शनिवार, 10 नवंबर 2012

कई संभावनाओं के द्वार खोल गई माले की रैली

कमलेश
भाकपा माले की रैली 9 नवम्बर को संपन्न हुई। न कोई ताम-झाम और न पटना जैसे शहर में कोई गेट न होर्डिंग्स। न शहर में पोस्टर सटे न परचे बंटे। यह पहला मौका था जब माले की कोई रैली हुई हो और शहर की दीवारें वाल राइटिंग से खाली  रह गई। न तो शहर में कहीं माले का लाल झंडों से सजा-धजा प्रचार वाहन दिखा और ना ही राजधानी में कहीं नुक्कड़ सभा देखने को मिली। न मशाल जुलूस निकला और ना प्रचार जुलूस के जत्थे दिखे। लेकिन फिर भी रैली में लोग उमड़े और जमकर उमड़े। पूरा गांधी मैदान लाल हो गया। लोग और लोगों के हाथ में लाल झंडा। ठीक चार दिन पहले धन की रैली करने वाले जन की इस रैली को देखकर मुंह छिपाने लगे। देखने वाले शहर के लोगों ने कहा- काफी दिनों के बाद विपक्ष में रहने वाले किसी दल ने इतनी बड़ी और शानदार रैली की।
भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने खुद कहा- भाकपा माले ने खुद अपना ही रिकार्ड तोड़ा है। उनके अनुसार यह भाकपा माले की अब तक की सबसे बड़ी रैली थी। श्री भट्टाचार्य सही थे। पिछले दिनों सीपीआई के कांग्रेस के समय भी रैली हुई थी। वह भी रैली बड़ी थी लेकिन माले की इस रैली ने लोगों को जुटाने के मामले सीपीआई की उस रैली को पीछे छोड़ दिया। कहने की जरूरत नहीं कि इस रैली में पहुंचे लोग अपने संसाधनों से आये थे। पूरी रात उन्होंने गांधी मैदान में खाली आसमान के नीचे ठंड में गुजारी और अहले सुबह से रैली में जुट गये। खाने का सामान भी लोग खुद अपना लेकर आये थे। रात भर गांधी मैदान के कई कोनों में गीत गूंजा- जनता के आवे पलटनिया, हिलेले झकझोर दुनिया।

बिहार के राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि भाकपा माले की यह रैली राजनीतिक रूप से थोड़ी अलग रही। अलग इस मामले में कि इसने राज्य में नई राजनीतिक संभावनाओं के द्वार खोले हैं। रैली के मंच पर एक नये गठबंधन का भ्रूण रूप दिखाई पड़ा। अपने भाषण के दौरान माले महासचिव ने राज्य में तीसरे मोर्चे के गठन की ओर बढ़ने का संकेत देकर इस संभावना को और मजबूत करने की कोशिश की। मंच पर न केवल विभिन्न वामपंथी दलों के नेता मौजूद थे बल्कि समाजवादी धड़े के लोग भी शामिल थे। मंच पर समाजवादियों को देखकर कई लोग चौंके। चौंकना भी स्वाभाविक था। पिछले कुछ समय से इन दोनों धाराओं के बीच की खाई थोड़ी गहरी दिख रही थी। भाकपा, माकपा और माले के नेता तो सीपीआई की कांग्रेस में भी एक मंच पर आए और उन्होंने वामपंथी दलों की एकता को समय की जरूरत बताया था। इस रैली में भी यही हुआ। माकपा के राज्य सचिव विजयकांत ठाकुर ने तो यहां तक कहा कि अनुभवों से यह साबित हुआ है कि बुर्जुआ दलों के साथ गठबंधन से वे दल तो मजबूत हो जाते हैं लेकिन वामपंथी दलों के लिए इसका अनुभव अच्छा नहीं होता है। सीपीआई के राज्य सचिव राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने भी कहा कि नीचे के स्तर पर वामपंथी दलों की एकता पर बात होने लगी है। लिहाजा इन बातों का शायद उतना महत्व न भी हो क्योंकि अमूमन चुनाव के पहले वामपंथी दलों के नेता ऐसी बातें करते रहते हैं लेकिन चुनाव के दौरान उनके लिए दूसरे एजेंडे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस रैली में खास बात उन समाजवादियों का जुटना रहा जो अभी न तो लालू प्रसाद के खेमे में हैं और ना ही नीतीश कुमार या शरद यादव के खेमे में। लेकिन वे किसी न किसी स्तर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। मसलन मंच से भाषण करने वालों में पूर्व मंत्री और समाजवादी नेता हिंदकेशरी यादव भी मौजूद थे। अभी श्री यादव मुजफ्फरपुर और इसके आसपास के इलाकों में शराब विरोधी आन्दोलन चला रहे हैं और इनके आन्दोलन से घबराये शराब माफियाओं ने इन्हें पिछले दिनों बुरी तरह से पीटा था।
इस मंच पर बिहार के प्रमुख समाजवादी नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री देवेन्द्र प्रसाद यादव भी मौजूद थे। श्री यादव अभी नीतीश और लालू दोनों से दूर हैं। हालांकि देवेन्द्र प्रसाद यादव ने कई बार अपने ही दल के भीतर जनतांत्रिक स्वरूप बहाल करने की लड़ाई लड़ी है और इसके लिए वे चर्चित भी रहे हैं। भाकपा माले की रैली में देवेन्द्र प्रसाद यादव ने एक मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि भाकपा माले जिस तीसरे मोर्चे की बात कर रहा है अगर वह बनता है तो बड़े भाई (लालू प्रसाद) और छोटे भाई (नीतीश कुमार) फिर एक हो जाएंगे। माले के मंच पर समाजवादी नेता रामदेव सिंह यादव को भी देखना लोगों के लिए सुखद रहा।
मतलब यह कि आने वाले दिनों में हाशिये पर पड़े समाजवादियों और वामपंथियों के बीच अगर एकता होती है तो यह बिहार की राजनीति में एक नई बात होगी। लम्बे समय के बाद बिहार की राजनीति में ऐसी कोई संभावना आई है। एक बार समता पार्टी और भाकपा माले मिलकर चुनाव लड़े थे लेकिन वह संभावना जितनी जल्दी सामने आई उससे भी ज्यादा तेजी से लुप्त हो गई थी। चुनाव के नतीजे भी इतने खराब थे कि दुबारा उसके बारे में सोचा नहीं जा सकता था। सीपीआई और सीपीएम लम्बे समय तक राजद के साथ मोर्चे में रहे। माकपा तो हाल-हाल तक रही। लेकिन इन तमाम गठबंधनों में समाजवादी ताकतें निर्णायक भूमिका में रहती थीं और वामपंथियों को उनका अनुसरण करना पड़ता था। इस बार अगर कोई मोर्चा दोनों ताकतों के बीच बनता है तो जाहिर है कि वामपंथी निर्णायक भूमिका में रहेंगे और ये एक नई बात होगी। हाशिये पर पड़े ये समाजवादी अपने स्तर से लड़-भिड़ तो रहे हैं लेकिन किसी मजबूत केन्द्र से जुड़ाव नहीं होने के कारण उनकी लड़ाई स्थानीय स्तर पर ही सीमित रह जाती है। अगर वामपंथियों के साथ उनकी लड़ाई जुड़ती है तो इसके सार्थक नतीजे आ सकते है।  

रविवार, 23 सितंबर 2012






बचेंगे तो सहर देखेंगे
कमलेश
भारत बंद के ठीक अगले दिन हमलोग कुछ खुदरा व्यवसायियों और कुछ लघु उद्यमियों से मिलने पहुंचे थे। हम जानना चाहते थे कि खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर वे क्या सोचते हैं जो इससे सीधे प्रभावित होने वाले हैं। दलदली रोड, बीएमपी रोड और बोरिंग रोड के कुछ इलाके खुदरा व्यापार के बड़े इलाके हैं। खासकर दलदली में खुदरा दुकानों से खरीदारी करने के लिए पूरे पटना से लोग आते हैं।
खुदरा व्यवसायी इस मामले में बहुत आंकड़ेबाजी के बारे में नहीं जानते। कुछ लोगों ने तो वालमार्ट का नाम भी पहली बार सुना है। हालांकि अधिकतर दुकानदारों ने कहा कि इसके खिलाफ हुए बंद में वे पूरी तरह शामिल थे और उन्होंने खुद अपनी दुकानों को बंद रखा था।
 खुदरा व्यवसायियों के नेता हैं रमेश चंद्र तलरेजा। बिल्कुल पारंपरिक अंदाज में धोती-कुरता पहनने वाले तलरेजा देखने से ही खुदरा व्यापारी के प्रतिरूप लगते हैं। एफडीआई को लेकर उनकी जानकारी अद्भुत थी और उन्होंने बिल्कुल जमीनी अंदाज में समझाया कि एफडीआई का असर उनके व्यवसाय पर किस तरह पड़ेगा। उनसे बात शुरू हुई तो वे पहले हंसे और फिर धीरे से कहा- वाल मार्ट तो अभी दूर है। संकट तो अभी से शुरू हो गया है। खुदरा दुकानदारों की रोजी-रोटी पर तो अभी से ही बिजली गिरने लगी है। आज की तारीख में हमारे 15 फीसदी ग्राहक हमसे अलग हो गए हैं। हमारे ये ग्राहक ऐसे थे जो नकद ग्राहक थे और जिनके यहां से उधार की कोई गुंजाइश नहीं थी।
हमारे नहीं समझने पर तलरेजाजी ने समझाने वाले अंदाज में कहा- हाल के दिनों में पटना में खरीदारी की सूरत पूरी तरह बदल गई है। पटना में इधर के दिनों में तेजी से खुल रहे मेगा मार्ट और मॉल ने हमारे धंधे को चौपट करने की शुरूआत कर दी है। उनके अनुसार पटना में खुदरा दुकानदारों की ये स्थिति तब हुई है जब शहर में केवल एक मॉल है। अभी दो-तीन मॉल खुलने वाले हैं। इनके खुलने के बाद तो और हालत खराब हो जाएगी। इसके बाद हम वॉलमार्ट से लड़ने लायक बचेंगे तब तो लड़ेंगे।
उनके अलावा पटना के दूसरे इलाकों के भी कई अन्य खुदरा व्यापारियों से बात करने के बाद जो तस्वीर उभरती है वह सचमुच भयावह है। यह इस बात को भी बताता है कि हम किस तरह छोटे और मंझोले दुकानदारों को उनके भाग्य पर छोड़ते जा रहे हैं। छोटे और मंझोले खुदरा व्यपारी अमूमन अपने ग्राहकों को तीन श्रेणी में बांटते हैं। पहली श्रेणी में वैसे ग्राहक होते हैं जो पूरी खरीदारी हर महीने में एक साथ और नकद करते हैं। ये ग्राहक महीने में एक दिन आते हैं और एक साथ पूरे महीने की खरीदारी कर लेते हैं। ऐसे ग्राहक इन छोटे दुकानों की जान होते हैं क्योंकि इनसे उन्हें एकमुश्त पैसा मिल जाता है। दुकानदारों की भाषा में ये बड़े लोग होते हैं। दूसरी श्रेणी में वैसे ग्राहक होते हैं जिनके साथ उधार खाते का हिसाब चलता है। ये ग्राहक भी खरीदारी तो खुद महीने में एक बार करते हैं लेकिन इनके यहां से पैसा रुक-रुक कर आता है। तीसरी श्रेणी में पूरे महीने छोटी-मोटी खरीदारी करने वाले लोग होते हैं। इनके साथ भी उधार-खाते का संबंध निरंतर चलता है। दुकानदारों के अनुसार तीसरी श्रेणी के लोगों के भरोसे धंधा नहीं चल सकता है।
राजधानी में पहले विशाल मेगामार्ट खुला और उसके बाद पीएनएम मॉल। खासकर मॉल खुलने के बाद खुदरा व्यापारियों ने पाया कि उनके यहां पहली श्रेणी के खरीदारों का आना कम हो रहा है। अब तो धीरे-धीरे पूरी तरह बंद हो गया है। दरअसल अब इन खरीदारों को मॉल और मेगा मार्ट में खरीदारी के साथ-साथ घूमने-फिरने की भी जगह मिल गई है। ये अपने परिवार के साथ मॉल जाते हैं, मौज-मस्ती करते हैं और सामान खरीदकर वापस आ जाते हैं। अब दलदली रोड जैसे जगहों की दुकानें उनके लिए दूसरी प्राथमिकता की दुकान रह गई हैं। मतलब इन दुकानों में वे बीच-बीच में उस समय चले जाते हैं जब उन्हें अचानक किसी खास चीज की जरूरत पड़ जाती है और वे उस एकमात्र चीज के लिए मॉल नहीं जा सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी के घर में बीच महीने में अचानक घी खत्म हो जाती है तो वह जरूर इन छोटी दुकानों में जाता है। अलबत्ता दूसरी और तीसरी श्रेणी के दुकानदार अभी भी पूरी तरह ऐसी ही दुकानों के साथ हैं।
अभी केवल पाटलिपुत्र कॉलोनी में ही मॉल होने का लाभ भी इन छोटी दुकानों को मिल जा रहा है। दूरी वाले इलाकों के लोग सप्ताह में एक दिन या कम से कम महीने में एक दिन मॉल जा रहे हैं लेकिन जब राजापुर पुल और स्टेशन के आसपास के इलाकों में बन रहे मॉल खुल जाएंगे जिनके खुलने की बात चल रही है तो फिर इन छोटी दुकानों का क्या होगा? ये सोचकर ही ये दुकानदार डर जा रहे हैं। खुद तलरेजाजी ने सलाह दी कि हमें पीएनएम मॉल के आसपास के इलाकों में पहले से चलने वाली छोटी दुकानों का सर्वे करना चाहिए और देखना चाहिए कि मॉल खुलने के बाद उनकी बिक्री पर कितना असर पड़ा है। मॉल और मेगा मार्ट के अलावा नाइन टू नाइन और दूसरे बड़े शॅपिंग स्टोरों ने उनकी हालत खराब कर दी है। दुकानदारों को तो अब यह डर भी सता रहा है कि जब मॉल की संख्या ज्यादा हो जाएगी तो दूसरी श्रेणी के भी ग्राहक उनके पास से हटने लगेंगे। और तब उनके पास केवल ऐसे ग्राहक ही बचेंगे जो छोटी-छोटी खरीदारी करेंगे और इसका भी अधिकतर हिस्सा उधार खरीदारी का रहेंगा।
ये पटना के विकास का नया चेहरा है। यहां डॉमिनोज खुला, नेरुलाज खुलने जा रहा है और अब केएफसी की बात हो रही है। इनकी खूब चर्चा हो रही है। लेकिन जिन इलाकों में ये खुल रहे हैं उन इलाकों में छोटी-मोटी चाय-नाश्ते की दुकानें बंद होती जा रही हैं। ये बेरोजगार हो रहे लोग अभी क्या कर रहे हैं- ये जानना भी दिलचस्प होगा। 

