अपनी चिठ्ठी में बम तो नहीं रख दिया। मां मेरी प्यारी मां। तब कितनी उम्र रही होगी मेरी? मुझे ठीक-ठीक तो याद नहीं लेकिन मां तू तो अब भी उस बात को याद करके कितना हंसती है। याद है न? याद है जालियांवाला बाग़? 13 अप्रैल 1917। जेनरल ओ डायर ने जा एक झटके में पंजाब के सैकड़ों सपूतों को मौत की नींद सुला दी थी। क्या कसूर था उनका? यही न कि वे अपने मसाएल को लेकर इस नतीजे पर पहुंचे थे कि आ आजादी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं।
मसला चाहे रोटी का हो या इज्जत का? यह गुलामी से शुरू होता है और आजादी पर खत्म होता है। लेकिन अंग्रेजों को यह मंजूर नहीं था। लिहाजा जालियांवाला बाग़ में अंग्रेजों की गोलियां चली लेकिन गोलियों की आवाज आजादी की चाहत को मिटा नहीं सकी। सैकड़ो लोग मारे गये। बाग का कुआ लाशों से पट गया। लेकिन आजादी के नारे बंद नहीं हुए। उफ क्या दौर था। हर तरफ शोक का माहौल था लेकिन लोगों ने शोक को अपनी ताकत में बदल दिया था। मैं आठ साल का था और मैं भी गया था उस जमीन की मिट्टी को माथे से लगाने।  तभी मैंने सोचा था कि बनाउंगा अपनी फौज और अंग्रेजों से मुक्त कराउंगा अपनी प्राणों से प्यारी भारतभूमि को। फौज के लिए बंदूक तो चाहिए थी और तभी मैंने बेबे से कहा था कि मैं बंदूकों की खेती करूंगा और बेबे हंस पड़ी थी। वही बंदूक तो मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ उठाई थी। तब से एक आग मन में लिए घूम रहा हूं। कब बनेगी भारत की अपनी फौज और कब होगी अंग्रेजों से फैसलाकून लड़ाई। 


(कागज फिर से खाट पर रखता है और एक बार सोने का उपक्रम लेकिन फिर तुरत उठकर बैठ जाता है)
तो अब फिर नींद क्यों नहीं आ रही? नींद तो उस रात भी नहीं आई थी जा हमने सांडर्स का वध करने का फैसला किया था। सांडर्स के वध के बाद भी कई दिनों तक नींद नहीं आई थी। ऐसा लगा था कि अपनी फौज बनाकर भारत की मुक्ति का रास्ता सच होने के कगार पर है। लेकिन हम मुठ्ठी भर लोग थे और सामने था ब्रिटिश साम्राज्य जिसके राज में सूरज कभी अस्त नहीं होता था। हमारे इरादे मजबूत थे लेकिन हमारे पास साधन नहीं थे। हम चाहते थे कि हम लोगों को अपनी बातें बताएं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग हमारे साथ आये और पूरे देश में आजादी के लिए लड़ने वालों का ज्वार आ जाए। लेकिन इसके लिए जरूरी था कि हम लोगों के बीच  जाएं और अपनी बात बताएं। और तब हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना ने तय किया था कि हम असेम्बली में बम फेकेंगे क्योंकि बहरों को सुनाने के लिए बम के धमाके की जरूरत होती है। लेकिन तब हमने तय किया था कि बम ऐसा हो जिससे किसी को नुकसान नहीं पहुंचे और बम फेंकने वाला भागे नहीं बल्कि वहीं अपनी गिरफ्तारी दे दे। गिरफ्तारी इसलिए ताकि इस देश के आम लोगों तक हम अपनी बात पहुंचा सकें। कितना भाग्यशाली था कि सेना ने इस काम के लिए मेरा चुनाव किया था और मेरा साथ देने के लिए थे बटुकेश्वर दत्त। हमलोगों ने बम फेंका और गिरफ्तारी दी। फिर हुआ मुकदमे का लंबा नाटक। और अब अदालत ने मेरे साथ-साथ सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई है।
(मंच के चारो ओर टहलते हुए)
हां, स्वीकार करता हूं मैं कि मैंने छेड़ा है ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध। किया है मैंने एलान कि स्वतंत्रता पूरी मानव जाति का जन्मसिद्ध अधिकार है और यह हम भारतवासियों को मिलना ही चाहिए। मुझे अपनी फांसी पर कोई एतराज नहीं. बल्कि उन्हें तो मुझे गोली से उड़ा देना चाहिए था। लेकिन उनमें इतनी हिम्मत भी नहीं है। उन्हें तो ऐसा लगता है कि मुझे जेल में बंद करके वे मेरे विचारों के  पांवो में भी जंजीरें डाल रहे हैं। लेकिन उन्हें नहीं पता कि विचारों को कभी जंजीरें नहीं पहनाई जा सकती हैं। जार मिट गये, बारबन मिट गये लेकिन क्रांतिकारी आज भी अपना सीना तानकर चलते हैं। अगर मिलता मुझे इस देश के तीस करोड़ लोगों का साथ तो जेल तोड़कर आ जाता बाहर, बनाता अपनी फौज और मुक्त करता अपनी प्यारी भारत भूमि को। फिर हम सब लोग मिलकर बनाते एक ऐसा देश जहां न तो कोई बड़ा होता और न कोई छोटा। एक ऐसा देश जहां एक भंगी का बेटा भी उसी तरह सीना तानकर चले जैसे राष्ट्रपति का बेटा चलता है। एक ऐसा देश जहां सच में जनता की हुकूमत होती।
