रविवार, 17 नवंबर 2013

मीडिया की साख और थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग

कमलेश
पिछले तीन दिनों से अखबार और टीवी न्यूज चैनल लगातार केवल और केवल सचिन राग आलाप रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश में पिछले तीन दिनों से दूसरा कोई मसला ही नहीं है। आप सचिन तेंदुलकर को पढ़िये, उसे देखिये और उसी के बारे में बात कीजिए। और कुछ मत सोचिए। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का इससे बेहतर शायद ही कोई उदाहरण हो सकता है। हाल के कुछ वर्षों में भारतीय मास मीडिया ने यह दिखा दिया है कि अब उसके लिए विश्वसनीयता अथवा साख के कोई मायने नहीं है। वह उन्हीं मसलों को देश का अहम मसला बनाने का प्रयास कर रहा है जो इस देश के शासक वर्ग के हित के लिए सही हैं। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का जितना विकराल रूप आज दिखाई पड़ रहा है उतना मीडिया के किसी भी कालखंड में इस देश के लोगों ने नहीं देखा होगा। मीडिया के सिद्धांत कहते हैं कि जब मीडिया द्वारा थोपे जा रहे एजेंडे में और आम आदमी के वास्तविक एजेंडे में फर्क शुरू होता है तो मीडिया के साख का संकट भी शुरू होता है। यह फर्क जितना बड़ा होगा मीडिया की साख भी उतनी ही संकट में पड़ेगी। इतिहास के किसी भी दौर में फर्क इतना बड़ा नहीं हुआ था।
लोकतंत्र और मीडिया
हम अक्सर मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं। ठीक बात है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अब भारत का लोकतंत्र किनका लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र किनके लिए प्राणवायु का काम करता है। यह वही लोकतंत्र है जहां बाथे और बथानी टोला के दलितों के हत्यारों को कोई सजा नहीं मिलती। इस देश के महज बीस फीसदी लोगों का है लोकतंत्र। तो जब लोकतंत्र इस देश के महज बीस फीसदी लोगों का लोकतंत्र है तो इसका चौथा स्तम्भ मीडिया भी महज बीस फीसदी लोगों का ही मीडिया है। जिस तरह इस देश के 80 फीसदी लोग इस लोकतंत्र में हाशिये पर हैं उसी तरह इस देश के 80 फीसदी लोग मीडिया की चिंता से बाहर है। यही कारण है कि चाहे वह छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की लड़ाई हो या उड़ीसा के आदिवासियों का संघर्ष, इसे मुख्यधारा की मीडिया में कोई जगह नहीं मिल पाती है। लेकिन इसे स्थानीयता के वृत्त से बाहर निकाल कर जरा बड़े कैनवास पर देखने की जरूरत है। हम अक्सर इसके लिए इन मीडिया हाउसों में काम करने वाले पत्रकारों को जिम्मेवार ठहराते हैं। क्या किसी मीडिया हाउस में काम करने वाले पत्रकार उसका स्वरूप और उसका एजेंडा बदल सकते हैं? क्या पत्रकारों के बदलने से साख का संकट हल हो जाएगा?