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

सामने आया पुलिस का महिला विरोधी चेहरा

पीयूसीएल ने जारी की दो घटनाओं की जांच रिपोर्ट
कमलेश
पीयूसीएल ने एक बार फिर बिहार के दो बलात्कार कांडों की जांच रिपोर्ट जारी की है। दोनों ही मामलों में बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या कर दी गई। एक मामले में तो पीड़िता आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची थी जबकि दूसरे मामले में पांच बच्चों की मां। दोनों ही मामलों में पुलिस ने निहायत ही लापरवाही और गैर जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाया। दोनों ही मामलों में पुलिस पर अपराधियों के साथ सांठ-गांठ का आरोप लगा। बलात्कार के एक मामले में जहां पीड़िता अति पिछड़ी जाति की थी, पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज नहीं की। बाद में जब सामाजिक कार्यकर्ता-पत्रकार अनिल प्रकाश और पूर्व आईजी रामचंद्र खान आदि ने पुलिस पर दबाव बनाया तब जाकर एफआईआर तो दर्ज की गई लेकिन यहां मामला बलात्कार के बजाय दुर्घटना का बताया गया। जिस टीम ने इन दोनों घटनाओं की जांच रिपोर्ट जारी की है उसमें पीयूसीएल की प्रदेश उपाध्यक्ष प्रो. डेजी नारायण, शाहिद कमाल, पूर्व सचिव और पत्रकार निवेदिता झा, राज्य महासचिव जितेन्द्र और सदस्य राजेश्वर पासवान शामिल थे। 

बलात्कार के बाद बच्ची को मार डाला
पहला मामला मुजफ्फरपुर जिले के कटरा थाने के सीयातपुर पंचायत स्थित कोप्पी गांव का है। 12 जुलाई को गांव के रवीन्द्र सिंह की 14 साल की बेटी खुशबू कुमारी शाम में छह बजे बगीचे में नित्य क्रिया से निवृत्त होने गई थी। यह बगीचा गांव के दक्षिण में है। जब वह एक घंटे तक वापस नहीं लौटी तो घरवालों ने उसकी तलाश शुरू की। काफी तलाश के बाद घरवालों ने गांव के लोगों की मदद से खुशबू की लाश झाड़ियों से बरामद की। उसके ही दुपट्टे से गला दबाकर उसे मार डाला गया था। उसके शरीर के नीचे के कपड़े खून से तर-बतर थे। खुशबू की लाश रात दस बजे घर लाई गई। घर वालों ने गांव के चौकीदार के माध्यम से कटरा थाने की पुलिस को खबर दी लेकिन पुलिस कई घंटे गुजर जाने के बावजूद नहीं पहुंची।
घर के लोगों ने पीयूसीएल की टीम से कहा कि खुशबू के हत्यारों ने पुलिस को रिश्वत दिये थे इसीलिए पुलिस समय पर नहीं आई। घर के लोगों ने खुशबू के साथ बलात्कार और हत्या का आरोप गांव के ही अवधेश सिंह, त्रिलोक सिंह, सुभाष, पंकज सिंह पर लगाया। ये लोग पीड़िता के परिवार के रिश्तेदार थे। लेकिन पीड़िता के चाचा देवेन्द्र सिंह ने पुलिस को जो शिकायत दर्ज कराई उसमें अवधेश सिंह, त्रिलोक सिंह और पंकज सिंह को आरोपित किया गया था। शिकायत में यह भी कहा गया था कि आरोपित पीड़िता के परिवार को बराबर धमकाते रहते हैं। घरवालों का कहना है कि आरोपित और उनके परिजन बराबर उनपर केस उठा लेने की धमकी देते रहते हैं। इस घटना के बाद रवीन्द्र सिंह के घर की खास कर कॉलेज जाने वाली लड़कियां भयभीत रहती हैं और घर की महिलाओं को भी सहमकर ही बाहर निकलना पड़ता है।
चश्मदीद गवाह को भी मिल रही धमकी
इस घटना के एक गवाह सुरेश सहनी बूढ़े आदमी हैं और बगीचे में ही पहले हिस्से में झोपड़ी बनाकर रहते हैं। उन्होंने पीयूसीएल की टीम को बताया कि उन्होंने शाम में सात बजे के आसपास खुशबू कुमारी को बगीचे की तरफ जाते हुए देखा था। उस समय अंधेरा फैल गया था। अवधेश सिंह, त्रिलोक सिंह, पंकज सिंह और सुभाष सिंह उसकी झोपड़ी में नशे की हालत में बैठे थे। उनलोगों ने भी खुशबू को बगीचे की तरफ जाते हुए देखा। कुछ ही मिनटों के बाद पहले अवधेश सिंह और उसके बाद त्रिलोक सिंह उसी तरफ गए जिस तरफ लड़की गई थी। इस दौरान सुभाष सिंह सड़क पर इधर से उधर टहलता रहा मानो वह गार्ड का काम कर रहा था। पंकज सुरेश सहनी के ही साथ बैठा रहा। सुरेश सहनी ने बताया कि अभियुक्तों के परिजन उसे कोर्ट में बयान नहीं देने के लिए धमकी दे रहे हैं।  पीयूसीएल की टीम अभियुक्तों के भी घर पहुंची लेकिन वहां कोई नहीं था और घर में ताला बंद था।
पुलिस ने क्या कहा
कटरा थाना के थानाध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि उन्हें सुबह में इस घटना के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने पुलिसकर्मियों को आदेश दिया कि वे लाश को बरामद करे और एफअईआर दर्ज करें। उनका कहना था कि यह मामला बलात्कार का नहीं हत्या का था। 13 जुलाई को एफआईआर दर्ज हुई और केवल दो व्यक्तियों अवधेश सिंह और त्रिलोक सिंह को अभियुक्त बनाया गया। इस घटना के मुख्य अभियुक्त अवधेश सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस की जांच रिपोर्ट के अनुसार अभियुक्त ने स्वीकार किया कि उसने खुशबू कुमारी के साथ बलात्कार करने की कोशिश की लेकिन बच्ची ने प्रतिरोध किया और उसके प्रतिरोध के कारण अपराधी अपने मंसूबे में सफल नहीं हो सका। गुस्से में आकर उसने खुशबू का गला उसके ही दुपट्टे से कसकर उसे मार डाला। दूसरा अभियुक्त त्रिलोक सिंह फरार है।
पीयूसीएल की टीम ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि पहली नजर में बलात्कार का मामला परिवारों की लड़ाई का परिणाम लगता है जिसका नतीजा बच्ची की मौत के रूप में निकला। खुशबू के परिजनों ने 14 जुलाई को शिकायत दर्ज कराई लेकिन पुलिस ने एफआईआर 13 जुलाई की तारीख में ही दर्ज कर लिया। ऐसा क्यों? खुशबू के परिजन भयभीत हैं। उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। फरार अभियुक्त और उनके परिजन खुशबू के परिजनों को लगतार धमकी दे रहे हैं।

मार डाली गई महिला, पुलिस ने कहा-दुर्घटना
पीयूसीएल की टीम कटरा थाने के ही घनौरा गांव पहुंची जहां डीह टोला के छोटे सहनी की पत्नी मीरा सहनी के साथ गैंग रेप किया गया था। इस गांव में भूमिहार जाति का दबदबा है जबकि बाकी मल्लाह और कुछ दलितों के घर हैं। यह घटना 19 मई की थी। मीरा सहनी पांच बच्चों की मां थी और उनके पति छोटे सहनी कोलकाता में काम करते हैं। वे भूमिहीन थीं और एक कमरे में अपने पांच बच्चों के साथ रहती थीं। पीयूसीएल की टीम को गांव के लोगों ने बताया कि मीरा सहनी को रात में एक अनजान फोन आया। फोन करने वाले ने उनसे कहा कि उनके बड़े बेटे राजेश कुमार को गांव के स्कूल के पास कुछ लोगों ने मार डाला है। स्कूल में एक धार्मिक आयोजन चल रहा था। यह खबर सुनते ही बदहवास मीरा सहनी घर से बाहर निकल गईं। कुछ लोग घर के बाहर खड़े थे। मीरा सहनी को उन्होंने अपनी बाइक पर बैठाया और लेकर चले गए। परिजनों का आरोप है कि उनलोगों ने मीरा के साथ बलात्कार किया। फिर वे लोग उनकी हत्या करने की नीयत से अचेतावस्था में उन्हें लेकर कहीं और जा रहे थे। इस दौरान वे मोटरसाइकिल गिर गई और उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। उन्हें अर्ध नग्न अवस्था में वहीं छोड़कर अपराधी भाग गए। गांव के ही एक आदमी मदन राय ने मीरा सहनी के बच्चों से कहा कि उनकी मां सड़क के किनारे एक गड्ढ़े में गिरी हुई हैं। उन्होंने बच्चों को सलाह दी कि वे उन्हें लाने जाएं तो साड़ी लेकर जाएं। गांव वाले घायल मीरा सहनी को पहले कटरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर ले गए। वहां से उन्हें श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और फिर वहां से उन्हें पीएमसीएच भेजा गया। यहां इलाज के दौरान 24 मई को उनकी मौत हो गई।
मामला दर्ज करने को तैयार नहीं थी पुलिस
मीरा सहनी के पति छोटू सहनी 20 मई को पटना पहुंचे और 22 मई को उन्होंने कटरा थाने में पहुंचकर एफआईआर दर्ज करानी चाही लेकिन पुलिस ने इसे स्वीकार नहीं किया। 25 मई को जब इस मामले में पूर्व आईजी रामचंद्र खान और अनिल प्रकाश जैसे लोगों ने हस्तक्षेप किया तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज किया। इस शिकायत में छोटू सहनी ने रीतुराज सिंह उर्फ पच्छु सिंह, अवधेश राय उर्फ मदन राय, विनोद सिंह उर्फ नागेन्द्र सिंह, चंद्रशेखर सिंह, राजकुमार और पप्पू सिंह को अभियुक्त बनाया। पुलिस ने इनमें से एक को भी गिरफ्तार नहीं किया है।
कटरा के थानाध्यक्ष मनोज कुमार ने पीयूसीएल की टीम को बताया कि मीरा सहनी के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ था। वह मोटरसाइकिल से हुई दुर्घटना के कारण घायल हो गई थीं। थानाध्यक्ष ने टीम को बताया कि छोटू सहनी ने 25 मई को एफआईआर दर्ज कराई है जिसमें छह लोगों को अभियुक्त बनाया गया है।
पीयूसीएल की टीम को पता चला कि घटना के पांच दिनों के बाद पोस्टमार्टम और फारेंसिक रिपोर्ट तैयार हुई। इससे साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका बढ़ गई। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि मीरा सहनी की मौत सिर में चोट लगने से हुई है वहीं फॉरेंसिक रिपोर्ट ने बलात्कार की थ्योरी को भी खारिज कर दिया।

बलात्कार के साक्ष्य मौजूद- पीयूसीएल
पीयूसीएल की टीम का मानना है कि इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं कि मीरा सहनी के साथ बलात्कार किया गया। पुलिस के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि मीरा सहनी अर्ध नग्न अवस्था में कैसे पाई गईं। पुलिस तो एफआईआर भी दबाव के बाद ही दर्ज कर सकी। पुलिस ने इस मामले में आए तथ्यों की छानबीन नहीं की। यहां तक कि उसने उस मोबाइल कॉल की भी छानबीन नहीं की जो मीरा सहनी ने रात में रीसीव किया था। अगड़ी जाति के कई लोगों ने मीरा सहनी के चरित्र पर सवाल उठाये और कहा कि वह अक्सर रात में बाहर जाती थी। पीयूसीएल की टीम ने सवाल उठाया है कि अगर उनलोगों की बात मान भी ली जाए तो क्या ऐसी महिला को जीने और सुरक्षा पाने का अधिकार नहीं है। महिला की सामाजिक निंदा इसलिए भी की जाती है ताकि जांच और न्याय पर असर पड़े। आम तौर पर दलित महिलाओं के साथ ऐसा ही होता है। पुलिस का कहना है कि वह महिला रात में धार्मिक समारोह में शामिल होने गई थी लेकिन उसने इस बात की तस्दीक नहीं की कि वह उस धार्मिक समारोह में देखी गई थी या नहीं। वैसे कई महिला संगठनों के दबाव डालने के बाद इस मामले की दुबारा जांच की जा रही है।

पीयूसीएल के निष्कर्ष

पीयूसीएल की टीम का यह भी मानना है कि ऐसे मामलों में एफआईआर तत्काल दर्ज करने की व्यवस्था होनी चाहिए। एक ऐसा तंत्र विकसित होना चाहिए जिससे इस बात पर निगरानी रखी जा सके कि थानों में लोगों की शिकायत दर्ज हो रही है या नहीं। हर जिले में कम से कम तीन महिला थाना होने चाहिए। महिलाओं और कमजोरों के साथ होने वाले अपराधों को लेकर पुलिस को ज्यादा संवेदनशील बनाने की जरूरत है। महिला पंचायत जनप्रतिनिधियों को ज्यादा से ज्यादा ट्रेनिंग देने की जरूरत है ताकि वे महिला अधिकारों  के लिए प्रभावशाली तरीके से लड़ सकें। अधिकतर गांवों में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तभी होता है जब वे नित्य क्रिया से निवृत्त होने के लिए घर से बाहर जाती हैं। घरों में शौचालय नहीं होने का मसला उनके जीवन और पहचान से जुड़ा मसला हो गया है। इसे किसी भी हाल में हर घर में होने की गारंटी होनी चाहिए। 