(फिर धीरे-धीरे जैसे मंच से ओझल होता है)
अलविदा मेरे प्यारे भारत देश। अलविदा मेरे देश के तीस करोड़ लोगों विदा। लेकिन याद रखना- जाना होगा उन्हें। भगत सिंह और इस देश के हजारों नौजवानों की लड़ाई बेकार नहीं जाएगी। और जब इस देश की हुकूमत तुम्हारे हाथों में होगी तो तुम्हें तय करना होगा कि तुम कैसा देशा बनाना चाहते हो। भूलना मत दोस्तों लड़ाई और शहादत की जरूरत हर दौर में पड़ती है। अलविदा.....खुश रहो अहले चमन हम तो सफर करते हैं। 


गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

भारतीय मीडिया के गर्व और कलंक

-प्रो. अमर्त्य सेन
भारत का आजाद  मीडिया यहाँ के जनतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है. यहाँ का आजाद और गुंजायमान प्रेस इस देश की महान उपलब्धियों में से एक है. यह एक ऐसा कार्य है जो जनतंत्र से सीधे जुड़ा हुआ  है. सत्ता केवल विपक्ष को कुचलकर ही नहीं बल्कि सूचनाओं को व्यवस्थित तरीके से दबा कर भी फलती फूलती है. भारतीय जनतंत्र के अस्तित्व और इसके फलने-फूलने ने हमारे प्रेस की आजादी और इसकी ताकत के साथ एक मजबूत सम्बन्ध बनाया है. ऐसे कई अवसर आये हैं जब अमेरिका और यूरोप में बैठे होने के बावजूद मैंने भारतीय मीडिया के बहुपक्षीय संतुलन और इसकी ताकत पर भरोसा किया है. एक पुराना उदाहरण अमेरिका में ब्रिटिश नेशनल हेल्थ सर्विस और यूरोप के अधिकांश हिस्सों में काम कर रही सार्वजानिक स्वास्थ्य सुविधाओं के चरित्र हनन से जुडा है. अमेरिका में दी न्यूयार्क टाइम्स जैसा शानदार अख़बार होने के बावजूद सूचना उद्योग सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के शानदार काम की जड़ खोदने में लगा हुआ है.  राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा और इसी की तरह की दूसरी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को हेल्थ लाक अप की तरह दिखाया जाता है. इसे सामाजिक दवा बताकर चारों तरफ एक भय फैलाया जाता है. मैंने एक अफवाह सुनी है कि अमेरिका में बच्चों को इस बात से डराकर फूलगोभी खिलाई जाती है कि यदि उन्होंने यह नहीं खाया तो इसके भयानक विकल्प के रूप में उन्हें सामाजिक दवा खानी पड़ेगी.
पेशा और शुद्धता 
भारतीय समाचार  मीडिया की सीमाओं के बावजूद
इनमें से कुछ की चर्चा मैं अभी करूँगा. हमारे पास भारत की मुक्त मीडिया की तारीफ करने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं. इसमें विशाल और उन्मुक्त प्रेस शामिल है जो जनतांत्रिक भारत के लिए बड़ा और महत्वपूर्ण साधन है. हालाँकि भारतीय मीडिया का यह अनुष्ठान कुछ दूर तक तो चल सकता है लेकिन बहुत आगे नहीं. यहाँ कम से कम दो बड़ी बाधाएं हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए. एक तो मीडिया के आतंरिक अनुशासन से जुडी है और दूसरी मीडिया और समाज के बीच के रिश्ते को दिखाती है. पहली समस्या शुद्धता प्राप्त करने के क्रम में लापरवाही से जुडी है. हालाँकि इसमें गलत सूचना देने की सुविचारित मंशा नहीं होती है फिर भी यह नुकसानदेह है.





दूसरी समस्या पूर्वाग्रह प्रेरित है और अक्सर यह पूर्वाग्रह छुपा हुआ होता है. यह पूर्वाग्रह इस बात में भी दिखाई पड़ता है कि किस खबर को कवर करना है और किसे छोड़ देना है. यह पूर्वाग्रह भारत के वर्ग विभाजन से भी जुड़ा है. भारतीय रिपोर्टिंग अच्छी हो सकती है और अक्सर यह अच्छी होती भी है. मैं हमेशा रिपोर्टरों की कुशलता पर चकित हो जाया करता हूँ. उनकी कुशलता उन सूक्ष्म तथ्यों को भी बाहर निकल लेने में दिखाई पडती है जिन्हें ठीक-ठीक संक्षिप्त करना भी कठिन होता है. फिर भी भारतीय मीडिया की एक बड़ी विशेषता विषमता बताई जाती है और कई बार गंभीर गलतियाँ भी  मीडिया के माध्यम से या मीडिया की पहल से हो जाया करती है. मैं व्यक्तिगत रूप से भाग्यशाली रहा हूँ कि मीडिया से जुडी ऐसी कई समस्याओं को मैंने अपने अनुभव से देखा है. एक भारतीय पाठक के रूप में जब भी मैं अख़बार खोलता हूँ तो इस बात से मैं निश्चिन्त हो जाना चाहता हूँ कि जो भी मैं पढ़ रहा हूँ वह पूरी तरह से सही है. लेकिन इस तरह की आश्वस्ति कठिन है.