मीडिया की आंतरिक संरचना
1988 में एडवर्ड एस हरमन और नॉम चॉम्सकी ने एक किताब लिखी थी- मैन्यूफैक्चरिंग कंसेंट। इस किताब में इन मीडिया विशेषज्ञों ने जिन बातों को सूत्र रूप में रखा वह आज भारत में अपने विराट रूप में दिखाई पड़ रहा है। इन विशेषज्ञों ने उसी समय कहा था कि दरअसल अभी के मीडिया में जो कुछ दिखाई पड़ रहा है वह किसी षड़यंत्र की वजह से नहीं है। मीडिया की अपनी आंतरिक बनावट ही ऐसी है जो उसे आम लोगों और मेहनतकश लोगों के खिलाफ खड़ा करती है। मीडिया की संरचना से ही उसका कंटेंट प्रभावित होता है। मीडिया की संरचना शासक वर्ग अथवा इलीट वर्ग के पक्ष में है इसलिए मीडिया का कंटेंट भी शासक वर्ग और इलीट वर्ग के पक्ष में होता है। मीडिया की सामाजिक भूमिका प्रभुत्वशाली समूहों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे को न केवल स्थापित करना है बल्कि उसका बचाव भी करना है।
युद्ध और मीडिया का सच
कोई भी साम्राज्यवदी देश जब किसी कमजोर मुल्क पर हमले शुरू करता है तो भारत का शासक वर्ग तुरत उस साम्राज्यवादी मुल्क के पक्ष में उसी तरह खड़ा होता है जैसे उस साम्राज्यवादी देश का शासक वर्ग खड़ा होता है। चूंकि शासक वर्ग इस युद्ध के पक्ष में खड़ा होता है इसलिए मीडिया उस युद्ध के पक्ष में आम राय बनाने में जुट जाता है। पिछली सदी में इराक पर हुआ अमेरिकी हमला इसे बड़े दिलचस्प तरीके से दिखाता है।
पिछले दिनों वरिष्ठ लेखिका अरुंधति राय ने अपने एक साक्षात्कार में इस मसले को लेकर एक दिलचस्प घटना बताई थी। उनके अनुसार इराक युद्ध के पहले न्यूयार्क टाइम्स के रिपोर्टर ने लगातार खोजी खबर लिखी कि इराक के पास आणविक और रासायनिक हथियार हैं। इसी को आधार बनाकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया। जबकि इराक बार-बार कह रहा था कि उसके पास कोई आणविक हथियार नहीं है। फिर भी इराक को तहस-नहस कर दिया गया। हालांकि उस समय भी लोगों को इस बात की जानकारी थी कि इराक पर हमले की वजह उसके पास परमाणु हथियार का होना नहीं है। इराक को पूरी तरह बरबाद कर दिया गया। इस घटना के छह साल बाद न्यूयार्क टाइम्स ने भीतर में एक छोटी सी जगह में यह कहते हुए अपने पाठकों से माफॅी मांग ली कि हमने जो इराक के पास आणविक हथियार होने की खबर छापी थी वह दुर्भाग्य से गलत थी क्योंकि बाद में छानबीन से साबित हो गया है कि इराक के पास कोई हथियार मौजूद नहीं था। लेकिन मजेदार तो यह रहा कि अमेरिका के प्रसिद्ध डॉक्यूमेंटरी फिल्म मेकर माइकल मूर ने इस माफीनामे का उपयोग अपने किताब में करने की अनुमति न्यूयार्क टाइम्स से मांगी। लेकिन न्यूयार्क टाइम्स ने कापीराइट एक्ट के उल्लंघन का हवाला देते हुए इसकी अनुमति नहीं दी।
युद्ध और वीडियो गेम