रविवार, 16 सितंबर 2012

विमल पासवान अपनी बेटियों को नहीं पढ़ायेंगे

कमलेश
सात बेटियों के पिता विमल पासवान अब अपनी बेटियों को नहीं पढ़ायेंगे। उनकी बेटियां अब स्कूल नहीं जाएंगी भले उन्हें साइकिल मिले या नहीं। अब साइकिल के लिए इज्जत के साथ-साथ जान का सौदा कौन करे। उन्होंने अपनी दूसरी बेटी कविता को स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा था। लेकिन उनकी बेटी गांव के ही बड़े और दबंग लोगों की नजर पर चढ़ गई। पहले तो उसका स्कूल आना-जाना मुश्किल किया गया और जब इसके बावजूद उसने अपना सिर नहीं झुकाया तो गांव के शरीफजादों ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या करके उसकी लाश कुंए में फेंक दी। लाख शिकायतों के बावजूद जब पुलिस ने कुछ नहीं किया तो लोगों का गुस्सा फूटा और लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया। पुलिस ने लोगों पर बल प्रयोग किया और इसके जवाब में उग्र लोगों ने थाने पर रोड़ेबाजी की और आग लगाई। बदले में पुलिस ने गोली चलाकर एक प्रदर्शनकारी रणधीर पासवान को मार डाला।
यह कहानी है बिहार के राजधानी के बिल्कुल बगल में स्थित वैशाली जिले के सराय थाना के प्रबोधी सिसौना गांव की। घटना एक महीने पुरानी है। लेकिन इसने बिहार के राजनीतिक माहौल को गरमा दिया था।  हालाँकि पुलिस ने यह कहकर अपनी लाज बचाई कि थाना पर हमला करने वाले लोग बाहर के गांव से आये थे। लेकिन अब पता चला है कि मामला ही कुछ अलग था.। इसका खुलासा हुआ है पीयूसीएल की जाँच रिपोर्ट में।  वैसे इस रिपोर्ट को बिहार की मिडिया में जगह नही मिल पाई। 
  विमल पासवान ने अपनी यह पीड़ा इस घटना की जांच के लिए प्रबोधी गांव पहुंचे पीयूसीएल की टीम को सुनाई। इस टीम में किशोरी दास, मिथिलेश कुमार, मनीष कुमार और नागेश्वर प्रसाद शामिल थे। इस टीम ने अपनी जांच रिपोर्ट 14 सितम्बर को ही जारी की है। इस रिपोर्ट को पढ़ने से साइकिल चलाकर स्कूल जाने वाली लड़कियों की तस्वीर के स्याह पक्ष का पता चलता है। 
पीयूसीएल की जांच रिपोर्ट में जो कहानी उभर कर सामने आ रही है वह बिहार में चल रहे महिला सशक्तिकरण के शोर का भी खुलासा करती है। कविता मूलत: दलित समुदाय की लड़की थी और उसके पिता विमल पासवान अनपढ़ हैं। कविता सराय के आदर्श उच्च विद्यालय में दसवीं कक्षा की छात्रा थी। विमल पासवान अपनी बेटी कविता की शादी के बारे में सोच ही रहे थे कि उसके साथ ऐसी घटना हो गई। सात जुलाई की शाम कविता अपनी दो छोटी बहनों के साथ जलावन चुनने बागीचा गई थी। इस दौरान जामुन चुनने के क्रम में वह पिछड़ गई और दोनों बहनें घर चली आईं। जब वह देर रात तक घर नहीं लौटी तो घर के लोग उसे खोजने निकले। पूरी रात तलाश चली लेकिन कविता नहीं मिली। तलाश करने का क्रम 8 जुलाई को भी जारी रहा। लेकिन कविता का कोई पता नहीं चला। 9 जुलाई को गांव के एक कुंए में कविता की लाश मिली। लाश की बांहें पीछे दुपट्टे से बांधी हुई थी। बाद में पुलिस भी वहां पहुंची। लेकिन लोगों ने लाश को पुलिस के हवाले करने से इनकार कर दिया और एसपी तथा डीएम को घटनास्थल पर बुलाने की मांग करने लगे। लाश तब तक कुंए के पास ही पड़ी रही। बाद में डीएसपी ने लोगों को समझा-बुझा कर लाश को वहां से उठवाया और सड़क पर रखवा दिया। लाश के सड़क पर रखते ही पुलिस ने जबरन लाश के अपने कब्जे में ले लिया और चली गई। 
बलात्कार और हत्या का आरोप सिसौनी प्रबोधी गांव के सुधीर कुमार और चंचल कुमार पर लगाया गया है। ये दोनों दबंग परिवार के हैं और अक्सर कविता के स्कूल जाने और स्कूल से लौटकर आने के समय उसपर भद्दी टिप्पणी किया करते थे। भय और लज्जा के कारण कविता इस बात को कहीं बता नहीं पाती थी। गांव के लोगों ने बताया कि ये दोनों युवक अक्सर गांव में रोब दिखाते रहते थे और उनलोगों ने विमल पासवान के साथ भी ऐसा ही किया था। सुधीर का बड़ा भाई अपराधी है और हाजीपुर जेल में बंद था। पीयूसीएल की टीम को पता चला कि वह भी जेल से फरार हो गया है। गांव के ही एक दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या करने का आरोप इनके परिवार पर लगा था।
कविता के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में पुलिस के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किये जाने के खिलाफ नौजवान भारत सभा और महिला चेतना संघ ने 16 अगस्त को सराय बाजार के सूरज चौक पर धरना-प्रदर्शन का कार्यक्रम आयोजित किया था। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारी जबरन दुकानें बंद करवा रहे थे और सड़क जाम कर यातायात बाधित कर रहे थे। पुलिस ने ये भी दावा किया है कि प्रदर्शनकारी घातक हथियारों से लैस थे। पुलिस के अनुसार जब वह प्रदर्शनकारियों की तरफ बढ़ी तो प्रदर्शनकारी उसके साथ मारपीट करने लगे। इसमें पुलिस का एक जवान घायल हो गया। इसके बाद एक हजार लोग थाने पर पहुँच कर रोड़ेबाजी करने लगे। पुलिसकर्मियों ने इस मामले में सराय थाना में प्राथमिकी भी दर्ज कराई है। इसमें कहा गया है कि प्रदर्शनकारी थाने पर पहुंचकर मारपीट और लूटपाट करने लगे। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने थाना और वहां रखी गाड़ियों में आग लगा दी। अपनी प्राथमिकी में पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की ओर से फायरिंग होने लगी और एक प्रदर्शनकारी एक सिपाही की रायफल लेकर भागने लगा। इसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षार्थ गोली चलाई। इस गोलीकांड में रणधीर पासवान नामक युवक मारा गया। रणधीर पासवान के भाई ने भी इस मामले में एक प्राथमिकी दर्ज कराई है और उसने कहा है कि रणधीर पासवान बाजार से सामान खरीदकर आ रहा था और हंगामा होते देखकर रुक गया। इतनी देर में पुलिस की एक गोली उसके सिर में लगी। इलाज के क्रम में उसकी मौत हो गई।
पीयूसीएल ने माना है कि सराय थाने पर हुई गोलीबारी बलात्कार और हत्या के मामले में पुलिस की निष्क्रियता का नतीजा है। पुलिस की शिथिलता से आम लोगों को लगा पुलिस और दबंग अपराधियों में सांठ-गांठ है। लिहाजा लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया और मामला रोड़ेबाजी तक पहुंचा। पीयूसीएल ने मृतका कविता के पिता विमल पासवान को चौकीदार की नौकरी देने, अभियुक्तों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने, पुलिस फायरिंग में मरे रणधीर पासवान के परिजनों को सरकारी नौकरी और मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।  

रविवार, 19 अगस्त 2012

कोसी: जारी है लड़ाई

कमलेश

अगस्त आधा बीत चुका है और सितम्बर इतना करीब कि उसके कदमों की आहट सुनाई दे रही है। बादल के छंटने के बाद होने वाली धूप जानलेवा हो गई है। उमस इतनी कि पसीने से कपड़े भींग रहे हैं। ठीक ऐसे ही मौसम में कारगिल चौक पर जन सुनवाई शुरू हुई थी। इसमें कोसी के बाढपीड़ितों के लिए लड़ने वाले पीड़ितों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्यक्रमों की जमीनी हकीकत बता रहे थे। अगले दिन ईद का त्योहार होने के कारण जनसुनवाई में जुटे लोगों की तादाद तो कम थी लेकिन मुद्दे बहुत बड़े थे। कोसी विकास संघर्ष समिति और कोसी नवनिर्माण मंच की ओर से आयोजित इस जनसुनवाई में महेन्द्र यादव जब गांवों के रेगिस्तान में बदल जाने की कथा सुना रहे थे तो आसपास बड़ी संख्या में राजधानी के लोगों की भीड़ जमा हो गई। लोग यह जानकर चकित थे कि बिहार में एक ऐसा भी गांव है जहां हवा चलती है तो आप बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि यदि आपने ऐसा दुस्साहस किया तो आपकी आंखों में रेत भर जाएगी। क्या इसका मतलब यह है कि बिहार में मरुस्थल भी है। वे बता रहे थे कि इन इलाकों में आप रात में बाइक से नहीं चल सकते क्योंकि बालू में फंसकर बाइक कहां आपको पटक देगी इसका पता भी आपको नहीं चल पाएगा। उन्होंने जनकारी दी कि कोसी क्षेत्र के गांवों के खेतों में बालू भर चुका है और  वहां अब खेती पूरी तरह मुश्किल हो चुकी है। विपन्नता का आलम यह है कि पेट भरने के लिए लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को काम करने के लिए बाहर भेज रहे हैं और इसके कारण इस इलाके की लड़कियां बड़ी संख्या में ट्रैफिकिंग की शिकार हो रही हैं। इस जनसुनवाई के आयोजक दोनों संगठन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से संबद्ध हैं।
18 अगस्त को कोसी त्रासदी के चार वर्ष पूरे हो गए। इसी मौके को लेकर इस जनसुनवाई का आयोजन किया गया था। 2008 में इसी दिन कोसी की बाढ़ तबाही लेकर आई थी। देश में पहली बार मानवकृत बाढ़ की इस त्रासदी में कोसी अंचल के 30 लाख लोग पीड़ित हुए थे। राज्य सरकार ने कोसी क्षेत्र में राहत व पुनर्वास कार्यक्रम शुरू करते हुए कहा था कि कोसी अंचल को पहले से बेहतर स्थिति में बसाया जाएगा। पर चार वर्ष बीतने के बावजूद कोसी क्षेत्र के हजारों एकड़ उपजाऊ खेतों में बालू भरा पड़ा है। लाखों ध्वस्त और क्षतिग्रस्त मकान पुनर्निर्माण के इंतजार में हैं। पुनर्वास की लचर नीति के कारण नगरवासी और व्यापारी किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति व पुनर्वास के कार्यक्रमों से पूरी तरह वंचित हैं। पुनर्वास की तमाम योजनाओं में जटिल प्रक्रियाओं, सरकारी उदासीनता और सुस्ती से भ्रष्टाचार का रास्ता खुल गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता रणजीव कुमार ने बताया कि खुद सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार कोसी क्षेत्र में आई बाढ़ से कुल 2 लाख 36 हजार 632 घर ध्वस्त हुए थे। राज्य सरकार ने विश्व बैंक से कर्ज लेकर 31 दिसम्बर 2011 तक एक लाख आपदा सहाय्य आवास गृह के निर्माण की घोषणा की थी। पर इस योजना का क्या हुआ, यह किसी को पता नहीं है। महेन्द्र यादव ने जानकारी दी कि गरीब लोग आज भी अपने सिर पर पॉलीथिन की छत बनाकर रह रहे हैं। हर बार तेज हवा और बरसात में यह छत ध्वस्त हो जाती है। उन्होंने बतया कि खेतों की हालत के बरे में जानकारी लेने के लिए सुपौल जिले के बसंतपुर अंचल के अंचलाधिकारी से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी। इसपर उन्होंने जवाब दिया कि इस अंचल में 1429.70 एकड़ खेतों में बालू भरा है। इस एक अंचल के बालू भराव से अनुमान लगया जा सकता है कि सुपौल, मधेपुरा और सहरसा जिलों के कितने खेतों में बालू भरा है। मतलब साफ है। बाढ़ भले चार वर्ष पहले आई हो लेकिन उसका कहर आज भी लोगों के लिए जानलेवा ही है। यहां यह बता देना जरूरी है कि कोसी की बाढ़ को केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा घोषित किया था।
                कोसी क्षेत्र के लोगों की मांगों को लेकर  चल  रहे आन्दोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मणिलालजी का कहना था कि इस पूरे इलाके के लोगों की कठिनाइयां लगातार बढ़ी हैं। आज भी अनेक गांवों के संपर्क रोड और पुल-पुलिया टूटे हुए हैं। हल्की बारिश से ही लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। बाढ़ में जिनके लोग मर गये थे उनके लिए मुआवजे की तो घोषणा की गई लेकिन उसे ले लेना आज भी कठिन काम है। जिनके पशु मरे, वे तो मुआवजे की बात भूल ही गए। स्कूल और अस्पतालों की हालत तो राम भरोसे ही है। मनरेगा और स्वावलम्बन की अन्य योजनाओं पर मठाधीश काबिज हैं और आम लोगों के हाथ कुछ भी नहीं आ रहा है। कोसी त्रासदी के बाद राज्य सरकार ने 9 दिसम्बर 2008 को कोसी बांध कटान न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। इस आयोग को एक साल के अंदर अपनी रिपोर्ट दे देनी थी। लेकिन इस आयोग का गठन किये हुए चार वर्ष पूरे हो गए और इसपर एक करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च हो गए लेकिन आज तक आयोग ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करके जनसुनवाई भी पूरी नहीं की है। रिपोर्ट की बात तो अभी कोसों दूर है। आयोग की शर्तें और एवं जांच के बिन्दुओं को इस तरह निर्धारित किया गया है कि उसमें से राज्य सरकार साफ बचकर निकल जाए। कोसी विकास संघर्ष समिति और कोसी नवनिर्मण मंच के नेताओं का आरोप था कि कुसहा में तटबंध टूटने के बाद आज तक एक भी पदाधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार पर कार्रवाई नहीं हुई। तब के सिंचाई मंत्री आज भी इस सरकार में खासमखास बने हुए हैं। कोसी के लोग बस इतना मांग रहे हैं कि उनका जीवन एक बार फिर पटरी पर लौट आए। इस जनसुनवाई में जो 23 सूत्री मांगें रखी गई उनमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो उन्हें नहीं दिया जा सकता है. इन मांगों को लेकर राज्य सरकार न तो पहले गंभीर रही है और ना ही अब ऐसे लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं जिससे लगे कि सरकार के एजेंडे में कोसी के बाढ़पीड़ित भी हैं।
समय बीतने के साथ कोसी क्षेत्र से बाहर के लोग कोसी की भयानक बाढ़ को भूलने लगे हैं। जनदबाव नहीं होने से यह मुद्दा गौण पड़ गया है और सरकार भी इससे जल्दी ही हाथ झाड़ लेना चाहती है। इस स्थिति में ऐसी जनसुनवाइयों का खास महत्व है। इसके कारण कोसी की बाढ़ का मसला एक बार फिर राजधानी में उठा और इससे राजधानी के बुद्धिजीवियों को याद आया कि इस बाढ़ ने कैसी तबाही मचाई थी। इस जनसुनवाई ने लोगों को बताने की कोशिश की है बाढ़ ने तो लोगों को सबकुछ छीना ही अब सरकार भी उन्हें मारने पर तुली हुई है। वैसे कोसी के क्षेत्र के लोगों ने अपनी लड़ाई नहीं छोड़ी है और वहां यह मुद्दा लगातार चल रहा है। इस साल 14 और 15 अप्रैल को सुपौल के जदिया में कोसी पुनर्वास की जमीनी हकीकत और जन हस्तक्षेप विषय पर दो दिनों की कार्यशाला आयोजित की गई थी जिसमें इस मसले को लेकर लड़ने वाले लोग और ग्रामीण जमा हुए थे। पिछले साल 7 से 10 दिसम्बर तक सुपौल के वीरपुर से मधेपुरा के बिहारीगंज तक कोसी जनसंवाद यात्रा का आयोजन किया गया। इसमें राजेन्द्र सिंह ने भी हिस्सा लिया था। इसके बाद वीरपुर में कोसी जनपंचायत लगाई गई जिसमें मेधा पाटेकर ने भी भाग लिया था। इस बार भी राजधानी के रंगर्किमयों और सामाजिक सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवियों ने जनसुनवाई में भाग लिया। इससे उम्मीद की एक रोशनी दिखाई पड़ी है।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