मुझे दो उदाहरण देने दीजिये- मुझे फिर से इस पर जोर डालना चाहिए-ये प्रेस में रिपोर्टिंग के मेरे अच्छे अनुभव को दिखाते हैं. चार दिन पहले एक सार्वजनिक परिचर्चा में लोकपाल पहल से जुड़े एक सवाल के जवाब में मैंने कहा कि भ्रष्टाचार जैसी महत्वपूर्ण समस्या का समाधान भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था (इसमें अदालतें और संसद शामिल हैं) में होना चाहिए. मैंने यह भी कहा कि मैंने किसी मजबूत लोकपाल बिल का ब्लूप्रिंट नहीं देखा है- न तो सरकार की तरफ से और न ही विपक्ष के ही किसी खेमे की तरफ से.बाद में जब मैंने वेब खोला तो मैंने ऐसी हेडलाइंस पाई- लोकपाल बिल सुविचारित है- अमर्त्य सेन (दी टाइम्स  ऑफ़ इंडिया, इंडिया टुडे, जी न्यूज़, एन डी टी वी और दूसरे ). दूसरी हेडलाइन थी- लोकपाल बिल सुविचारित नहीं- अमर्त्य सेन (डी एन ए न्यूज़, मनी कंट्रोल, दि टेलीग्राफ और दूसरे). एक अख़बार ने पहले पहली स्टोरी चलायी और फिर बाद में उसने दूसरी वाली स्टोरी चला दी. हैरत की बात यह है कि उसने संशोधन की कोई  सूचना नहीं दी. मैं चकित था कि यह अख़बार इकोनोमिक्स टाइम्स था जिससे मैं व्यक्तिगत रूप से जुडा हुआ था. कुछ साल पहले मुझे इस अख़बार को एक दिन के लिए सम्पादित करने का मौका मिला था (वह मेरे लिए एक महान दिन था. हालाँकि संपादक से मिली कई रिपोर्ट को मैंने ख़ारिज कर दी जबकि कई को मैंने दुबारा लिखने के लिए कहा था.)
उसी दिन कोलकाता की एक दूसरी मीटिंग में कैंसर फाउंडेशन  ऑफ़ इंडिया के लिए एक लेक्चर था. मैंने उसकी हेडलाइन देखी- सिगरेट पीना एक व्यक्तिगत विकल्प है (दी स्टेटसमैन ). स्मोकर्स की आजादी को सीमित करें- अमर्त्य सेन (दी हिंदुस्तान टाइम्स). ये सारी ख़बरें एक ही दिन थी. दुर्भाग्य से किसी चीज की एक गलत खबर के बड़े परिणाम हो सकते हैं. 15 दिसम्बर को टाइम्स  ऑफ़ इंडिया ने लिखा- अमर्त्य सेन: आम आदमी भ्रष्टाचार से नहीं निपट सकता. मैंने इस तरह का कुछ नहीं कहा था. व्याख्यान की ऑडियो रिपोर्ट इसकी पुष्टि कर सकती है. लेकिन एक न्यूज़ एजेंसी से गलत खबर आने के बाद उसका कई अख़बारों द्वारा उपयोग किया गया. लेकिन जब यह गलत खबर लोगों के बीच आ गयी है तो यह कैसे संभव है कि मुझ पर फटकारों की बारिश न हो और मुझे नैतिक सलाह न दिए जाएँ. इसकी निंदा में तुरत दर्जनों पृष्ठ रंग दिए गए. अधिकतर नैतिक सलाहों से यही बात प्रतिध्वनित हो रही थी जैसे यह वक्तव्य मेरा ही हो. एक बयान जिसे मैंने बहुत पसंद किया वह यह था- मैं सोचता हूँ कि मि. सेन को अपना मुंह बंद रखना चाहिए. वास्तव में जो मैंने कहा वह यह था कि भ्रष्टाचार पर फैसले और दंड सड़क पर होने वाले न्याय के विषय नहीं हैं. इन्हें उन जनतांत्रिक तरीकों से होना चाहिए जो इस देश में मौजूद हैं. इसमें संसद और अदालतें शामिल हैं. मुझे भरोसा है कि भारतीय जनता को त्वरित न्याय के मुकाबले जनतांत्रिक तरीकों पर विश्वास है. इस मामले में जो शिकायतें आ रही हैं वे यह है कि जनतांत्रिक प्रक्रियाएं  भ्रष्टाचार के खिलाफ पर्याप्त प्रभावशाली और कठोर तरीके से काम नहीं करती हैं. यह सचमुच एक महत्वपूर्ण मांग है और यह समझ भ्रष्टाचार से उठने वाली राजनीतिक चुनौती से निपटने की आम आदमी की योग्यता से बहुत दूर है. भारत में होने वाले कई अन्यायों के खिलाफ मैंने सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों में भाग लिया है. इनमें से एक हाल की गतिविधि राइट टू फ़ूड के लिए होने वाले आन्दोलन से जुडी थी.