यहां यह याद रखना जरूरी है कि भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उस युद्ध को किस तरह दिखा रहा था। यह शायद दुनिया के इतिहास में पहली बार था कि मीडिया ने एक युद्ध को वीडियो गेम की तरह दिखाया। पूरी खबरें दिखाने का अंदाज ऐसा था कि आप इस युद्ध की विभिषिका से दुखी मत होइये, इसका मजा लीजिए। मीडिया की किताबें कहती हैं कि खबर के स्रोत जितने ज्यादा होते है मीडिया की साख उतनी ही ज्यादा होती है। आप याद कीजिए कि अमेरिका-इराक युद्ध की रिपोर्टिंग कर रहे भारतीय पत्रकारों के स्रोत क्या था- केवल अमेरिकी फौज और उनके द्वारा दी गई सूचनाएं। किसी भी चैनल ने हम भारतीयों को यह दिखाने की कोशिश नहीं की इस युद्ध को लेकर इराक के लोग किस तरह की नारकीय यंत्रणा झेल रहे हैं। आप जरा हाल में अफजल गुरु के प्रकरण को याद कीजिए। असहमति का स्वर मीडिया में दिखाई नहीं पड़ रहा था। अखबारों और न्यूज चैनलों में केवल उनकी बातें आ रही थीं जो भारत सरकार के कदम को देशभक्ति का सबसे बड़ा कदम मान रहे थे।
मीडिया कवरेज और पांच फिल्टर
नॉम चॉम्सकी कहते हैं कि मीडिया के कवरेज को पांच चीजें प्रभावित करती हैं-
स्वामित्व,
विज्ञापन,
असहमति,
स्रोत और
कम्युनिज्म विरोध।
कम्युनिजम विरोध को जरा और व्यापक फलक पर कहें तो दलित विरोध, पिछड़ा विरोध, आदिवासी विरोध और कुल मिलाकर मेहनतकश आवाम का विरोध।
मीडिया टाइजेशन
एक नया सिद्धांत चर्चा में है जिसे मीडिया टाइजेशन या मीडिया चालन कहते हैं। जब मीडिया की ताकत इतनी बढ़ जाए कि वह राजनीतिक सत्ता पर हावी हो जाए। मसलन नीरा राडिया प्रकरण से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। जब कारपोरेट सेक्टर को सरकार को लेकर खेल करना था तो उसने नीरा राडिया की पीआर कंपनी के माध्यम से मीडिया की मदद ली। मीडिया इस काम को करने में सक्षम था क्योंकि वह राजनीतिक सत्ता पर अपना प्रभाव डाल रहा था। इसका मतलब यह भी मीडिया बेलगम और उद्दंड हो गया है तथा उस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया हे।
साख मतलब हिस्सेदारी
और हम जब इस मीडिया में साख की बात करनते हैं तो इसका सीधा मतलब है कि हम इस मीडिया में आम आदमी के लिए हिस्सेदारी मांग रहे हें। वह मीडिया जिसमें इस देश के कारपोरेट सेक्टर के 60 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा लगे हैं वह इस देश के आदमी को हिस्सा देगा? मीडिया कारपोरेट घराने द्वारा संचालित है जिसका मुख्य काम मुनाफा कमाना है। फिर इसमें वह उनलोगों को जगह क्यों दे जो उसके मुनाफा कमाने के सिलसिले में किसी भी काम के नहीं हैं। तो  इस हिस्से को पाने के लिए के लिए इस देश के लोगों को उसी तरह लड़ना होगा जिस तरह आप अपने बाकी के हक-हकूक के लिए लड़ते हैं। याद रखिये राजा को नंगा वह मीडिया नहीं कहेगा जो उसी राजा की मदद से अपने 60 हजार करोड़ के कारोबार को चला और बढ़ा रहा है। इस मीडिया में हिस्सेदारी के लिए या फिर इस मीडिया का चेहरा बदलने के लिए लड़ाई लड़नी होगी। इस लड़ाई को देश के सुदूर गांव-देहातों में लड़ी जा रही उस लड़ाई से जोड़ना होगा जिसका उद्देश्य इस देश की सूरत को बदलना है। यह काम इस देश का आम आदमी ही कर सकता है और वही करेगा।  

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

कौन बचायेगा- हरिजन?