विकास के दौर में महिलाओं की जगह

विकास के दौर में महिलाओं की जगह

कमलेश


सीएसडीएस की ओर से प्रकाशित पुस्तक भारत का भूमंडलीकरण में अभय कुमार दुबे का एक लेख है- पितृसत्ता के रूप। इस लेख में एक जगह कहा गया है कि जब पूरी दुनिया में भूमंडलीकरण का दौर शुरू हुआ था तो नारीवादी चिंतक सिंथिया एनलो ने पूछा था- क्या तुम्हारी इस व्यवस्था में महिलाओं के लिए कोई जगह है? इस एक सवाल ने भूमंडलीकरण के बाद बदली हुई दुनिया में औरतों की जगह बता दी थी।  मुझे लगता है कि वक्त आ गया है कि बिहार की महिलाओं को भी अब  यहां की सरकार से यही सवाल पूछना चाहिए- क्या तुम्हारे इस विकास में महिलाओं के लिए कोई जगह है? क्या इस सूबे में कोई ऐसी जगह है जहां वे अपनी अस्मिता के साथ सुरक्षित रह सकें? इस राज्य में जो कुछ भी हो रहा है अगर उसे विकास कहते हैं तो उसकी सबसे बड़ी कीमत इस प्रदेश की महिलाएं चुका रही हैं।

अभय कुमार दुबे अपने उसी लेख में कहते हैं कि आज के दौर में यह बात लगभग सच साबित हो चुकी है कि इतिहास के किसी भी कालखंड में महिलाओं का उतना शोषण और दोहन नहीं हुआ है जितना इस दुनिया में अकेले भूमंडलीकरण के बाद हुआ है। मुझे लगता है कि यही बात बिहार के मामले में भी सच है। पिछले सात वर्षों में विकास के शोर के बीच महिलाओं की चीख जिस तरह दबती रही है उतना शायद किसी और कालखंड में नहीं हुआ।


महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी हैं, उनके साथ मारपीट और यहां तक कि उनकी हत्या करने की घटनाओं पर कहीं कोई नियंत्रण नहीं है। पॉश इलाकों में चकलाघर खुले हैं। बड़े-बड़े अपार्टमेंटों में ऐसे फ्लैट पकड़े गए हैं जहां धंधेबाज दूर-दराज की महिलाओं को लाकर वेश्यावृति कराते हैं। 
पटना में एक छात्रा के साथ हुआ गैंग रेप तो एक कड़ी की तरह है। इसके ठीक बाद नालंदा  की दो छात्राओं ने कहा कि उनके साथ कुछ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया है। पुलिस ने तफ्तीश के बाद बड़े ही शर्मनाक लहजे में कहा कि दोनों लड़कियां सेक्सुअली हैबिचुएटेड हैं। इसके साथ यह भाव भी छिपा हुआ था कि अगर लड़कियां ऐसी हैं तो उनके साथ कुछ भी जायज है। इस घटना के 48 घंटे भी नहीं बीते कि सीवान में एक डॉक्टर के पास एक नवविवाहिता अल्ट्रासाउंड कराने गई और डॉक्टर ने उसके साथ बलात्कार किया। पिछले साल अगस्त महीने में सारण जिले के मांझी थाने में एक छात्रा के साथ पुलिसकर्मियों ने सामूहिक बलात्कार किया। पिछले साल ही बगहा के एक थाने में एक महिला के साथ पुलिसकर्मियों ने सामूहिक बलात्कार किया। पिछले साल की शुरुआत में ही एक महिला ने एक भाजपा विधायक राजकिशोर की चाकू मारकर हत्या कर दी। उसका आरोप था कि विधायक ने उसकी इज्जत लूटी थी और और अब वह बराबर उसके साथ हमबिस्तर होने की मांग कर रहा था। महिला हत्या के बाद से ही जेल में है।

ये सारी घटनाएं ऐसे दौर में हो रही है जब बिहार में यह दावा किया जा रहा है कि यहां महिलाएं सशक्त हो रही है। बार-बार ऐसे चित्र दिखाये जा रहे हैं कि गांवों में लड़कियां साइकिल से स्कूल जा रही हैं, लड़कियां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बड़े-बड़े काम कर रही हैं, लड़कियां पुलिस में जा रही है और लड़कियां खेतों का काम संभाल रही हैं। इसके साथ ही और भी न जाने क्या-क्या?  राजधानी में बताया जाता है कि महिलाएं रात के 12 बजे परिवार के साथ बोरिंग रोड चौराहे पर आइसक्रीम खाने आती है। और ठीक ऐसे ही समय में यह बात भुला दी जाती है कि दिन के उजाले में राजवंशीनगर जैसे पॉश इलाके में दिन-दहाड़े कुछ लोग मिलकर एक लड़की की इज्जत लूट लेते हैं और नेहरूनगर में दिन के 11 बजे कुछ लोग घर में घुसकर महिला प्राचार्य की हत्या कर देते हैं। मतलब यह कि इस विकास के दौर का सच यह भी है कि बिहार की राजधानी पटना में महिलाओं पर हमले के लिए रात का इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं। उनपर दिन में हमले कर सकते हो और वे अपने घर में भी हों तो भी उनपर हमले कर सकते हो। विकास के बड़े-बड़े चित्र और और बड़ी तेज आवाजें। इन आवाजों में अक्सर महिलाओं की चीख दब जाती है।

इसमें दो राय नहीं कि हाल के दिनों में लड़कियों में कुछ बनकर दिखाने का जो उछाह पैदा हुआ है वह इतिहास के किसी दूसरे कालखंड में दिखाई नहीं पड़ता है। आप उन्हें साइकिल न भी दें तो भी स्कूल जाने का जो आवेग उनके भीतर पैदा हुआ है वह मरेगा नहीं। हाल में हुई शिक्षक और बैंक में नियुक्ति की परीक्षाओं में महिलाओं की भागीदारी देखकर कई लोगों ने दांतों तले अंगुली दबाई थी। लेकिन साथ में ही यह भी सच है कि जितनी तेजी से महिलाएं आगे बढ़ने का प्रयास कर रही हैं उतनी ही तेजी से उनके खिलाफ हमले भी बढ़ रहे हैं। हमले भी हर तरह के लोग कर रहे हैं। इसके लिए हमलावर का अनपढ़ या अपराधी होना जरूरी नहीं। हमला हर वर्ग की तरफ से होता है। कभी हमलावर प्रलिस होती है तो कभी दबंग तो कभी पुरुष साथी। डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे लोग भी इस मामले में पीछे नहीं होते। अगर सामने लड़की हुई तो फिर सारी पढ़ाई-लिखाई गई गतालखाते मे। अगर अपनी साइकिल बनवाने आई एक छोटी बच्ची के साथ मिस्त्री दुष्कर्म करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ एक डॉक्टर अपनी ही मरीज महिला की इज्जत से खेलता है। जहां महिलाओं की अस्मिता पर हमले का मामला आता है वहां सभी एक स्तर पर आ जाते हैं- डॉक्टर से लेकर साइकिल मिस्त्री तक।


मीडिया भी इस मामले में कहां पीछे रहती है? उसने बलात्कार पीड़िता को ही आरोपों के घेरे में ला दिया। राजधानी में हुए गैंग रेप के बाद मीडिया के एक हिस्से ने यह खबर उड़ाई कि बलात्कार की शिकार लड़की जब भी दुकान पर जाती थी तो चॉकलेट के बड़े-बड़े डब्बे खरीदती थी और वह हमेशा दुकानों में हजार या पांच सौ रुपये के ही नोट देती थी। जिस हिस्से ने यह खबर उड़ाई थी उसके इरादे साफ थे क्योंकि इतना बताने के साथ वह यह भी बता रहा था कि उस लड़की के घरवाले काफी गरीब हैं। मीडिया का यह हिस्सा यह खबर उड़ाकर कहना क्या चाहता था, यह साफ है।



 एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल ने तो एक बलात्कारी को ही अपने यहां बुला लिया। वहां भी इरादा खुला हुआ था- बलात्कार को लाइव दिखा नहीं सकते तो बलात्कार की कहानी ही लाइव सुना दीजिए। जितनी देर उस बलात्कारी का इंटरव्यू चला उतनी देर तक एंकर का अंदाज उस बलात्कारी को महिमामंडित करने वाला था। दावा किया गया कि वह बलात्कारी चैनल में आत्मसमर्पण करने पहुंचा है। हद तो तब हो गई जब उसकी गिरफ्तारी के बाद एक पत्रकार ने पुलिस अधिकारी से सवाल किया कि चूंकि आरोपित ने आत्मसमर्पण किया है इसलिए उसके प्रति क्या नरमी का व्यवहार किया जाएगा?