तो रिपोर्टिंग में आ रही शुद्धता की कमियों से निपटने के लिए मीडिया को क्या करना चाहिए. मैं उत्तर नहीं जानता- यहाँ मेरा मुख्य ध्येय सवाल उठाना है. लेकिन सीधा और सरल विचार यह है कि सभी अख़बारों को इस बात पर सहमत होना चाहिए कि वे नियमित फीचर के रूप में अपनी स्टोरीज के संशोधन प्रकाशित करेंगे (और उन्हें ऑनलाइन उजागर करेंगे तथा उसके साथ संशोधित विवरण भी देंगे.). दी न्यूयार्क टाइम्स और दी गार्जियन द्वारा यह काम काफी प्रभावशाली तरीके से किया जाता है और कुछ भारतीय अख़बारों में भी यह मौजूद है (हिन्दू में यह कई वर्षों से है ). लेकिन यह काम सभी अख़बारों द्वारा ज्यादा सार्वजनिक रूप से किया जाना चाहिए और यह ज्यादा से ज्यादा लोगों की जानकारी में होना चाहिए.
पत्रकारों की ट्रेनिंग का भी एक मसला है. भीड़-भाड़ और जल्दबाजी में नोट्स लेना कभी आसान काम नहीं रहा है और आज के दौर में भी यह अधिकतर रिपोर्टरों के लिए कठिन बना हुआ है. पूर्व की तरह आज के रिपोर्टर शार्ट हैण्ड नहीं जानते हैं. लेकिन आज की हमारी आधुनिक दुनिया में रेकार्डिंग के शानदार उपकरण मौजूद हैं और इनका उपयोग सभी जगह किया जा सकता है बजाय इसके कि रिपोर्टर अपनी स्मरण शक्ति पर भरोसा करें जैसा कि अभी भी बहुत सारे लोग करते हैं. असावधानी से होने वाली गलतियों को कम करने के दूसरे भी तरीके हैं और उन पर चर्चा हो तो उसके अच्छे नतीजे सामने आएंगे. लेकिन अब मैं दूसरी समस्या पर आना चाहूँगा जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ.
वर्ग आग्रह
यदि बड़े पैमाने पर शुद्धता मीडिया के लिए आन्तरिक चुनौती है तो वर्ग आग्रह एक बाहरी चुनौती है जो भारतीय समाज के विभाजन से सम्बन्ध रखती है. वस्तुतः वर्ग विभाजन हर जगह मौजूद है. अमेरिका में वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा करो  आन्दोलन ने लोगों का ध्यान उस विरोध की ओर खींचा जो अत्यंत समृद्ध (शिखर पर रहने वाले एक प्रतिशत) और बाकी के 99 प्रतिशत लोगों के बीच मौजूद है. मैं यहाँ अमेरिका में लागू 1 प्रतिशत और 99 प्रतिशत के बीच के अंतर्विरोध पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करूँगा लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि भारत में भी उसी तरह के विभाजन पर भरोसा करना एक लम्बे अंतर के निशान को भूलने की तरह होगा. यह सच है कि भारत में कई तरह के  विभाजन हैं- इनमें कुछ तो अख़बारों के मालिकाने पर भी लागू होते हैं- लेकिन वह विभाजन जो भारतीय न्यूज़ कवरेज के जातिगत पूर्वाग्रह से परिचित कराता है,  अख़बार पढने वालों के हितों से जुड़ा  है. यह विभाजन भारत की आबादी के उस भाग्यशाली हिस्से जो भारत में हो रही आर्थिक प्रगति का फल भोग रहा है और शेष जो लोग पीछे छूट गए हैं उनके बीच का है.
वास्तव में भारत का धनी तबका अल्पसंख्यक है लेकिन फिर भी वह गिनती के मामले में बड़ा है. उसके हिसाब से भारत का आर्थिक विकास अच्छी तरह से हो रहा है. ऐसा वे लोग भी मानते हैं जिन्हें पहले से विशेषाधिकार प्राप्त हैं. भारतीय मीडिया ऐसे ही लोगों के जीवन पर जरूरत से ज्यादा ध्यान केन्द्रित करके उन्हें उभारने की कोशिश कर रहा है. इस तरह से वह भारत में जो कुछ भी हो रहा है उसकी झूठी तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है. नए मीडिया में भाग्यशाली लोगों की जीवन शैली के कवरेज की अत्यधिक प्रवृति दिखाई पड़ती है. जो अभागे लोग हैं उनकी समस्याओं पर कम से कम ध्यान दिया जाता है. कई दुर्भाग्यपूर्ण तथ्यों की ओर इशारा किया जा सकता है. वैसे यह सूची काफी लम्बी हो सकती है-
1 . भारत में कुपोषित बच्चों का प्रतिशत पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है.
2 . भारत चीन के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत कम पैसा खर्च करता है और यहाँ जीवित रहने की संभावना (लाइफ एक्स्पेक्स्टेसन) बहुत कम है.
3 . भारत, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान के आंकड़े देखे जाएँ तो लड़कियों की स्कूलिंग, शिशु मृत्यु दर, टीकाकरण और जीवित रहने की संभावना के मामले में स्टैण्डर्ड सोशल इंडकेटर पर भारत का एवरेज रैंक बदलता रहता है. पिछले बीस वर्षों में भारत का स्थान सेकेण्ड बेस्ट से सेकेण्ड वर्स्ट पर आ गया है. हालाँकि प्रति व्यक्ति उत्पाद के मामले में भारत आगे है.