कमलेश
आप उन्हें संघी कह सकते हैं। उन्हें कोई एतराज भी नहीं था। कई बार वे खुद भी कहते थे। अपने कॉलम में भाजपा की चर्चा करते हुए वे जैसे अघाते थे उससे कई बार कोफ्त होती थी। लेकिन उनमें एक बात थी- वे वामपंथियों के लिखने-पढ़ने की क्षमता के जबर्दस्त कायल थे। कई बार अपने खास लोगों को से इस बात को शेयर भी किया करते थे। जब भी वे नौकरी देने की हालत में रहे उन्होंने वामपंथी विचारों के पत्रकारों को जमकर अवसर दिया। यह जानते हुए अवसर दिया कि सामने वाला उनके विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।
जी, मैं बात दीनानाथ मिश्र की कर रहा हूं। जबसे उनके निधन की खबर मिली है उनका चेहरा आंखों के सामने तैर रहा है। और साथ में याद आ रही है उनसे पहली मुलाकात। तब मैं इंटर या शायद थर्ड इयर का विद्यार्थी हुआ करता था। बक्सर के एक छोटे से कॉलेज का छात्र। वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा हुआ। कालेज की कक्षा से ज्यादा सड़कों पर आन्दोलनों में दिखाई पड़ने वाला। लेकिन लिखने-पढ़ने का शौक था। लिहाजा अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में लिखता रहता था। उस समय नवभारत टाइम्स का पटना से प्रकाशन शुरू हुआ था। दीनानाथ मिश्रजी उसके पहले संपादक थे। तब उस अखबार में स्वतंत्र पत्रकारों को लिखने का खूब स्पेस मिलता था। वहां काम करने वाले पत्रकारों की टीम भी जबर्दस्त थी। फिर कभी बिहार के किसी हिन्दी अखबार में इतने सशक्त पत्रकारों की टीम देखने को नहीं मिली। शायद यह भी दीनानाथजी का ही असर था।
इसी दौरान एक दिन वहां काम कर रहे नवेन्दु भैया (वरिष्ठ पत्रकार) का संदेश आया था- नवभारत टाइम्स को कुछ कैम्पस रिपोर्टर चाहिए। अप्लाई कर दो। मैंने बगैर कुछ सोचे केवल एक आवेदन भेज दिया था। अचानक एक दिन इंटरव्यू की चिठ्ठी भी आ गई। और मैं इंटरव्यू देने पटना नवभारत टाइम्स के दफ्तर पहुंचा था। अपने चैम्बर में दीनानाथजी बैठे थे। कभी चेहरे पर तो कभी बालों पर हाथ फेरते हुए। कुछ और लड़के आये थे। मैं यह जानकर चकित था कि उनमें से अधिकतर न केवल आन्दोलनकारी छात्र नेता थे बल्कि वामपंथियों की भी संख्या अच्छी-खासी थ्ी।
जब मैं कक्ष में पहुंचा तो दीनानाथजी ने बड़े स्नेह से पूछा था- आज ही आये हो? इसके बाद उन्होंने चाय मंगाई थी। फिर पूछा- कुछ लिखते-पढ़ते हो? मैंने अपने कुछ आलेख उन्हें देखने के लिए पकड़ा दिये थे। उनमें से अधिकतर उन लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख थे जिन्हें वामपंथी ही नहीं नक्सली मिजाज का माना जाता था। करीब 15 मिनट तक उन आलेखों को गौर से देखने के बाद उन्होंने कहा था- पत्रकारिता में क्यों आना चाहते हो? राजनीति में क्यों नहीं चले जाते? मैंने कहा क्योंकि मैं कहीं और नहीं जा सकता। दीनानाथजी ने धीरे से हंस कर कहा- जो तुम लिखते पढ़ते हे उसे लेकर डर नहीं लगता? कोई मारेगा तो? मेरे लिए यह सवाल थोड़ा अप्रत्याशित था। मैंने कहा- कोई मारेगा तो बचायेंगे वे लोग जिनके लिए मैं लिखता-पढ़ता हूं। दीनानाथजी थोड़ा मुस्कुराये थे। फिर पूछा था- कौन बचायेगा- हरिजन? मैं समझ गया कि दीनानाथजी का इशारा किस तरफ है? मैंने कहा था- जनता अपने-आप में सुरक्षा कवच होती है सर। इस पर खूब जोर से हंसे थे दीनानाथजी। फिर कहा था- अपना यह जज्बा बनाकर रखना। आने वाले दिनों में इस जज्बे को लेकर पत्रकारिता करने वाले कम लोग मिलेंगे। इसके बाद उन्होंने पास बैठे गुंजनजी से कहा था- इस लड़के की चिठ्ठी बनवा दीजिए।