लेकिन हालात बिगड़ रहे हैं तो सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सवाल लोगों को झिंझोड़ भी रहे हैं। बिहार के महिला संगठन इस मसले को मजबूती से उठा रहे हैं और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। उम्मीद है कि विकास के परदे के पीछे  का सच भी जल्दी ही लोग समझने लगेंगे।

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

vimarsh

यह है पुलिस मुठभेड़ का सच

पीयूसीएल ने जारी की डुमरिया मुठभेड़ की जांच रिपोर्ट

कमलेश

बिहार पुलिस की मुठभेड़ों का सच एक बार फिर सामने आया है। निर्दोष और गरीब ग्रामीणों को पकड़ कर मार डालने का आरोप एक बार फिर सही साबित हुआ है। पिछले एक महीने से यह कहा जा रहा था कि गया जिले के डुमरिया थाने के भलुआहा में हुई मुठभेड़ के बाद पुलिस ने दो गरीबों को पकड़ कर मार डाला लेकिन इसे कोई सुन नहीं रहा था। सुन तो अभी भी कोई नहीं रहा है- न मीडिया न सरकार लेकिन पीयूसीएल की जांच रिपोर्ट आने के बाद गरीबों की आवाज को ताकत जरूर मिली है।
यह किस्सा 10 जून का है जब  गया जिले के डुमरिया थाने के भलुआहा में पुलिस और भाकपा माओवादी के दस्ते के बीच जबर्दस्त मुठभेड़ हुई थी। पुलिस बल में सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन, एसटीएफ और बिहार पुलिस के जवान थे। लगभग पांच घंटे चली मुठभेड़ में पुलिस के दो जवान मारे गए थे। बाद में पुलिस ने दावा किया कि उसने इस मुठभेड़ में दो नक्सलियों को मार गिराया है। लेकिन मुठभेड़ के अगले दिन ही गांव के लोगों ने कहना शुरू किया कि पुलिस ने दो निर्दोष लोगों को पकड़ कर मार डाला है। उनमें से एक तो जालंधर की एक मिठाई फैक्ट्री में काम करता था और कुछ दिन पहले ही छुट्टी में घर आया था। गांव के लोगों और परिजनों का कहना था कि मुठभेड़ खत्म होने के काफी देर के बाद अवधेश भुइया और फुलचंद भुइया अपने जानवरों को पानी पिलाने निकले थे। पुलिस ने उन्हें पकड़ा, पूछताछ की और फिर गोली मार दी। पुलिस के पास ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि ये दोनों ग्रामीण नक्सली गतिविधियों में शामिल थे। पुलिस का दावा था कि मुठभेड़ खत्म होने के बाद जब घटनास्थल की छानबीन चल रही थी कि तो दो नक्सलियों के शव मिले। इस घटना के बाद पुलिस और सीआरपीएफ ने पटना से लेकर गया तक में प्रेस कान्फ्रेंस करके अपनी पीठ ठोंकी थी।
लेकिन इस मामले पर सवाल उठने तब शुरू हुए जब परिजनों ने पुलिस पर हत्या का मुकदमा किया। इसके बाद तो पुलिस ने और भी गजब कर दिया। उसने मुकदमे में गवाह बने लोगों को भी नक्सली बताते हुए उन्हें दूसरे मामले में फंसा दिया। पुलिस ने उनलोगों को फंसाया जो अवधेश और फूलचंद भुइया के परिजनों की मदद के लिए आगे आए थे। इसमें एक राजद नेता और एक जिला पार्षद भी थे। नक्सली बताकर मार डाले गए दोनों गरीब ग्रामीणों की पत्नियां गुहार लगाने पटना पहुंची लेकिन यहां किसी ने भी उनकी बात नहीं सुनी। राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने प्रेस कान्फ्रेंस करके इस मुठभेड़ को फर्जी बताया और इसकी जांच की मांग की लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस प्रेस कान्फ्रेंस की खबर भी अखबारों में बहुत महत्व नहीं पा सकी और ना पुलिस मुख्यालय ने इसपर कोई प्रतिक्रिया दी। परिजनों ने पीयूसीएल को आवेदन दिया और पीयूसीएल ने कमेटी बनाकर मामले की जांच की। जांच कमेटी ने 23 जुलाई को अपनी रिपोर्ट जारी की है। पीयूसीएल ने इस रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में दो गरीब ग्रामीणों को मार डाला। उसने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के आलोक में कार्रवाई की अनुशंसा की लेकिन इस बार भी मीडिया ने इस जांच रिपोर्ट को खास तवज्जो नहीं दी।
पीयूसीएल की पूरी जांच रिपोर्ट यहां प्रस्तुत है। यह रिपोर्ट शब्दश: है केवल कहीं-कहीं संपादन करके वाक्य संरचना ठीक की गई है।

पीयूसीएल की जांच रिपोर्ट

10 जून 2012  को गया जिले के डुमरिया थाना के बलथरवा के पास भलुआहा पहाड़ पर जंगल में नक्सलियों और पुलिस के बीच घमासान मुठभेड़ हुई. इसमें दो पुलिसकर्मी और दो  नक्सलियों के मारे जाने की खबर आयी थी. इसके तुरंत बाद इस घटना में नक्सली बताकर मारे गए अवधेश भुइया की पत्नी फुलझरिया देवी और फूलचंद भुइया की पत्नी कलावती देवी के अलावा जिला पार्षद खालिक रजा खां  ने  पी यू सी एल के पास आवेदन देकर कहा कि यह मुठभेड़ फर्जी थी. पुलिस ने अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया की हत्या की है और दर्जनों लोगों को फर्जी मुकदमे में फंसाया है.
इस आवेदन के मद्देनजर पी यू सी एल ने एक चार सदस्यीय दल का गठन किया. इसमें सीनियर एडवोकेट और पी यू सी एल के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र लाल दास, पूर्व प्रदेश महासचिव किशोरी दास, कार्यकारिणी सदस्य व पी यू सी एल की गया इकाई के सचिव ब्रम्हानंद शर्मा और संयुक्त सचिव राजन शाह को सदस्य बनाया गया.
जाँच दल 8 जुलाई को घटनास्थल पर पहुंचा. दल ने गया शहर से 94 कि मी का दुर्गम रास्ता तय किया. रास्ते में दल को कई नदियों, पहाड़ियों और घने जंगलों को पार करना पड़ा. घटनास्थल का मुआयना करने के बाद जाँच दल तेंदुआ टांड पहुंचा. अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया इसी गांव के रहने वाले थे जिनकी मौत कथित पुलिस मुठभेड़ में हुई थी. जाँच दल ने अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया के परिवार के लोगों और वहां के ग्रामीणों से बातचीत की. दल ने डुमरिया थाना के थानाध्यक्ष से भी बात की. जाँच दल ने 23  जुलाई को इस घटना की जाँच रिपोर्ट जारी की है.

  घटनास्थल की भोगौलिक-आर्थिक स्थिति

   घटनास्थल गया मुख्यालय से 100 कि मी और डुमरिया थाना से 30 कि मी दूर है. यहाँ तक पहुँचने के लिए कई पहाड़ियों, नदियों और टूटी-फूटी सड़कों को पार करना पड़ता है.  घटनास्थल पहाड़ पर स्थित जंगल में है. इसके दक्षिण में भूसिया पहाड़, उत्तर में जंगल तथा पहाड़, पश्चिम में काफी दूर तक घना जंगल और पूरब में तीन कि मी के बाद गांव है. इस गांव में रहने वालों की गुजर-बसर पूरी तरह भगवान भरोसे है. विकास की कोई किरण यहाँ तक नहीं पहुंची है. ऊपर से पुलिसिया और नक्सली कहर के बीच इनका जीवन पिसा रहता है. जीविका के साधन के नाम पर थोड़ी बहुत पहाड़ी जमीन है जिसमें वर्षा होने पर थोड़ा बहुत मडुआ, मकई, रहर, बजरा और सरसों के साथ तिल उपजता है. इनका मुख्य पेशा पशु पालन के साथ-साथ तेंदू पत्ता तोड़ कर बेचना, महुआ चुनना और जंगल से लकड़ी काटना है. गांव के लोग केवल बीबीसी रेड़ियो सुन पाते हैं. बिहार के न्यूज़ के समय रेड़ियो इस तरह घनघनाता है कि कुछ भी सुनना मुश्किल होता है. समाचार पत्र पढने के लिए दुर्गम पहाड़ी और कई पहाड़ी नदियों को लाँघ कर 15  कि मी दूर मैगरा बाजार आना पड़ता है. यही कारण है कि इस  इलाके की आबादी घनी नहीं है और यह नक्सलियों की शरणस्थली बना हुआ है. सामाजिक रूप से इस इलाके में सबसे अधिक आबादी भुइयां, भोक्ता, यादव और मुसलमानों में अन्सारियों की है. अन्य जातियां कम संख्या में हैं.
जाँच दल के सदस्य सुबह आठ बजे गया से निकले और दिन के दो बजे घटनास्थल पहुँच पाए. रात में वर्षा होने के कारण पहाड़ी नदियों के पानी ने गया-इमामगंज मुख्य सड़क के डाईवर्सन को तोड़ दिया था. इससे पूरा रास्ता अवरुद्ध हो गया था. जाँच दल काफी मशक्कत के बाद घटनास्थल तक पहुँच पाया. घटनास्थल पर पहुँचने के लगभग एक कि मी पहले से ही लैंड माईन्स के 70 -80  गड्ढे मिले. वहां पुलिस के दो वाहन भी जले पड़े थे. रास्ते में कई गांवों के स्कूल के भवन भी ढहे हुए मिले. घटनास्थल के तीन कि मी के अन्दर कोई आबादी नहीं है. लिहाजा घटना का आँखों देखा हाल बताने वाला कोई आदमी नहीं मिला. किन्तु आसपास के लोगों ने सुबह 6  बजे से 11 बजे दिन तक भलुआहा पहाड़ी से हजारों गोलियां चलने और बम फटने की आवाज सुनने की बात बताई. जाँच दल के आने की सूचना अगल-बगल के गांवों के लोगों को थी. तेंदुआ टांड पर बलथरवा, छाकरवंधा, करनिया टांड, भैंसादोहन, बरहा, कोकना, मह्जारी और कटकनी आदि गांवों के सैकड़ों लोगों ने जाँच दल के समक्ष अपनी व्यथा सुनाई. उन्होंने इस घटना की पृष्ठभूमि और पुलिस दमन की भी बात बताई. लोगों ने इस घटना से जुड़े डुमरिया थाना कांड संख्या 35 / 12  और कांड संख्या 38 / 12  के अलावा शिकायत वाद संख्या 337 / 2   के कागजात भी जाँच दल को सौंपे.

   अवधेश भुइया की पत्नी फुलझरिया देवी का बयान

फुलझरिया देवी ने बताया कि उनके पति अवधेश भुइया दस वर्षों से अधिक समय से पंजाब के जालंधर में लवली स्वीट में कारीगर का कम करते थे. इस साल एक जून को वे 15  दिनों की छुट्टी लेकर घर आये थे. 10  जून को वे दोपहर बाद लगभग तीन बजे दह पर जानवरों को पानी पिलाने गए थे. जब अवधेश भुइया शाम तक घर नहीं लौटे तो उनके परिजन परेशान हो गए और उन्हें खोजने निकले. लेकिन उनका कोई पता नहीं चला. अगले दिन 11  जून को छाकरवंधा पंचायत के मुखिया दरोगी सिंह को लेकर वे लोग  डुमरिया थाना गए. वहां कलावती देवी ( इनके पति फूलचंद भुइया भी लापता थे ), क्रीत भुइया और फुलझरिया देवी की बहन के साथ वे लोग  इमामगंज विधान सभा क्षेत्र के राजद उम्मीदवार रोशन  भुइया के पास गए. रोशन  भुइया ने भी थाने से बात की लेकिन थाने ने कुछ नहीं बताया. इसी बीच उनलोगों को उडती खबर मिली कि पुलिस ने दो व्यक्तियों को मार डाला है और एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर थाने में रखे हुए है. इसके बाद वे लोग गया मेडिकल कालेज अस्पताल गए जहाँ उनलोगों ने अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया की लाश देखी. काफी कहने-सुनने के बावजूद पुलिस ने दोनों की लाश उन्हें नहीं सौपी. पुलिस ने कहा कि इनका फिर से पोस्टमार्टम होगा. इसके बाद ही लाश मिलेगी. 13  जून की शाम में इनलोगों को दोनों व्यक्तियों की लाश मिली. लाश काफी  क्षत-विक्षत थी तथा उससे काफी दुर्गन्ध आ रही थी. लिहाजा उनलोगों ने गया में ही लाशों को दफना दिया.
फुलझरिया देवी ने अपने पति का अन्य कारीगरों के साथ मिठाई बनाते हुए फोटो भी जाँच दल को दिखाया. उन्होंने बताया कि उनके पति जिस ट्रेन से आये थे उसका टिकट कोर्ट में वकील के पास जमा कर दिया गया है. उन्होंने रोते हुए कहा कि अब वे अपने तीन छोटे बच्चों का पालन अकेले कैसे कर पाएंगी. 10  जून की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि हमलोग अपने पति के साथ सुबह 6  बजे से दिन के 11 बजे तक गोली-बम की आवाज सुन रहे थे.
फूलचंद भुइया की पत्नी कलावती देवी ने बताया कि उनके पति दूसरे की खेती बटाई पर करते थे. उसी से पूरे परिवार का गुजर-बसर चलता था. उनके आठ बच्चे हैं जिनमें कई छोटे हैं. अब उन्हें कौन देखेगा. उन्होंने भी बताया कि अवधेश भुइया और सामाजित भुइया के साथ उनके पति भी जानवरों को पानी पिलाने गए थे. उनके शाम में नहीं लौटने पर घर के लोग उन्हें खोजने निकले. कलावती देवी ने भी फुलझरिया देवी की बातों का पूरी तरह समर्थन किया. उन्होंने यह भी बताया कि अपने पति की पुलिस द्वारा की गयी हत्या के खिलाफ अपने पुत्र फगुनी भुइया से कोर्ट में मुकदमा भी करवाया है. कलावती देवी और फुलझरिया देवी ने यह भी बताया कि जिला पार्षद मुन्ना खां और रोशन  भुइया ने उनलोगों को लाश दिलवाने तथा श्राद्ध कार्य में काफी मदद की. इसके कारण पुलिस ने उनलोगों को भी कई मुकदमों में फंसा दिया है.
इन दोनों तथा अन्य महिलाओं से जब जाँच दल ने पूछा कि अवधेश, फूलचंद और सामाजित भूइया को पुलिस ने उग्रवादी करार दिया है तो इनलोगों का जवाब था कि क्या हमें देखकर ऐसा लगता है कि हमलोग उग्रवादी हैं. उनका कहना था कि पुलिस अपने बचाव के लिए उनपर झूठा आरोप लगा रही है. इसी तरह का बयान सामाजित भूइया की पत्नी बढनो देवी ने भी दिया.