यह समस्या मीडिया में नहीं दिखाई पड़ती है क्योंकि यह सामाजिक विभाजन ही है जो कवरेज में पूर्वाग्रह को खाद-पानी देता है. मीडिया भारत की वास्तविकता को लोगों तक पहुँचाने में ज्यादा रचनात्मक भूमिका निभा सकता है. कवरेज में पूर्वाग्रह पाठक के लिए भी कहीं से सुखदाई नहीं है. यह भारत के वंचितों को अभावों से छुटकारा दिलाने में हो रही राजनीतिक उदासीनता को ही बल प्रदान करता है. भाग्यशाली समूह में न केवल व्यावसायिक नेतृत्वकर्ता और पेशेवर वर्ग शामिल है बल्कि देश के बुद्धिजीवियों का समूह भी इसी में आता है. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह समूह राष्ट्रीय विकास को खूब प्रचारित करता है और इस तरह से वह एक थोपी हुई वास्तविकता को ही दिखाता है जबकि यह सच का आंशिक हिस्सा ही होता है.
जांच और उपेक्षा
विशेषाधिकार प्राप्त और तेजी से समृद्ध हो रहे भारतीयों का तबका इस बात को मान कर चलता है कि देश में आर्थिक विकास की दर ऊंची है और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए अलग से किसी सामाजिक प्रयास की जरूरत नहीं है. उदाहरण के लिए जब सरकार गरीबों के लिए अनुदानित राशन देना शुरू करती है, जैसा उसने हाल में किया, तो बहुत बड़ी संख्या में आलोचक इसमें शामिल राजकोषीय समस्याओं की तरफ इशारा करने लगते हैं. यहाँ तक कि कुछ लोग तो खाद्य सुरक्षा बिल में कथित तौर पर उजागर होने वाली गैर जिम्मेवारी की भी चर्चा करने लगते हैं.
वास्तव में खाद्य सुरक्षा बिल में कई खामियां हैं और इसमें काफी सुधार की गुंजाईश है. उम्मीद है कि इसमें सुधार भी होगा. साथ ही राजकोषीय जिम्मेवारी निश्चित रूप से एक गंभीर मसला है और दूसरी सामाजिक योजनाओं की तरह खाद्य अनुदान के लिए राशि देना कठोर परीक्षण की मांग करता है. लेकिन यह भी पूछा जाना चाहिए कि राजस्व से जुडी दूसरी समस्याओं पर मीडिया में चर्चा क्यों नहीं होती. उदाहरण के तौर पर हीरे और सोने को कस्टम ड्यूटी से मुक्त करना. वित्त मंत्रालय के अनुसार इस कदम से राजस्व का बहुत बड़ा घाटा लगा है (50 हजार करोड़ रूपये सालाना ) और यह खाद्य सुरक्षा बिल में लगने वाली अतिरिक्त राशि 27 हजार करोड़ रूपये से बहुत कम है. मंत्रालय के सालाना प्रकाशित होने वाले दस्तावेज में विभिन्न मदों में छोड़ दी जाने वाली राशि 511 करोड़ रूपया प्रतिवर्ष दिखाई जाती है. वास्तव में इस राशि को बचाया जाना चाहिए. हालाँकि इस तरह छूट जाने वाली राशि को पकड़ना बहुत मुश्किल है और इसीलिए मैं इसे गुलाबी मूल्यांकन नहीं मान रहा हूँ. लेकिन अभी भी यह समझना कठिन है कि खाद्य सुरक्षा बिल की लागत को राजकोषीय अँधेरे से अलग क्यों नहीं निकाला जाये और राजकोष की मजबूती के दुसरे रास्तों की परीक्षा क्यों नहीं की जाये. एक सक्रिय मीडिया हमारा ध्यान इस बात की ओर भी दिलाता है कि किस बात की समीक्षा हो रही है और कौन सी बात चर्चा से छूट रही है. भारत के विशेषाधिकार प्राप्त और अधिकारविहीन के बीच के विभाजन का असर इंधन के उपयोग में सब्सिडी के वकीलों की राजनीतिक ताकत के रूप में देखा जा सकता है. यह सब्सिडी जो लोग अपेक्षाकृत धनी हैं (जैसे कार वाले ) और कृषि को मिलती है. ज्यादा आर्थिक बुद्धिपरकता ज्यादा पर्यावरण सम्बन्धी जागरूकता और कुशलता के साथ समानता की मांग के लिए राजकोषीय व्यवस्थाओं की पुनर्संरचना संभव है. वर्तमान अपव्यय को बनाये रखने और इसे सहने के लिए राजनीतिक समर्थन मिल जाता है लेकिन जब भी गरीबों, भूखों और बेकारों की मदद की बात होती है तो राजकोषीय खतरे की घंटी बज जाती है.
यदि पहली समस्या जिसकी चर्चा मैंने शुद्धता के रूप में की है मीडिया बेहतर गुणवत्ता और नियंत्रण के माध्यम से ठीक कर सकता है. लेकिन दूसरी समस्या जो वर्ग पूर्वाग्रह को दिखाती है उसकी चिंता इस बात से जुडी है कि देश की समस्याओं की संतुलित रिपोर्टिंग कैसे की जाये. भारतीय जनता के कार्य-कलाप में मीडिया एक बड़ी मदद कर सकता है और यह भारतीय समाज के केवल भाग्यशाली वर्ग की ही नहीं बल्कि सभी लोगों के विकास के बेहतर मार्ग की तलाश कर सकता है. भारतीय जनतंत्र में न्यूज़ मीडिया के कार्यों की आत्मा होनी चाहिए- पूर्वाग्रहों के त्याग के साथ शुद्धता का समन्वय. वास्तव में दोनों समस्याएँ एक दुसरे की पूरक हैं.