इसके महीनों बाद अचानक नवभारत टाइम्स के दफ्तर में सामना हो गया था उनसे। उन्हें मुझे पहचानने में मुश्किल से पांच मिनट लगे होंगे। उन्होंने हंसकर कहा- क्या पटना आ गये? मैंने कहा- नहीं सर, बक्सर में ही हूं। उन्होंने प्यार से कहा था- कोई दिक्कत हो तो बताने में संकोच मत करना।
अभी जब उनके निधन की खबर सुनी तो लगा कि भ्राविष्य को कितनी गहरी दृष्टि से देख रहे थे दीनानाथजी।  उनके आलेखों को लेकर, उनके कॉलम को लेकर कई बार हम कहते थे- ऐसे भाजपा का प्रचार नहीं करना नहीं चाहिए उनको। आखिर एक पत्रकार की मर्यादा का तो उन्हें निर्वहन करना चाहिए। लेकिन अब लगता है कि आदमी चाहे किसी भी विचार के साथ हो, उसके पक्ष में उसे मजबूती से खड़ा होना ही चाहिए।    

शनिवार, 9 नवंबर 2013

जनता का लड़ाकू चेहरा थे चंदेश्वरी दा

 चंदेश्वरी प्रसाद सिंह, चंदेश्वरी दा, सीपी सिंह। एटक के अध्यक्ष, भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य और सीपीआई की सेना जनसेवा दल के सेनानायक। कई नाम थे उनके लेकिन चेहरा एक ही था। हमेशा जनता की लड़ाई में डटे रहने वाला। छठ का उल्लास अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ था कि उनके निधन की खबर आई। रहने वाले वे भले बेगूसराय के थे लेकिन उन्हें जानने वाले पूरे बिहार में हैं।
राजनीति विज्ञान कहता है कि जनता जब सबसे तीखे संकट का सामना करती है तभी उसके सबसे जुझारू नेता सामने आते हैं। वे आते तो बिजली की चमक की तरह हैं लेकिन जनता के बीच रहते बिल्कुल उसी तरह हैं जैसे पानी में मछली रहती है। चंदेश्वरी दा ऐसे ही नेता थे। सीपीआई में आने के पहले नक्सलवादी आन्दोलन का उभार भी वे देख चुके थे। वे तो उच्च अध्ययन के लिए मास्को जाने की तैयारी में थे। इसके लिए उनका चयन भी हो चुका था। मास्को जाने के पहले वे कुछ जरूरी कागजात लेने भागलपुर से अपने गांव बीहट आये थे। तब बेगूसराय के लोग अपराधियों के आतंक के साये में जी रहे थे। गांव आते ही उनका भी सामना अपराधियों के साथ हुआ। जमकर लड़ाई चली। इसी क्रम में एक हत्या हो गई। इस हत्याकांड के अभियुक्त बनकर उन्हें सीपीआई के नेताओं के साथ जेल जाना पड़ा। और जब वे जेल से बाहर आये तो वे जान चुके थे उनके लिए विश्वविद्यालय का रास्ता मास्को से होकर नहीं किसानों के खेत-खलिहान और मजदूरों की फैक्ट्रियों से होकर गुजरता है।
इसके बाद तो चंदेश्वरीजी बिहार में भाकपा के हर कार्यक्रम के लिए जैसे जरूरी नाम बन गये थे। 65 साल के चंदेश्वरी दा भाकपा के युवा कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत थे। नौजवान कार्यकर्ताओं का कहना था कि चंदेश्वरी दा जब उनके साथ होते हैं तो ऐसा लगता है मानो उनके इर्द-गिर्द कोई सुरक्षा घेरा बना हुआ हो।
इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। उनके भाई बिन्देश्वरी सिंह की हत्या हुई। उनके कई साथी उनसे बिछड़े और खुद उन्हें एक हत्याकांड में उम्र कैद की सजा हुई। हालांकि इस सजा के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट गये और इस सजा पर उन्हें स्टे मिला। वे एक बार जिला पार्षद का चुनाव भी जीते जिसे बाद में रद्द किया गया। चंदेश्वरी दा केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि एक अच्छे लेखक भी थे। उनकी तीन किताबें शहीदों के रास्ते, लाल सितारा और जेल का खेल लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुकी हैं। एक ऐसे समय में जब राजनीति और विश्वसनीयता के बीच की खाई बढ़ती जा रही है, चंदेश्वरी दा जैसे लोगों का जाना बड़ा सदमा देता है।