ग्रामीण क्रीत भूइया का बयान

क्रीत भूइया शिकायत वाद के गवाह भी हैं. उन्होंने बताया कि अवधेश, फूलचंद और सामाजित भूइया जब जानवरों को पानी पिलाकर नहीं लौटे तो हमलोग उन्हें खोजने निकले. दूसरे दिन हमलोग उन्हें खोजने के क्रम में जब छकरबंधा गए तो वहां लोगों ने बताया कि उनलोगों ने पुलिस को दो व्यक्तियों की लाश और जीवित सामाजित भूइया को ले जाते देखा है. तब हमलोग अपने पंचायत के मुखिया के साथ विधायक प्रत्याशी रोशन भूइया के यहाँ डुमरिया गए. फिर उनको लेकर मगध मेडिकल कालेज गया गए. वहां हमलोगों ने अवधेश व फूलचंद भूइया की लाश देखी. 11  व 12  तारीख को पोस्टमार्टम कराने के नाम पर लाश नहीं दी गयी. 13  जून की शाम में लाश हमारे हवाले की गयी. हमलोगों ने गया में ही दोनों का दाह संस्कार कर दिया. क्रीत भूइया ने बताया कि अस्पताल में हमलोगों के साथ मुखियाजी के अतिरिक्त उनका भतीजा राजाराम सिंह, भोकता, दोनों मृतकों की पत्नियाँ, फूलझरी की बहन रीता देवी, रोशन भूइया और जिला पार्षद मुन्ना खां भी थे. पुलिस-नक्सली मुठभेड़ के बारे में उन्होंने बताया कि घर से हमलोग गोली-बम चलने की आवाज सुन रहे थे. उन्होंने बताया कि उनके अलावा जो लोग भी फगुनी भूइया द्वारा पुलिस के खिलाफ किये गए मुकदमे के गवाह हैं उन्हें पुलिस ने मुकदमे में फंसा दिया है. पीड़ित परिवार के सदस्यों के अलावा जाँच दल ने भीड़ में खड़े ग्रामीण रामजतन भूइया, कलम भूइया, जीतन भूइया, वृक्ष भूइया, उमेश भूइया, गिरिजा भूइया, झगरू यादव, शंकर पासवान, महराब, महेंद्र साह, प्रवीण भूइया और जिला पार्षद खालिक रजा खां से पूछताछ की. सभी लोगों ने पीड़ित परिवार के बयान का समर्थन किया और खुद के नक्सली संगठन से जुड़े होने से इंकार किया.
ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव में नक्सली लोग आते है. वे लोग घर-घर जाकर खाना मांगते हैं. गांव के लोग डर से अथवा स्वेच्छा से अपने घर में बना खाना खिला देते थे. नक्सली खाना के लिए किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करते थे. इसी बात को लेकर पुलिस वाले ग्रामीणों के घर में रात में घुस जाते थे और उनके माँ-बहन को भद्दी-भद्दी गालियाँ देते थे. पुलिस वाले  उनके घर में टार्च की रोशनी में एक-एक कोना देखते थे और नक्सलियों के नहीं मिलने पर ग्रामीणों के साथ गाली-गलौज और मारपीट करते थे. वे ग्रामीणों से कहते थे कि नक्सलियों को पकड़वाओ नहीं तो तुम्हारा जीना हराम कर देंगे. ग्रामीणों के अनुसार बेरोजगारी के कारण गांव के युवक काम करने के लिए पंजाब, हरियाणा और दिल्ली चले गए हैं. पुलिस वाले घर में घुसकर युवकों को खोजते थे और उनके नहीं मिलने पर घर की महिलाओं को भद्दी-भद्दी गालियाँ देते थे. पुलिस वाले घर का भी सामान तहस-नहस कर देते थे. लेकिन 10 जून के बाद गांव में कोई पुलिस वाला नहीं आया. ग्रामीणों  ने बताया कि पुलिस के खिलाफ हुए मुकदमे के गवाह बने सभी लोगों को पुलिस ने मुकदमे में फंसा दिया है. दूसरी तरफ पुलिस के चले जाने के बाद नक्सली जंगल से आकर चेतावनी देते हैं कि अगर ग्रामीणों ने पुलिस से सांठ-गांठ कर उनलोगों को पकड़वाया तो वे उनका जीना हराम कर देंगे. इस तरह गांव के लोग पुलिस और नक्सलियों के बीच पीसे जा रहे हैं. उनलोगों ने यह भी बताया कि इस क्षेत्र में कोई जमींदार नहीं है जिसके खिलाफ कोई आन्दोलन चलाने की आवश्यकता है. लिहाजा हमलोग नक्सली संगठन के सदस्य क्यों बने? फिर भी पुलिस हमलोगों को नक्सली कहती है. हमारी गरीबी इसके लिए दोषी है.
10  जून के पुलिस-नक्सली मुठभेड़ के बारे में ग्रामीणों ने बताया कि वे लोग अपने घर से ही गोली और बम चलने की आवाज सुन रहे थे. यह लगभग सुबह के ६ बजे शुरू हुआ और दिन के 11 बजे तक चला. अवधेश, फूलचंद और सामाजित भूइया गोली की आवाज बंद होने के बाद लगभग 3 बजे जानवरों को पानी पिलाने गए थे. उनलोगों का नक्सली संगठन से कोई लेना-देना नहीं है. अवधेश जालंधर से छुट्टी लेकर आया था.
इसी पंचायत के भैंसा दोहन गांव के रहने वाले मो. सगीर असलम ने बताया कि यहाँ के सभी नौजवान बाहर काम करते हैं. गांव में हिन्दू-मुस्लिम के बीच आपसी भाईचारा है. उन्होंने बताया कि वे लोग अपने  बेटे-बेटियों की शादी दूसरे गांव में करने जाते हैं तो लोग इसलिए इंकार कर देते हैं कि उनका घर नक्सल प्रभावित इलाके में है. दूसरी तरफ पुलिस हमें माओवादी बताकर तंग-तबाह करती है. उन्होंने बताया कि 10  जून के पहले रात में पुलिस आकर काफी तंग कर रही थी. इस कांड में भी सभी निर्दोष को अभियुक्त बना दिया गया है. इतना ही नही, कई बूढ़े, विकलांग और स्कूल में पढने वाले बच्चों का नाम भी प्राथमिकी में डाल दिया गया है. उन्होंने बताया कि इंटर के छात्र अरुण कुमार और सूर्यदेव संजय, 65  साल के राजदेव भोक्ता और त्रिलोकी यादव के अलावा दिल्ली में रहने वाले उमेश यादव को प्राथमिकी में अभियुक्त बना दिया गया है. इस मुकदमा में पैरवी करने के कारण रोशन भूइया और जिला पार्षद खालिक रजा खां को झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया है.  गांव के लोगों ने यह भी बताया कि यहाँ के मुखिया अनुसूचित जाति के हैं. सरकारी अधिकारी द्वारा उन्हें कानूनी तौर से काम करने से वंचित कर दिया गया है. इससे सरकारी योजना का लाभ गांव के लोगों को नहीं मिल पाता है. लोगों ने अपनी व्यथा बताते हुए यहाँ तक कहा कि सरकार अपने घोषित कार्यक्रम के तहत बसने के लिए 3  डि. जमीन कहीं भी दे दे वे लोग बसने के लिए तैयार हैं. जिला पार्षद खालिक रजा खां ने ग्रामीणों के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि उन्हें तथा रोशन भूइया को भी पुलिस ने कई झूठे मुकदमे में फंसा दिया है.

थानाध्यक्ष का बयान

डुमरिया के थानाध्यक्ष ने बताया कि अवधेश और  फूलचंद भूइया पुलिस द्वारा मारे गए. वे तथा गिरफ्तार सामाजित भूइया नक्सली हैं. जब थानाध्यक्ष से इनलोगों के नक्सली अथवा अपराधिक रिकार्ड के बारे में पुछा गया तो उन्होंने बताया कि अनुसन्धान के क्रम में अभी तक इनलोगों के खिलाफ कोई रिकार्ड नहीं मिला है. ऐसी खबर थी कि पुलिस वालों ने अवधेश और  फूलचंद भूइया को पुलिस की वर्दी पहना कर मारा है लेकिन थानाध्यक्ष ने बताया कि इनलोगों ने न तो कोई इस तरह की वर्दी पहनी थी और न ही इनके पास से कोई हथियार बरामद हुआ है. सिर्फ अवधेश भूइया हाफ जूता तथा हाफ पैंट पहने हुए था. शेष सभी लोग ग्रामीण वेश-भूषा में थे.
मृतकों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि अभी मेरे पास उपलब्ध नहीं है. उन्होंने इन्क्वेस्ट रिपोर्ट देख कर बताया कि फूलचंद भूइया को एक गोली गर्दन की तरफ से और दूसरी गोली दाहिने हाथ की केहुनी में लगी थी. अवधेश भूइया के सिर के दाहिने तरफ गोली लगी थी जबकि दोनों की बांह पर छिलने का निशान था. उन्होंने यह भी बताया कि इन दोनों का दुबारा पोस्टमार्टम कराया गया. अवधेश के जालंधर में काम करने से सम्बन्धित कागजात व रेलवे टिकट के बारे में मिली जानकारी के बारे में जब उनसे पुछा गया कि क्या उनको ऐसे कागज मिले हैं या घटना के बाद क्या वे घटनास्थल पर गए हैं और क्या उन्होंने इस मुताल्लिक पूछताछ की है तो उनका जवाब नकारात्मक था. इस प्राथमिकी के अन्य नामजद अभियुक्तों के नक्सली अथवा अपराधिक रिकार्ड के बारे जब उनसे पुछा गया तो पहले तो उन्होंने उनलोगों के सूचीबद्ध होने की बात बताई. किन्तु बाद में उन्होंने केवल लक्ष्मी सिंह भोक्ता, हरिहर सिंह भोक्ता तथा सुशील भूइया को ही नक्सली पृष्ठभूमि वाला बताया. नक्सलियों द्वारा की गयी पुलिस की क्षति  के बारे में उन्होंने बताया एक पुलिसकर्मी सचिन्द्र शर्मा की मौत नक्सली की गोली से हो गयी जबकि धर्मेन्द्र शर्मा की मौत लैंड माईन्स के कारण हो गयी. इसके अलावा नक्सलियों ने दो गाड़ी और पांच मोटरसाइकल जला दी. इसके अलावा ढेर सारे सामानों की मिसिंग है. 


घटना से सम्बन्धित प्राथमिकी: डुमरिया थाना कांड संख्या-35 /12 

8  पृष्ठों की यह प्राथमिकी इमामगंज थाना के अवर निरीक्षक कृष्ण कुमार के लिखित बयान के आधार पर डुमरिया थाना में दर्ज है. इसके अनुसंधानकर्ता डुमरिया थाना के थानाध्यक्ष शिवनाथ प्रसाद रजक हैं. इस प्राथमिकी के अनुसार पुलिस को गुप्त सूचना मिली कि डुमरिया थाना के बलथरवा गांव के पास भलुआहा पहाड़ पर भाकपा माओवादी का हथियारबंद दस्ता काफी संख्या में किसी बड़े विध्वंसकारी एवं हिंसात्मक कारवाई को अंजाम देने के लिए एकत्रित  हुआ  है. इस सूचना के मिलने के बाद  वरीय  पदाधिकारी  के निर्देश  पर गया के अपर  पुलिस  अधीक्षक  अभियान  शम्भू  प्रसाद के नेतृत्व में सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन और एसटी एफ के  वरीय पदाधिकारियों के साथ-साथ कई थानों की  पुलिस अपने शस्त्र बल के साथ पहुंची. दो सौ की संख्या में पुलिसकर्मी टीम बनाकर 10 जून की सुबह 6 बजे भलुआहा पहाड़ पर पहुंचे.
इनलोगों के पहुँचते ही पूर्व से लगाये गए विध्वंसकारी लैंड माईन्स के जोरदार धमाके लगातार होने लगे. प्राथमिकी के अनुसार 1 से 1 .5  कि मी तक लैंड माईन्स लगे थे जिनसे लगातार धमाके होते रहे. पुन: माओवादी उग्रवादियों ने गाली-गलौज करते हुए पुलिस बल पर अंधाधुंध जानलेवा फायरिंग की. तमाम पुलिस बल उग्रवादियों के अम्बुश में फंस चुके थे. अत: आत्मरक्षार्थ सशस्त्र बल ने विधिवत रूप से फायर का जवाब फायर से दिया. दोनों तरफ से हो रही फायरिंग और बम ब्लास्ट करवाने, बचने-बचाने  इत्यादि कार्रवाई करने के क्रम में उग्रवादियों द्वारा आपस में जो नाम लिया जा रहा था उससे स्पष्ट हुआ कि उग्रवादियों की टीम में मुख्य रूप से 31 लोग थे जो नेतृत्व कर रहे थे. उन्हें नामजद अभियुक्त बनाया गया है. इन अभियुक्तों में मृत अवधेश भुइया, फूलचंद भुइया और गिरफ्तार सामाजित भूइया का नाम भी है. इसके अतिरिक्त सामाजित भूइया से पूछकर 9  और लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया है जिनमें अधिकांश भूइया हैं. उपरोक्त व्यक्तियों में माओवादी भी थे.
माओवादियों की गोली से सिपाही सचिन्द्र कुमार शर्मा की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गयी. लैंड माईन्स फटने से एएसपी शम्भू  प्रसाद के हाथ की हड्डी टूट गयी तथा कई पुलिसकर्मी घायल हुए. इस मुठभेड़ के दौरान सभी सशस्त्र बल कोबरा, सीआरपीएफ, एसटी एफ और बिहार पुलिस द्वारा एके-47 , 5 .56 एमएम, 9 एमएम, एस एल आर और अन्य अस्त्रों से कुल 1728 राउण्ड गोलियां चलायी गयी. ओपरेशन के बाद जब्त  315 एमएम, 303 एमएम, 7 .63 x 13 एमएम और 7 .62  के प्राप्त खोखे व जिन्दा कारतूस के आधार पर माना गया कि उग्रवादियों द्वारा 451 राउण्ड गोली चलायी गयी.
तलाशी के क्रम में भलुआहा पहाड़ की पश्चिमी चोटी पर जहाँ से उग्रवादियों द्वारा अंधाधुंध फायरिंग की जा रही थी वहां से 20  गज की दूरी पर दो उग्रवादियों का शव बरामद किया गया. झाड़ी में एक उग्रवादी सामाजित भूइया पिता मेघु भूइया केंदुआ टांड तथा पहाड़ी से उतरने के क्रम में अनिल भारती, सा. मतहारी, इमामगंज को पकड़ा गया. प्राथमिकी में पुलिस के कई सामान के मिसिंग का एवं एक सुमो, एक बोलेरो तथा 5 मोटरसाइकल को भी नक्सलियों द्वारा जलाये जाने का जिक्र है. इस घटना के सम्बन्ध में शिकायत वाद संख्या 337 /12  दिनांक 13 .06 .2012  को एस डी जे एम शेरघाटी के न्यायालय में फगुनी भूइया पिता स्व.फूलचंद भुइया, केंदुआ टांड, थाना  डुमरिया द्वारा किया गया.
इस वाद में फगुनी भूइयाने कहा है कि  दिनांक 10 .06 .2012  को मेरे पिता फूलचंद भुइया एवं भाई अवधेश भुइया पुलिस और नक्सलवादियों के बीच चल रही गोलीबारी के चार घंटा के बाद यानि दोपहर के बाद तीन बजे मवेशी को पानी पिलाने के लिए जब निकले तो दोनों को पुलिसवालों ने पकड़ लिया और पूछताछ करने लगे. वे कहने लगे कि तुमलोग नक्सलाइट हो. पिता एवं भाई ने कहा कि हमलोग पार्टी के आदमी नहीं हैं. इसी बीच पूछताछ करते-करते पुलिसवालों ने मेरे पिता और भाई को गोली मार दी. उनलोगों के साथ मैं भी था. मैं भाग कर आया और घटना की सूचना दी. पुलिसवाले लाश लेकर गया सदर अस्पताल चले गए. वहीँ पोस्टमार्टम हुआ तथा हमलोगों को तीन दिन बाद लाश मिली. वेलोग लाश देने में टाल-मटोल कर रहे थे. मेरे पिताजी घर पर खेती-बाड़ी  करते थे तथा भाई अवधेश भुइया जालंधर में मिठाई फैक्ट्री में काम करता था. वह 1 .06 .2012   को गांव आया था. 
इस मुकदमा में नक्सल एसपी शम्भू प्रसाद, सीआरपीएफ के सेकेण्ड कमान्डेंट छोटेलाल, शेरघाटी के डीएसपी महेंद्र कुमार बसंत्री और अन्य पुलिसकर्मियों को मुदालाह बनाया गया. इस घटना के गवाह अवधेश भुइया की पत्नी फुलझरी देवी, जगेश्वर भुइया, क्रीत भुइया, खेलावन भुइया और जगदीश भुइया हैं.
घटना के 7  दिन के बाद दिनांक 17 .06 .2012  को डुमरिया थाना में पुलिस की ओर से माओवादियों द्वारा की मैगरा बाजार की बंदी को लेकर  मामला दर्ज किया गया. इसमें शिकायत वाद संख्या 337 /12 के गवाह जगेश्वर भुइया, क्रीत भुइया, खेलावन भुइया को अन्य लोगों के साथ अभियुक्त बनाया गया है.
घटनास्थल का निरीक्षण, इर्द-गिर्द के गांवों की सामाजिक, आर्थिक और भोगौलिक स्थिति, ग्रामीणों, मृतक के परिवार के सदस्यों के बयान, विभिन्न प्राथमिकी व शिकायत वाद के अध्ययन तथा पुलिस पदाधिकारियों से हुई बातचीत के बाद जाँच दल निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँचता है.:

निष्कर्ष

1 . पुलिस और नक्सलियों के बीच जबरदस्त मुठभेड़ हुई. लगभग एक कि मी तक लैंड माईन्स लगाये गए थे. इसके विस्फोट से लगभग 55  जगहों पर छोटे-बड़े गड्ढे दिखाई पड़े. साथ ही एक कि मी तक लैंड माईन्स के निशान पाए गए. घटनास्थल पर दो पुलिस गाड़ी भी बुरी तरह जली हुई पाई गयी. दो पुलिसकर्मी नक्सली कार्रवाई में मारे गए. कानूनी और मानवीय दृष्टिकोण से नक्सलियों की इस कार्रवाई को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.
2 . जहाँ तक  अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया की मृत्यु का सवाल है, यह कहीं से भी मुठभेड़ का मामला प्रतीत नहीं होता है. दो पुलिसकर्मियों की हत्या के प्रतिशोध में इन दोनों की हत्या पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई है. जहाँ तक नामजद अभियुक्तों के नाम का प्रश्न है इसमें मृतक सहित 40  लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया है. अधिकांश अभियुक्तों की नामजदगी का आधार प्राथमिकी में नक्सली आपरेशन के दौरान एक-दूसरे का नाम लेकर पुकारा जाना है जबकि कुछ लोगों को गिरफ्तार सामाजिक भुइया से हुई पूछताछ के बाद अभियुक्त बनाया गया है.
यह व्यावहारिक नहीं लगता है. जहाँ पर दोनों तरफ से हजारों राउण्ड गोलियां चल रही थी, लैंड माईन्स फटने से भरी आवाज हो रही थी और उस आवाज में प्राथमिकी करने वाले सभी अभियुक्तों का नाम याद कर रहे थे, यह संभव नहीं प्रतीत होता है.
3 . प्राथमिकी के अनुसार अनुसंधानकर्ता डुमरिया के थानाध्यक्ष ने इमामगंज के अवर निरीक्षक द्वारा अग्रसारित फर्द बयान पर इसे दर्ज किया है. वर्तमान अनुसंधानकर्ता ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया की मृत्यु पुलिस की गोली से हुई है और उनके पास से किसी भी प्रकार का हथियार या कोई संदिग्ध वस्तु बरामद नहीं हुई है. इससे उनकी नक्सली गतिविधि में संलिप्तता कहीं से भी प्रमाणित नहीं होती है.
प्राथमिकी के अनुसार घटनास्थल से 20  गज की दूरी पर लाश मिली जबकि भौगोलिक स्थिति स्पष्ट करती है कि घटनास्थल से 20  गज की दूरी पर बिल्कुल सपाट एवं खुला पठारी क्षेत्र है जहाँ किसी भी नक्सली का खुले में होने का कोई तार्किक आधार नही बनता है.
4 . मृतक की लाश लगभग 4 बजे शाम में बरामद की गयी. घटना सुबह 6  बजे से दिन के 11  बजे के बीच समाप्त हो गयी थी. विस्फोटक से भरे सघन जंगल में मुठभेड़ के पांच घंटे बाद तक कोई छानबीन चली होगी, यह अपने-आप में विरोधाभासी है. वह भी तब जबकि पुलिस ने 1728  चक्र गोलियां चलाई. फिर भी हताहतों की संख्या नगण्य थी मात्र इन दोनों मृतकों के अलावा. नक्सलियों की अनुमानित संख्या मात्र 450  थी जबकि पुलिस बल अपने लाव-लश्कर के साथ था. भारी संख्या में सीआरपीएफ, कोबरा, एसटी एफ और बिहार पुलिस लामबंदी कर रही थी. डुमरिया के थानाध्यक्ष ने अपने बयान में यह भी बताया कि 60 मोटरसाइकल सवारों के साथ पुलिस बल एंटी लैंड माईन्स व्हीकल सहित सभी सुविधाओं से लैस था. ऐसे में किसी भी नक्सली की लाश या जख्मी को न पाकर मात्र दो निर्दोष ग्रामीणों की हत्या एवं गिरफ़्तारी पुर्णतः एक सोची समझी रणनीति के तहत की गयी प्रमाणित होता है. वह भी तब जबकि मृतक एवं घायल व्यक्ति का कोई भी अपराधिक रिकार्ड पुलिस के पास नहीं है. थानाध्यक्ष किसी अपराध में उनकी संलिप्तता का प्रमाण उपलब्ध नहीं करा पाए. यह हत्या पंचतंत्र के उस आख्यान के आधार पर की गयी है जिसमें कहा गया है कि शिकार से लौटा सिंह राह में पाए गए हिरन को नहीं छोड़ता है. यह पुर्णतः पुलिसिया अभियान की दोषपूर्ण परिणति है.
प्राथमिकी के अनुसार अवधेश भुइया और फूलचंद भुइया की लाश तलाशी के क्रम में उग्रवादियों द्वारा जहाँ से फायरिंग की जा रही थी वहां से 20  गज की दूरी पर पुलिस को मिली तथा उसी के आसपास से सामाजित भुइया  को पकड़ा गया. संयोग से ये तीनों पास के तेंदुआ डीह के रहने वाले थे. यह संयोग है या पुलिस की मनगढंत कहानी!
6 . जहाँ तक उस इलाके के ग्रामीणों द्वारा नक्सलियों को खाना खिलाने और उनसे संपर्क रखने का प्रश्न है, यह भौगोलिक कारणों से उनकी मजबूरी है न कि उनकी इच्छा.
7 . अनुसंधानकर्ता द्वारा अवधेश भुइया के व्हेयर एबाउट की जाँच किये बिना, ग्रामीणों तथा आसपास के लोगों का बयान दर्ज किये बिना अनुसंधान पूरा करने की बात न्यायोचित नहीं है.
8 . प्राथमिकियों को देखने से स्पष्ट लगता है कि पुलिस द्वारा की गयी प्राथमिकी में निर्दोष ग्रामीणों को और मृतकों के परिवार को मदद करने के कारण जिला पार्षद खालिक रजा खां, रोशन भुइया और पुलिस के खिलाफ दर्ज  शिकायत वाद के गवाहों को झूठे मुकदमों में फंसाया गया है जो प्रतिशोध की कार्रवाई है और पुलिस ने इसे जान-बूझ कर गढ़ा है.
अनुशंसा
1 . परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर यह मामला पूर्णतः फर्जी मुठभेड़ एवं इरादतन हत्या का बनता है. इस परिस्थति में मृतकों के परिजन नियमतः मान्य कानून तथा सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशानुसार मुआवजा पाने के अधिकारी हैं. इसे अविलम्ब दिया जाना चाहिए.
2 . सरकारी उदासीनता, दूर-दूर तक विकास का लाभ इस क्षेत्र के लोगों को न मिलने, क्षेत्रीय विधायक का कभी इलाके में नहीं पहुँचने और भौगोलिक जटिलता के मद्देनजर सरकार के विकास कार्यक्रम को वहां की जमीन पर उतारने की भरपूर कोशिश की जनि चाहिए.
3 . शिक्षा, स्वास्थ्य, जन वितरण प्रणाली एवं स्थानीय निकायों की निष्क्रियता और संसाधनों के अभाव को प्राथमिकता के आधार पर लेना चाहिए.
                                                                                                                        
 
 

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

केकर थाना, कचहरी केकर

केकर थाना, कचहरी केकर
कमलेश
बिहार में एक पुरानी कहावत है- बारह साल के बाद एक युग बदलता है. और वो सारी चीजें भी बदल जाती हैं जो पहले से चली आ रही थी. लेकिन बिहार का एक छोटा सा गांव  बथानी टोला  जैसे इस कहावत पर हंस रहा है और बदलाव की बात करने वालों को आइना दिखा रहा है.. यहाँ तो सोलह साल के बाद भी कुछ नहीं बदला. न तो मरने वालों की किस्मत और न ही मारने  वालों का राज-पाट. सब कुछ वही है-वही राजा-महाराजाओं के ज़माने वाला. मरने वाले आज भी मर रहे हैं और मारने वाले कल से ज्यादा नृशंस तरीके से  मार रहे हैं. पुलिस, कोर्ट और कचहरी सब मारने वालों के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ रहे हैं. यही नहीं दिखाने के  लिए एक दूसरे पर जिम्मेदारियों की फेंका फेंकी का खेल भी चल रहा है. बथानी टोला के मामले में लगभग सोलह साल के बाद आये हाई कोर्ट के फैसले को देखने के बाद वर्षों पहले सुना हुआ एक भोजपुरी गीत  याद आ रहा है- पुलिस केकर, मलेटरी केकर, केकर थाना, कचहरी केकर. हम भयनी कौड़ी के तीन पटवारी केकरा नामे जमीन;ये गाना  बथानी टोला  के लोग भी खूब गाते थे लेकिन इस गाना का अर्थ शायद अब उन्हें मालूम चल रहा होगा. 
देश भर में न सही लेकिन बिहार में तो इस खबर  पर बात चल ही रही है. बथानी टोला में सोलह साल पहले हुए एक नरसंहार के सारे तेईस अभियुक्तों को  हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है. उस नरसंहार में 21 लोग मारे गए थे. निचली अदालत ने इन बरी हुए तेईस लोगों में से तीन को फांसी और बीस को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.  हाई कोर्ट ने उसके फैसले को ख़ारिज कर दिया.  हाई कोर्ट ने वैसे यह जरूर कहा कि अभियुक्तों को बचाने के लिए जाँच कार्य में लापरवाही बरती गयी है.  हाई कोर्ट  ने भले अब कहा हो लेकिन इस नरसंहार कांड के बाद से ही  पुलिस के रवैये से साफ जाहिर हो रहा था कि इस पूरे मामले में उसकी सहानुभूति किसके साथ थी.राज्य के पुलिस मुखिया अब  हाई कोर्ट  के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहे हैं लेकिन यह नहीं बताते कि जिन बेहया और बदचलन पुलिस वालों के कारण बथानी टोला  के लोगों के हाथ से इंसाफ निकाल गया उन  पुलिस वालों  को क्या सजा दी जाएगी. दिलचस्प तो यह भी है कि  बथानी टोला  को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री चिदंबरम  कह रहे हैं कि इस मामले में आन्दोलन  होना चाहिए.  बथानी टोला  के लोगों को गृह मंत्री की इस बात का मतलब समझ में नहीं आ रहा है.
 भोजपुर जिले के सहार प्रखंड  का एक गांव है बथानी टोला. एक जमाने में बिहार में चल रहे भूमि संघर्षों की आंच में तपता और खौलता गांव. एक तरफ गांव के भूमिहीन खेत मजदूर और दलित थे तो दूसरी ओर भूमिपति. दलितों के पक्ष में खड़ी  थी भाकपा माले तो भूमिपतियों के लिए हरवा हथियार से लैस थी खूंखार  रणवीर सेना.  दोनों के बीच  पिछले कई वर्षों से लगातार लड़ाई जारी थी.  11 जुलाई 1996 को  बथानी टोला में उतरा था मनहूस दिन. दोपहर के करीब एक बजे पचास-साठ लोग गांव में घुस आये थे. सभी हथियारों से लैस थे. रणवीर सेना के इस जत्थे  में किसी के हाथ में बन्दुक थी तो किसी के हाथ में तलवार और किसी के हाथ में भाला. गांव में हुआ हल्ला-रणवीर सेना वाला आ गइलन स. इधर हमलावर गोलियां बरसाने लगे. लोगों को जिधर जगह मिली उधर भागे. गांव के मारवाड़ी चौधरी के घर में छुपने के लिए लोग भागे. हमलावरों ने  मारवाड़ी चौधरी के घर के साथ-साथ झोपड़ियों  में आग लगा दी. कुछ लोग जल कर मरे तो कुछ लोगों को गोली मार दी गयी. कई लोग तो तलवार से काट डाले गए. कुल 21 लोग मारे गए थे. मरने वालों में तीन साल का अमीर सुभानी था तो चालीस साल की जेबू निशा भी थी. हत्यारों ने छोटे बच्चों के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा था. गांव के ही एक नईमुद्दीन के घर के पांच सदस्य मार डाले गए थे. गांव में बना शहीद स्मारक आज भी मारे गए लोगों की याद दिलाता है. अब ऐसा लग रहा है जैसे इस सच को ही झूठ बनाने की कवायद चल रही है.
         बथानी टोला के लोग अब चुप हैं. शांति से सब कुछ देख रहे हैं. उस नरसंहार को  याद करना नहीं चाहते, ऐसा भी नहीं है. वे आज भी उस स्मारक को देखते हैं और डर जाते हैं. उनको लगता है कि कोई फिर आकर उन्हें तबाह कर देगा और अदालत से भी बेदाग छुट जायेगा. कल भी ऐसा ही होता था और आज भी ऐसा ही हो रहा है. दरअसल वे जुबान से कुछ नहीं बोलते लेकिन उनकी ऑंखें सब कुछ कह रही हैं. बथानी टोला से एक सवाल उठ रहा है- अगर निचली अदालत से सजा पाने वाले सभी लोग निर्दोष थे तो उस नरसंहार को अंजाम देने वाले कौन थे. बथानी टोला की जमीन पर गिरे उन 21 लोगो का खून किसके माथे पर है. अगर गरीब लोग मारे गए थे तो मारने वाले भी जरूर हैं. उन्हें सजा कब मिलेगी. एक बार फिर उन्हें वह गीत याद आ रहा है -पुलिस केकर, मलेटरी केकर, केकर थाना, कचहरी केकर. हम भयनी कौड़ी के तीन पटवारी केकरा नामे जमीन;