प्रो. अमर्त्य सेन का यह लेख हिन्दू में प्रकाशित हुआ था. इसका हिंदी अनुवाद पत्रकार कमलेश ने किया है.

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

ऐसे भी रहते हैं लोग


आलोक कुमार
अस्पताल की बेड की जगह बालू के ढेर पर बनी अस्थाई झोपड़ी.  झोपड़ी भी अनोखी. फूस और सरकंडे की जगह प्लास्टिक की बोरियों की छत और मच्छरदानी की दीवार. नतीजा हवा-पानी तो दूर ओस की बूँदें भी नहीं रूक पाती. इसके बावजूद एक नहीं दर्जन भर से अधिक कैंसर पीड़ित मरीज और उनके परिजन इस स्थिति में रहने को मजबूर हैं. लिहाजा कई मरीजों के साथ आये परिजनों के भी मरीज बनने की आशंका बनी रहती है.
यह बानगी गांव-गिरांव के किसी पी एच सी की नहीं बल्कि राजधानी के साथ-साथ देश स्तर पर चर्चित हो चुके महावीर कैंसर हॉस्पिटल सह शोध संस्थान की है. जब अस्पताल में गरीब मरीजों की सुविधा की पड़ताल करने की कोशिश की गयी तो यह तल्ख़ हकीकत सामने आयी. अस्पताल के भीतरी परिसर में केन्टीन के बाहर खाली पड़े स्थान पर  निर्माण के लिए बालू और छड़ गिराया हुआ है. बालू के ढेर पर छड़ के सहारे प्लास्टिक के बोरों से एक दर्जन से अधिक लोग झोपड़े बना कर रह रहे हैं. वहीँ खाना बना रहे हैं और वहीँ खा भी रहे हैं. गोपालगंज के रेवती थकाम गांव से आये हैं सत्यदेव साह. इन्हें छः महीने पहले ही बीमारी का पता चला है. अभी सेकाई कराने आये हैं. साथ में परिजन हैं. कहने लगे २०-२५ दिन हो गए बाबू इसी तरह से रहते हुए. सेकाई की फीस देने में ही सारे पैसे खर्च हो गए. अन्दर में बगैर पैसे के कोई रहने नहीं देता.
गोपालगंज के ही बैकुंठपुर के श्यामपुर गांव से आयी हैं रिम्पू देवी अपनी माँ का इलाज कराने. लेकिन ओस में रहने से इनकी खुद की तबीयत ख़राब हो गयी है. सर्दी-बुखार हो गया है. इसके बावजूद मां को अकेले नहीं छोड़ सकती. सो खुले में ही रहने को मजबूर हैं. भागलपुर के महेंद्र महतो की मानें तो वे एक महीने का इलाज कराने के लिए छः हजार रूपये जमा कर चुके हैं. लेकिन रहने के लिए अस्पताल में कमरा नहीं मिलता. गार्ड कहता है कि यह अस्पताल है डेरा नहीं. जाओ कहीं बाहर में डेरा खोज कर रहो. बाबू हम गरीब लोग हैं. भैंस बेच कर इलाज कराने आये हैं. ऐसे में रहने पार सारा पैसा खर्च कर देंगे तो इलाज कैसे करायेंगे. सरकार को चाहिए कि   कैंसर के मरीजों को रेल में फ्री पास बना दिया जाये ताकि इलाज कराने पटना आने में कोई परेशानी न हो. पुर्णिया के अब्दुल हन्नान अपने बेटे मो. जहरूल का इलाज कराने आये हैं. उन्होंने बताया कि वे एक एक महीने से इसी तरह रह रहे हैं. सबसे ज्यादा परेशानी खाना बनाने और खाने के वक्त होती है. खाने के दौरान बालू मुंह में चला जाता है. लेकिन क्या करें, हमलोगों के लिए और कोई चारा नहीं है. भागलपुर के रोहित ने बताया कि बीस दिनों से वह इसी तरह रह रहा है अपने पापा शम्भू यादव के साथ. उनकी सेकाई चल रही है.
उधर  महावीर कैंसर हॉस्पिटल सह शोध संस्थान के धर्मशाला की कहानी हरी अनंत हरी कथा अनंता वाली है. एक बानगी देखिये. कैम्पस के अन्दर दाखिल होते ही चार-पांच लोग केयर टेकर का इंतजार करते मिले. जब केयर टेकर का दरवाजा खटखटाया गया तो रामचंद्र नामक एक आदमी बाहर आया. आते ही झल्लाते हुए कहा- का है जी. जवाब दिया गया कि कमरा चाहिए. जवाब मिला- दो दिन के बाद भेंट कीजियेगा. ५५ रुपया किराया लगेगा.



आलोक कुमार बिहार के युवा पत्रकार हैं. आम लोगों की पीड़ा से जुड़ना और उनके बारे में लिखना इनकी विशेषता है, आलोक से उनके फोन नम्बर 9431488489 पर संपर्क किया जा सकता है. 

सोमवार, 2 जनवरी 2012

उतरने लगा भोजपुरी फिल्मों का जादू


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कमलेश

चलिए ये साल ख़त्म हुआ. पुराना राजा मर गया, नया   राजा जिंदाबाद की तर्ज पर हमने जमकर बधाइयाँ दी और ली. इस साल के आखिरी हफ्ते में अपने जिले भोजपुर के इलाकों में घूम रहा था. मेरे लिए हैरत की बात थी कि इस बार उधर के अधिकतर सिनेमा हॉल में हिंदी फ़िल्में लगी थी. भोजपुरी फ़िल्में नाम मात्र की. फिल्मों में मेरी रूचि थोड़ी कम रही है लेकिन अपनी भाषा होने के कारण भोजपुरी फिल्मों को लेकर थोड़ी दिलचस्पी रहती है. मैंने भोजपुरी फिल्मों के निर्माण से जुड़े अपने एक दोस्त से कहा था कि भोजपुरी फ़िल्में बन तो खूब रही हैं लेकिन इधर दिखाई नहीं पड़ रही है. इसपर उसने एक सिनेमा हॉल के मालिक से मेरी बात कराई तो मैं चौंक पड़ा. उसका कहना था कि अब हॉल में भोजपुरी फ़िल्में लगाना घाटे का सौदा साबित हो रहा है. उसके अनुसार लागत और कमाई के हिसाब से पिटी हुई  हिंदी फिल्म भी भोजपुरी के मुकाबले ठीक-ठाक रहती है.  तो फिर भोजपुरी फिल्मों में पैसा क्यों लगाया जाये.
इस बात से मेरी समझ में नही आ रहा था कि खुश होऊं या दुखी. अभी हाल में रामधारी सिंह दिवाकर की  कहानी मखान पोखर पर एक भोजपुरी फिल्म बनी है. इस फिल्म का नाम तो आम भोजपुरी फिल्मों की ही तरह था- जिन्दगी ह गाड़ी, सैया ड्राईवर बीबी खलासी.  इसकी पटकथा लिखने वाले  अपने कवि मित्र निलय उपाध्याय  के उत्साह को देखकर मैं भी थोड़ा उत्साहित था. मुझे उम्मीद थी कि यह फिल्म चलेगी और ठीक-ठाक चलेगी. लेकिन बाद के दिनों में इसका हश्र देखकर मैं चिंतित हुआ. यह दूसरी भोजपुरी फिल्म थी जो किसी चर्चित साहित्यकार की कहानी पर बनी
थी.      इससे पहले मधुकर सिंह कि कहानी सोनभद्र की राधा पर दूल्हा गंगा पार के नाम से फिल्म बनी थी. वो फिल्म चली तो खूब थी लेकिन मधुकरजी की शिकायत थी कि इस फिल्म में उनकी कहानी कि मूल आत्मा ही नष्ट हो गयी है. खैर सैया ड्राईवर बीबी खलासी के नहीं चल पाने कि खबर पर मुझे हाल में ही भोजपुरी फिल्म बनाने वाले एक मुम्बइया  निर्माता की बात याद आई- मैं भी कहाँ फंस गया.ज्यादा दिन नहीं हुए जब भोजपुरी फिल्मों का बुखार लोगों के सर चढ़ कर बोल रहा था. आम लोगों कि बात छोड़िये कई प्रगतिशील कहे जाने वाले बुद्धिजीवी भी भोजपुरी फिल्मों की धुन में राग अलाप रहे थे. जगह-जगह इस पर गोष्ठियां हो रही थी और लोग अनन्य भक्ति भाव से रविकिशन और मनोज तिवारी के व्याख्यान सुन रहे थे. भोजपुरी फिल्मों के महानायक कहे जाने वाले कुणाल इस बात से दुखी थे कि भोजपुर क्षेत्र के लोग परिवार के साथ भोजपुरी फिल्मों को देखने नहीं आते हैं. हाल में कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा आयोजित  इन गोष्ठियों में कभी भोजपुरी फिल्मों के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता क़ी चर्चा नहीं होती थी लेकिन इसके व्यापक बाजार को लेकर खूब बहस हो रही थी. बिहार के एक फिल्म आलोचक तो इन फिल्मों के पक्ष में लहना पानी लेकर उतर आये थे. अश्लीलता के मामले में भोजपुरी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों का तर्क पिछले कई वर्षों से जारी है कि भोजपुरी भाषी इलाके के लोग यही देखना पसंद करते हैं और इसीलिए वे यही दिखाते हैं.
लेकिन अब ऐसा लगता है कि हालात अचानक बदल गए हैं. देखते-देखते जैसे इन फिल्मों का जादू उतरने लगा है. हालत यह हो गयी कि धूम धड़ाके के साथ बनी भोजपुरी फिल्म देसवा को खरीदार तक नहीं मिले. फिल्म की निर्माता और अभिनेत्री नीतू चन्द्रा  को इसे खुद रिलीज करना पड़ा. उन्होने ताम-झाम के साथ इसे मल्टीप्लेक्स में रिलीज किया. लेकिन जानकारों का कहना है कि वहां इस फिल्म का बाजा बजा हुआ है. करीब डेढ़ करोड़ की लागत से बनी फिल्म हमार देवदास में पैसा लगाने वाले लोग अपना माथा पकड़ के बैठे हैं. माना जा रहा है कि यह फिल्म अपनी लागत का आधा पैसा भी निकाल ले तो बहुत है. गुजरे साल में भोजपुरी फिल्मों के सबसे बड़े स्टार कहे जाने वाले मनोज तिवारी और रविकिशन क़ी अधिकतर फ़िल्में पानी मांगती नजर आयी. राहुल राय की धूम-धाम के साथ रिलीज हुई एलान भी कब थिएटरो में आकर चली गयी इसका पता ही नहीं चला. निरहुआ और पवन सिंह की कई फिल्मों के पोस्टर सिनेमा हाल की शोभा भर बन कर रह गए. भोजपुरी फिल्मों पर नजर रखने वालों का मानना है कि  सौ करोड़ का कारोबार करने वाली भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए ये साल बहुत ख़राब हुआ. इस वर्ष रिलीज हुई ९० फीसदी फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुंह गिरी. इस साल ६५ फ़िल्में रिलीज हुई हैं. इसमें बस पांच के बारे में माना जा रहा है कि ये ठीक-ठाक चल गयीं. इसमें तो पांच बड़े बजट की फिल्मों को भी लोगों ने नकार दिया. इस साल साजन  चले ससुराल, औलाद, दिलजले, इंसाफ और ट्रक ड्राईवर को ठीक-ठाक चलने वाली फिल्म माना जा रहा है.