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

गरीबों से छीनी जा रही बिजली

 कमलेश
साभार- गोपाल
रामध्यान महतो कपड़े की एक दुकान पर काम करते हैं. पटना के खाजपुरा मोहल्ले में वे एक किराये के घर में रहते हैं. उन्होंने पैसे बचाकर ऑफ सीजन में एक कूलर ख़रीदा था. अच्छी खासी छुट मिल गयी थी. सोचा था कि कूलर रहेगा तो इस बार की गर्मी में बच्चों को पढने-लिखने में परेशानी नहीं होगी. पिछली गर्मी में बच्चों की हालत देख कर उनका कलेजा मुंह को आ गया था और तभी से उन्होंने पैसे बचाने शुरू कर दिया था. साढ़े चार हजार रुपये का कूलर आया तो घर में जैसे उत्सव का माहौल बन गया था. लेकिन दुर्भाग्य आसानी से पीछा कहाँ छोड़ता है. अब हालत यह है कि रामध्यान जी को कूलर का स्विच छूते हुए डर लगता है. उनकी पत्नी और बच्चे जब भी कूलर को देखते हैं तो राज्य  सरकार को खूब सरापते हैं. उन्हें डर है कि वे कूलर चलाएंगे तो बिजली का बिल इतना आ जायेगा कि पूरे महीने का बजट ही गड़बड़ा जायेगा.

रामध्यानजी कहते हैं कि अगर एक हजार रुपया बिजली का बिल भरेंगे तो खायेंगे क्या.
 दरअसल बिहार में बिजली का बिल इतना आ रहा है कि धीरे-धीरे बिजली आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही  है. बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक तो बिजली रहती नहीं है और जब रहती है तो उसको जलाना काफी महंगा होता है. लिहाजा अब गरीब-गुरबे ज्यादातर बिजली चुरा कर ही जला रहे हैं.

अभी बिहार में यदि आपके घर में बिजली का बिल एक महीने में तीन सौ यूनिट से ज्यादा आता है तो हो सकता है कि आपको प्रति यूनिट चार रूपये का बिल भरना पड़े. एक तो बिजली बिल की दर बढ़ा दी गयी और ऊपर से प्रति यूनिट  फ्युएल सरचार्ज वसूला जाता है. इस सरचार्ज का कोई फिक्स रेट नहीं है. लोग पिछले एक साल से  फ्युएल सरचार्ज दे रहे हैं लेकिन आजतक उन्हें इसका हिसाब-किताब समझ में नहीं आया है,. कभी 69 पैसा तो कभी 60 पैसा प्रति यूनिट फ्युएल सरचार्ज वसूला जाता है. एक बार तो एक रुपया 18 पैसा फ्युएल सरचार्ज लिया गया था. मतलब यदि आप पटना जैसे शहर में दो कमरों के घर में रहते हैं तो आपका बिजली बिल एक हजार रुपया से कभी काम नहीं आएगा. पहले यह 6 -7  सौ रुपया के आस पास रहता था.

जब बिहार राज्य बिजली बोर्ड ने फ्युएल सरचार्जके नाम पर अनाप-शनाप पैसा लेना शुरू किया तो कुछ विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया. इस पर सरकार के बिजली मंत्री का कहना था कि विपक्षी दलों के लोग पढ़ते लिखते नहीं हैं. इन्हें पता ही नहीं है कि बिजली के बिल में बढ़ोतरी का काम सरकार नहीं करती है बल्कि इसके लिए एक नियामक योग बना हुआ है. जिस मंत्री ने यह तर्क दिया वह बराबर दूसरों के पढने-लिखने की परीक्षा लिया करते हैं. लेकिन बिहार के गरीब यह तो जरूर पूछेंगे कि यदि आपका बिजली बोर्ड ही आपके कहने में नहीं है तो इतना बड़ा राज्य तो भगवान भरोसे ही रहेगा.

 दरअसल बिहार जैसे राज्य में किसी गरीब के घर में बिजली की बत्ती और पंखा चलने का सम्बन्ध सीधे उसके स्वाभिमान से जुड़ा होता है. अगर यह देखना हो तो किसी मुसहर टोले के उस घर में चले जाइये जिसने किसी तरह पंखा खरीदने का सुख पाया है. यह मसला उनके बच्चों की पढाई लिखाई से भी जुड़ा है. दिन भर मेहनत-मजदूरी करने के बाद अगर किसी को पढने की इच्छा होती है तो यही बिजली उसकी मदद करती है.

एक समय था जब गांवों के दलितों के टोले में बिजली जलती दिखाई पड़ती थी तो तार काट लिए जाते थे कि न रहेगा तार और न जलेगी बिजली. काफी मेहनत और संघर्षों के बाद उन्होंने बिजली जलाने का हक़ पाया है और अब इसे बड़े तरीके से छीना जा रहा है. दुखद तो यह है कि इस मसले को लेकर सड़क पर उतरने को कोई भी तैयार नहीं. कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी नहीं.

रविवार, 1 अप्रैल 2012

वाम राजनीति को झकझोर गयी सीपीआई की कांग्रेस

कमलेश
सीपीआई का इक्कीसवां महाधिवेशन ख़त्म हुआ. लगभग पांच दिनों तक चले इस कांग्रेस ने बिहार में उम्मीद की एक नई किरण जगाई है. कांग्रेस की शुरुआत एक रैली से हुई और इस रैली से  सूबे में वैसे लोगों को काफी सुकून मिला है जो बिहार में राजनीतिक बदलाव देखना चाहते हैं और जिन्हें राजद, कांग्रेस, जेडी य़ू या फिर बीजेपी जैसे दलों से कोई उम्मीद नहीं है. लम्बे समय के बाद पटना की सड़कों पर किसी वामपंथी दल ने अपनी ताकत दिखाई थी. पिछले दिनों माले की भी रैली हुई थी लेकिन उसके लोग सड़क पर उस दिन इस तरह नहीं उतरे थे. एक बड़ी रैली लेकिन अनुशासित और दूसरों की परेशानियों का ख्याल रखने वाली. हालाँकि रैली के बाद हुई सभा में इतनी भीड़ नहीं रही जितनी रैली में दिखाई पड़ी थी. शायद उस दिन चल रही लू और धूप का असर था. लेकिन उस दिन सीपीआई के महासचिव ए. बी. वर्धन के तेवर बता रहे थे कि सीपीआई अब बिहार में आर या पार की लड़ाई के मूड में है. उन्होंने न केवल वामपंथी एकता की बात की बल्कि क्षेत्रीय दलों से भी कहा कि वे फैसला करें कि उन्हें किसके साथ रहना है. कार्पोरेट और घोटालेबाजों की संरक्षक बीजेपी और कांग्रेस के साथ या फिर वाम जनवादी ताकतों के साथ.
महाधिवेशन के पहले दिन माकपा के महासचिव प्रकाश करात, माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, आर एस पी के अवनी राय और एस य़ू सी आई के देवव्रत विश्वास सभी ने वामपंथी एकता की वकालत की. इससे लोगों में एक नया सन्देश गया है. एक बात साफ हो गयी है कि अगर वामपंथी ताकत बिहार में मिल कर नहीं लड़ेंगी  तो उन्हें ख़त्म हो जाना होगा. वैसे भी आम लोग आज भी इस बात को नहीं समझ पाते हैं कि भाकपा, माकपा और माले में अंतर क्या है और ये लोग अलग-अलग चुनाव क्यों लड़ते हैं. महाधिवेशन में भी जब ये नेता वाम एकता की वकालत कर रहे थे तो निचले स्तर के कार्यकर्त्ता अपनी तालियों से अपनी इच्छा बता रहे थे.
हिंदी पट्टी के बिहार जैसे राज्य में  सीपीआई का महाधिवेशन होने का मतलब ही है कि सीपीआई इन राज्यों में अपने घटते जनाधार से परेशान है. कभी बिहार विधान सभा में मुख्या विपक्षी दल रहने वाली सीपीआई के पास आज मात्र एक विधायक है. पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अनजान ने एक बातचीत के दौरान स्वीकार किया कि हिंदी पट्टी में चली जातिवादी और सांप्रदायिक हवा के कारण उनकी पार्टी की जमीन कमजोर हुई है और बिहार में भी ऐसा ही हुआ है. लेकिन उन्होंने साथ यह भी कहा कि इस महाधिवेशन में हमलोग किट्टी पार्टी या हाउजी खेलने नहीं आये हैं. इस महाधिवेशनके माध्यम से  हमलोग बिहार में अपनी जमीन मजबूत करेंगे और वाम जनवादी आन्दोलन की शुरुआत करेंगे.

महाधिवेशन के अंतिम दिन जब ए.के. वर्धन अपना विदाई भाषण दे रहे थे तो भी उन्होंने साफ किया कि आने वाले दिनों में पार्टी हिंदी पट्टी खासकर बिहार में अपनी ताकत झोंकेगी. उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे गांवों में जाकर जमीन के मसले पर लड़ाई तेज करें. उन्होंने याद  दिलाया कि बिहार जैसे राज्यों में पार्टी तभी मजबूत रही थी जब उसने जमीन को लेकर लड़ाई लड़ी. नए महासचिव सुधाकर रेड्डी ने भी पार्टी के विस्तार के लिए हिंदी पट्टी में मेहनत का वादा किया.
तो उम्मीद रखी जाये कि आने वाले दिनों में बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों को देखने का मौका मिलेगा. अभी बिहार विधान सभा में एकमात्र कम्युनिस्ट विधायक है और वह सीपीआई का ही है. इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि इस प्रदेश में आज भी सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई ही है. कई जिलों में आज भी उसका जनाधार तारीफ के काबिल है. महाधिवेशन में आये प्रतिनिधियों से बात करने से लगा कि इस बार वे बिहार में काम  कर रहे माओवादियों के प्रति भी नरम रुख अख्तियार करेंगे. मतलब यह कि इस बार अपनी जमीन को वापस पाने के लिए पार्टी कुछ भी करेगी. अभी पार्टी का राज्य सम्मलेन नहीं हुआ है. एक महीने के भीतर उसके होने की संभावना है. तय मानिये कि उस सम्मलेन के बाद बिहार में लड़ाई देखने को मिलेगी. इस सम्मलेन में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी जिस तरह मेहनत की उससे अच्छा सन्देश गया है. पार्टी की बिहार इकाई ने इस सम्मलेन के लिए एक करोड़ रूपये से भी अधिक का चंदा जुटाया और इसका अधिकतर हिस्सा पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दिया. किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह साधारण बात नहीं है. इसके अलावा दो हजार लोगों के पांच दिनों तक खाने के लिए अनाज कार्यकर्ताओं ने गांवों से जुटाया. जाहिर है कि इस पुरे अभियान में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की पूरी ओवर वोयलिंग हो गयी होगी, 
लेकिन इस सारी कवायद का कोई मतलब नहीं होगा यदि इस कांग्रेस के बाद पार्टी के नेता  और कार्यकर्ता शांत होकर पड़ जाय. ऐसा न हो कि कहीं गोली चले और कामरेड पार्टी के सर्कुलर का इंतजार करते रहे. बिहार में गरीबों से बिजली की रोशनी में रहने का अधिकार छीना जा रहा है. राज्य में बिजली इतनी मंहगी हो गयी है कि एक बार फिर गरीब ढिबरी की रौशनी में रहने को विवश हो रहे हैं. इस सवाल को कम्युनिस्ट नहीं उठाएंगे तो फिर कौन उठाएगा. इस कांग्रेस के बाद बिहार की वामपंथी राजनीति में आलोडन आया है और आम लोग उनकी तरफ देख रहे हैं.