तो इसका मतलब यह हुआ कि भोजपुरी भाषी लोगों ने यह बता दिया है कि वे अब तक तो वही कुछ देखते आ रहे थे जो उन्हें दिखाया जा रहा था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. उन्होंने बड़ी तेजी से भोजपुरी फिल्मों को नकारना शुरू कर दिया है. इसके साथ ही  भोजपुरी फिल्मों के बाजार का भ्रम टूट रहा है. जिस तेजी से इस इंडस्ट्री में पैसा आया उससे ऐसी उम्मीद नहीं थी. फिल्मों के बनने की रफ्तार में बला की तेजी आयी तो पिटने की रफ़्तार भी तेज हुई.लेकिन पहले ऐसा नहीं होता था. एक दौर ऐसा भी था जब साल भर या छः महीने पर एक भोजपुरी फिल्म आती थी और लोग उसका इंतजार करते थे. मेरी मां ने एक बार कहा था कि जब लागी नाहीं छूटे रामा बनी थी तो पूरे इलाके के लोगों ने इस फिल्म के आने का इन्तेजार किया था. इसे देखने के लिए वह भीड़ उमड़ी थी कि कई हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को जलन हुई होगी. मेरे गांव के लोग बैलगाड़ी और ट्रक्टर पर लदकर बक्सर गए थे इस फिल्म को देखने. सैकड़ों लोगों ने अलका सिनेमा हॉल के बाहर अगले दिन के शो के लिए रात-रात भर इंतजार किया था. मुझे खुद याद है जब भोजपुरी कि पहली रंगीन फिल्म दंगल लगी थी. आम तौर पर फिल्म देखने के नाम पर ही चिढ जाने वाले मेरे बाबा ने कहा था कि अपने भाषा की फिल्म है इसे जरूर देखना चाहिए. तब वे ही नहीं गांव के कई लोग अपने परिवार के साथ इस फिल्म को देखने गए थे. नजीर हुसेन साहब की फिल्म रूस गईले सैयां हमार और बलम परदेसिया देखने के लिए कालेज के लड़के कैसे पागल हुए थे ये तो बहुत लोगों को याद है.
तब भोजपुरी क्षेत्र के लोग ही इन फिल्मों के निर्माण में आते थे. बजट काफी कम होता था इसलिए ये फ़िल्में बिजनेस भी अच्छा करती थी. हालाँकि उस समय भी भोजपुरी फिल्म बनाने का मतलब घर फूंक कर तमाशा देखना ही माना जाता था. अशोक जैन जैसे लोगों ने कई ऐसी फ़िल्में बनाई जिनकी चर्चा अच्छी-खासी हुई थी.
माना जाता है कि हाल के दिनों में भोजपुरी फिल्मों में बूम ससुरा बड़ा पईसा वाला से आया. लेकिन यही दौर रहा जब भोजपुरी फ़िल्में आम अवाम और परिवार से कटने लगी. नाम और कथानक दोनों से ये फ़िल्में भोजपुरी संस्कृति को नकारने लगी. लोग ये मानने लगे कि भोजपुरी फ़िल्में परिवार के साथ देखने लायक नहीं होती हैं. यही वह दौर था जब बिहार के अपहरण उद्योग का पैसा भी भोजपुरी फिल्मों में आया और फिर तो इस इंडस्ट्री में भी जैसे पैसा लगाने का रास्ता खुल गया. इसके बाद तो भोजपुरी फ़िल्में हिंदी फिल्मों के फ्लॉप लोगों के लिए पनाहगाह हो गयी. भोजपुरी फिल्मों की लागत बढ़ने लगी. जहाँ कभी लाखों की बात होती थी वहां अब कोई करोड़ से नीचे की बात ही नही करता था. जब पैसा आने लगा तो उसके साथ तमाम तरह की बुराइयाँ भी आई. भोजपुरी फ़िल्में हिंदी फिल्मों की भोंडी रिमेक लगने लगी. आइटम डांस के नाम पर ऐसी अश्लीलता परोसी जाने लगी कि एक दौर की सी ग्रेड की हिंदी फ़िल्में भी पनाह मांगने लगी. हाल हाल तक ग्रामीण पृष्ठभूमि के शहरों में ये फ़िल्में खूब चल रही थी. लेकिन बढती अश्लीलता के कारण अब उन इलाकों के भी लोग परिवार के साथ ये फ़िल्में नहीं देखना चाहते. दुःख तो यह है कि इसका नतीजा जिन्दगी ह गाड़ी, सैया ड्राईवर बीबी खलासी जैसी फ़िल्में भी भुगत रही हैं. पुरानी कहावत है- जौ के साथै घुनो पिसाला.